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पत्र पर बवाल: चुनावी ड्यूटी में सहायक कमांडेंट के बराबर होगा आरपीएफ इंस्पेक्टर, एसीएस को बताया 'सीएपीएफ डीसी' के समतुल्य

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 25 Jan 2022 07:27 PM IST
सार

डीजी आरपीएफ संजय चन्दर ने गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशकों को गत सप्ताह ही यह पत्र लिखा है। अभी तक जो चुनावी व्यवस्था रही है, उसके अंतर्गत सीएपीएफ में सहायक कमांडेंट स्तर का अधिकारी ही कंपनी को कमांड करता रहा है। सीएपीएफ में इस पद पर आने वाले वालों को यूपीएससी की परीक्षा पास करनी पड़ती है...

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election 2022: DG RPF wrote in his letter that the RPFInspector should get same facilities in election duty like Assistant Commandant in CAPF
सीएपीएफ चुनावी ड्यूटी - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' के डीजी द्वारा पांच चुनावी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को लिखा गया पत्र केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' में चर्चा का विषय बना हुआ है। सीएपीएफ का न केवल मौजूदा स्टाफ, बल्कि पूर्व अधिकारी भी रेलवे सुरक्षा बल के इस पत्र पर सवाल उठा रहे हैं। डीजी आरपीएफ संजय चंदर ने अपने पत्र में लिखा है कि चुनावी ड्यूटी के दौरान आरपीएफ के इंस्पेक्टर को सीएपीएफ के निरीक्षक की तरह न समझा जाए। रेलवे में वह इंस्पेक्टर कंपनी कमांड करता है, इसलिए उसे चुनावी ड्यूटी में वही सुविधाएं जैसे रहना, खाना व परिवहन आदि प्रदान की जाएं, जो सीएपीएफ में सहायक कमांडेंट को मिलती हैं।

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सीएपीएफ में कंपनी कमांड की जिम्मेदारी सहायक कमांडेंट (राजपत्रित अधिकारी) को सौंपी जाती है। इतना ही नहीं, रेलवे सुरक्षा बल के डीजी संजय चंदर ने यह भी लिखा है कि चुनाव में तैनात कंपनियों के सुपरविजन की जिम्मेदारी असिटटेंट सिक्योरिटी कमिश्नर 'एसीएस' जो डीएसपी या सहायक कमांडेंट के बराबर होता है, उसे सीएपीएफ के डिप्टी कमांडेंट के बराबर मानकर सभी सुविधाएं प्रदान की जाएं।
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डीजी आरपीएफ संजय चन्दर ने गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशकों को गत सप्ताह ही यह पत्र लिखा है। अभी तक जो चुनावी व्यवस्था रही है, उसके अंतर्गत सीएपीएफ में सहायक कमांडेंट स्तर का अधिकारी ही कंपनी को कमांड करता रहा है। सीएपीएफ में इस पद पर आने वाले वालों को यूपीएससी की परीक्षा पास करनी पड़ती है। दूसरी ओर आरपीएफ का इंस्पेक्टर 'अराजपत्रित' श्रेणी में आता है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद बताते हैं कि अगर रेलवे में इंस्पेक्टर द्वारा कंपनी कमांड करने का नियम है तो भी पत्र की भाषा बहुत संतुलित होनी चाहिए थी। चुनाव में फोर्स कोई भी हो, उसे अपनी तय ड्यूटी ही करनी होती है।
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इस पत्र में अगर पदों की तुलना करने की बजाए ड्यूटी पर फोकस रहता, तो ज्यादा ठीक था। यहां तो राजपत्रित और अराजपत्रित श्रेणी के बीच बेवजह का विवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया। सहायक कमांडेंट की भर्ती एजेंसी, प्रवेश परीक्षा और चयन का तरीका, आरपीएफ के इंस्पेक्टर से पूरी तरह अलग होता है। कुछ सुविधाओं के चक्कर में दोनों पदों को बराबर रखने का प्रयास करना गलत है। चुनावी ड्यूटी में बहुत कुछ राज्य पर निर्भर होता है। अगर राज्य के पास पर्याप्त संसाधन, भौगोलिक परिस्थिति या आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो जरूरी नहीं है कि चुनावी ड्यूटी पर आए सभी अधिकारियों को मेट्रो सिटी वाली सुविधाएं मिल जाएंगी।


यूपी, उत्तराखंड या मणिपुर में बहुत से मतदान केंद्र ऐसे भी होंगे, जहां स्कूल का भवन अच्छी हालत में नहीं होगा। बतौर एसके सूद, जवानों को तो छोड़ दें, वहां अधिकारियों को भी अलग से एक कमरा मिल जाए तो बड़ी बात है। सीएपीएफ का कमांडेंट कई बार अपनी कंपनी के साथ ही किसी कोने में बिस्तर लगाकर आराम करता है। डीजी आरपीएफ ने इंस्पेक्टर को सीएपीएफ के सहायक कमांडेंट के बराबर सुविधाएं देने की बात कह दी। इसके अलावा डीएसपी या सहायक कमांडेंट रैंक वाले एसीएस को सीएपीएफ के डिप्टी कमांडेंट जैसी सुविधाएं दे दी जाए। यह तुलना गलत है। सीएपीएफ में रैंक वाइज मानक निर्धारित किए गए हैं। उनसे कोई बाहर नहीं जाता।

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