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चुनावी चाणक्य पीके को है एक सहारे की दरकार, बिहार से चढ़ा ग्राफ उत्तर प्रदेश में उतरा

Sat, 16 Jun 2018 07:41 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 16 Jun 2018 07:41 PM IST
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Electoral Strategist PK, Prashant Kishor needs a support, performance affected by Congress and SP

2014 के लोकसभा चुनाव में टीम मोदी का हिस्सा बने प्रशांत किशोर ने जमकर शोहरत बटोरी। इसके बाद 2014 में पीके ने जद(यू) के साथ करना शुरू किया। 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे पीके को नई ऊंचाई दे दी, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे पीके के लिए वाटर लू का युद्ध साबित हुए। कांग्रेस और सपा के खराब प्रदर्शन का पीके की भी छवि पर असर पड़ा। कांग्रेस के नेताओं से मन भेद बढ़ा और वित्तीय सहमति भी अटक गई। इसके चलते पीके और कांग्रेस पार्टी दोनों के रास्ते अलग हो गए। अभी पीके कांग्रेस (वाईएसआर) को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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2014 में दिग्गज चुनाव रणनीतिकार बने थे और अब हाथ लगभग खाली हैं। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी की कांग्रेस (वाईएसआर) और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ही सहारा बचा है। हां, बात चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की हो रही है। पीके 2019 के लोकसभा चुनाव और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के प्रस्तावित विधानसभा चुनावों में अपनी सेवाएं देना चाहते हैं, लेकिन पीके की ही टीम के सूत्रों का कहना है कि कहीं भी दाल नहीं गल रही है। 
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पीके की पहली चाहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ काम करना है, लेकिन वहां भी अब काफी कुछ बदल चुका है। लिहाजा पीके के हाथ खाली हैं। मौजूदा समय में पीके के साथ करीब 400 युवा काम कर रहे हैं। इनमें 200 राज्यों की राजनीति पर फोकस कर रहे हैं और 200 की निगाह केंद्रीय राजनीति पर है। राज्य की राजनीति में वह जगन मोहन रेड्डी के लिए काम कर रहे हैं। 
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पीके की टीम के सूत्र के मुताबिक जगन मोहन रेड्डी को इसका लाभ भी मिल रहा है और उनकी पार्टी आंध्र प्रदेश में रेस में सबसे आगे है। पीके के पास दूसरी जिम्मेदारी बिहार के नीतीश कुमार की पार्टी की है। टीम के बिहार में बदल रहे घटनाक्रम पर काम कर रहे सूत्रों का कहना है कि वहां स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। नीतीश कुमार का आधार वोट खिसक रहा है।

केंद्रीय राजनीति में अजमाना चाहते हैं हाथ

प्रशांत किशोर केंद्रीय राजनीति में हाथ अजमाना चाहते हैं। उनको सीधे रिपोर्ट करने वालों में से एक सदस्य के मुताबिक पीके की पहली पसंद भाजपा ही है। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए काम कर चुके हैं। कुछ मतभेद उभरने के बाद उन्हें उस टीम से हटना पड़ा था। लेकिन पीके के हटने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जल्द ही वैकल्पिक टीम तैयार कर ली। इसमें रजत सेठी, सुभ्रास्था समेत कई युवा हैं। ये लो प्रोफाइल रहकर काफी अच्छा परिणाम दे रहे हैं। शाह का इस टीम पर भरोसा बढ़ चुका है। खुद प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा महासचिव राम माधव समेत अन्य टीम के कामकाज से खुश हैं। ऐसे में पीके का सहयोग लेने की भाजपा को उतनी जरूरत महसूस नहीं हो रही है।
 

कांग्रेस के दरवाजे बंद, खिड़की खुली

Electoral Strategist PK, Prashant Kishor needs a support, performance affected by Congress and SP
पीके टीम के सदस्य के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पीके के कामकाज की तारीफ करते हैं, लेकिन कांग्रेस के कई बड़े नेता उनकी राह में रोड़ा है। वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, राजबब्बर से भी यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान रिश्ता बिगड़ गया था। हालांकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस का चेहरा बने कमलनाथ से पीके की अच्छी निभती है। इसी तरह से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से भी पीके का समीकरण ठीक है, लेकिन इससे ढंग की बात बनती नजर नहीं आ रही है। 
फिलहाल पीके को कांग्रेस के भी बुलावे का इंतजार है। उनकी टीम के सदस्यों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी के पास विपक्ष के अन्य राजनीतिक दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का अच्छा अवसर है। पीके की टीम इसे बड़ी सफलता में बदल सकती है, लेकिन अभी कहीं पीके का सिक्का चलता नहीं दिखाई दे रहा है।

तीसरा मोर्चा

तीसरा मोर्चा जैसे किसी ढांचे को लेकर पीके को उम्मीद है, लेकिन तीसरा मोर्चा बनना ही टेढ़ी खीर सा है। एक संभावना चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, जद(एस), तृणमूल कांग्रेस, जनता दल(बीजू) जैसे दलों के एकजुट होने की है। लेकिन इसके मूर्त रूप ले पाने में ही तमाम तरह के झोल नजर आ रहे हैं। फिर टीम पीके के एक प्रमुख रणनीतिकार का मानना है कि इन दलों के आपस में तालमेल करने के बाद दलों के प्रभाव वाले क्षेत्र में किसी दूसरे दल का कोई जनाधार नहीं है। 
इसलिए इस तरह का कोई मोर्चा बनकर कोई ठोस राजनीतिक रूप ले पाने की स्थिति से दूर है। बताते हैं इस तरह का कोई मोर्चा तभी सफल हो सकता है, जब इसमें कांग्रेस या बसपा, भाजपा जैसे दल शामिल हों। क्योंकि इन दोनों ही दलों का देश के हर राज्य में कुछ न कुछ आधार है।

कांग्रेस(वाईएसआर) और भाजपा

टीम पीके के आंध्र प्रदेश में कार्य करने वाले सूत्र के अनुसार भाजपा और कांग्रेस (वाईएसआर) में तालमेल की संभावना काफी कम है। कांग्रेस(वाईएसआर) के जगनमोहन रेड्डी को भाजपा के साथ जाने की दशा में अल्पसंख्यक और दलित वोटों के खिसकने की चिंता हो रही है। इसलिए कांग्रेस(वाईएसआर) और भाजपा के बीच में कोई चुनावी तालमेल की संभावना काफी कम है। वहीं कांग्रेस पार्टी ने जगन मोहन रेड्डा के साथ दोस्ताना रिश्ते को हवा देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस पार्टी चाती है कि 2019 के आम चुनाव और राज्य विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों में कोई सहमति बन जाए।
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