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ऐलानाबाद: अभय चौटाला, भाजपा-जजपा से ज्यादा किसानों के लिए अहम, जानें कैसे आंदोलन का नक्शा बदल सकते हैं ये उपचुनाव

Sat, 30 Oct 2021 08:31 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 30 Oct 2021 08:31 AM IST
सार

ऐलानाबाद उपचुनाव कितने अहम हो सकते हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके नतीजों पर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में जारी किसान आंदोलन का भविष्य भी तय होगा।

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Ellenabad bypoll: Abhay Chautala, more important for farmers than BJP JJP, know how these by elections can change the map of the movement
इनेलो नेता अभय चौटाला, भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत और गोपाल कांडा के भाई गोबिंद कांडा। (बाएं से दाएं) - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हरियाणा की ऐलानाबाद सीट पर शनिवार को जब चुनाव होंगे, तो राज्य के राजनीतिक दलों से ज्यादा किसान संगठनों का सम्मान दांव पर है। यह उपचुनाव कितने अहम हो सकते हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके नतीजों पर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में जारी किसान आंदोलन का भविष्य भी तय होगा। हरियाणा की इस सीट की अहमियत को देखते हुए भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत से लेकर आंदोलन से जुड़े कई नेता लगातार सिरसा पहुंचे हैं। भाजपा-जजपा और किसानों के समर्थन में इस सीट को छोड़ने वाले अभय चौटाला के लिए भी यह सीट नाक का सवाल बन गई है। 

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क्या है ऐलानाबाद में उपचुनाव की वजह?
जिस ऐलानाबाद सीट पर 30 अक्तूबर को उपचुनाव हो रहे हैं, उस पर इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के एकमात्र विधायक अभय चौटाला काबिज थे। 2020 में इस सीट से जीत के बाद इस साल किसान आंदोलन के समर्थन में उन्होंने हरियाणा विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। इसी के चलते ऐलानाबाद सीट पर अब चुनाव रखे गए हैं। 
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ऐलानाबाद सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला क्यों?
ऐलानाबाद सीट पर उपचुनाव को इस बार त्रिकोणीय मुकाबला माना जा रहा है। दरअसल, अभय चौटाला पहले ही अपनी सीट छोड़कर किसानों को लुभाने की कोशिश कर चुके हैं। उनके खिलाफ भाजपा और जजपा ने हरियाणा लोकहित पार्टी के अकेले विधायक गोपाल कांडा के भाई गोबिंद कांडा को उतारा है। गोपाल कांडा पहले ही सिरसा से विधायक हैं और इस इलाके में उन्हें अच्छा समर्थन हासिल है। उधर कांग्रेस ने भाजपा से बगावत करने वाले पवन बेनीवाल को इस सीट पर मौका दिया है। 
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उपचुनाव में क्या-क्या हैं मुद्दे?
ऐलानाबाद उपचुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा तीन कृषि कानून का है। जहां अभय चौटाला ने इन्हीं के विरोध में अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया था। वहीं, भाजपा के लिए भी यह सीट नाक का सवाल बन गई है। पार्टी इस सीट पर लड़कर कृषि कानून के टेस्ट के तौर पर देख रही है। उधर कांग्रेस अपने प्रत्याशी के जरिए देशभर में पेट्रोल-डीजल और बढ़ती महंगाई के बीच जनता के रुख को भांपने और उसका फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। एक जीत पार्टी के कदमों को और मजबूती दे सकती है, जबकि एक हार उसे आगामी पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले कदम पीछे खींचने का इशारा भी हो सकते हैं। 

ऐलानाबाद उपचुनाव में कहां आती है किसानों की भूमिका?
हरियाणा के ऐलानाबाद उपचुनाव को किसानों के लिए जनमत संग्रह की तरह देखा जा रहा है। इसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें हैं...

1. किसान आंदोलन शुरू होने के 11 महीने बाद हरियाणा में यह किसी विधानसभा सीट पर पहला चुनाव है। किसानों का आंदोलन अब तक ज्यादातर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से तक सीमित रहा है। यानी हरियाणा को आंदोलन का केंद्र भी कहा जा सकता है। 

2. इस उपचुनाव के नतीजे तय करेंगे कि कृषि कानूनों के विरोध का चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है। खुद किसानों का कहना है कि अगर वे भाजपा प्रत्याशी को बड़े अंतर से हराने में सफल हुए तो साफ हो जाएगा कि उत्तर भारत में हवा किस तरफ बह रही है।

3. किसानों का यह भी कहना है कि यह जीत भाजपा के उन दावों पर झटका होगी, जिसमें पार्टी ने कहा है कि किसान आंदोलन सिर्फ कुछएक संगठनों की मिलीभगत है और जमीन पर इसे कोई समर्थन हासिल नहीं है। 
 

अभय चौटाला जीते तो क्या होंगे मायने?

विधानसभा से इस्तीफा देकर अभय चौटाला लगातार किसान आंदोलन के मंचों पर जाते रहे हैं। उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने भी कई सार्वजनिक सभाएं और जींद में एक रैली कर के किसानों का समर्थन जताया। अगर अभय जीत जाते हैं तो वे इन नतीजों को किसान आंदोलन के खिलाफ गुस्से के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकते हैं। चौटाला के अलावा अगर बेनीवाल जीतते हैं, तो वे भी इन्हें किसान आंदोलन की जीत कह सकते हैं। इतना ही नहीं किसान भी दावा कर सकते हैं कि उनके आंदोलन का असर राजनीति पर पड़ने लगा है। 

चुनाव नतीजों का भाजपा पर क्या असर?
भाजपा नेताओं ने अब तक इस किसान आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बताया है। पार्टी ने इसके पीछे कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों की मिलीभगत को वजह बताया है। सिरसा हमेशा से चौटाला परिवार का गढ़ रहा है और ऐलानाबाद सीट भी चौटाला परिवार के सदस्यों या उनके साथियों द्वारा जीती जाती रही है। लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से ही चौटाला परिवार में फूट पड़ी है। अभय के बड़े भाी अजय चौटाला की पार्टी जजपा ने भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन किया है। अजय के बेटे दुष्यंत खुद डिप्टी सीएम पद पर काबिज हैं। इसके अलावा ओपी चौटाला के छोटे बेटे रंजीत सिंह रनिया सीट से चुनाव जीतकर भाजपा-जजपा सरकार में ऊर्जा मंत्री हैं। वे भी कांडा के समर्थन में वोट मांग रहे हैं।
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