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ईडी का दावा: पंजाब में फर्जी सहमति पत्र बनाकर बेचे प्लॉट, रजिस्ट्रेशन से पहले शुरू की बिक्री
Wed, 22 Jul 2026 07:41 PM IST
राहुल कुमार
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: राहुल कुमार
Updated Wed, 22 Jul 2026 07:41 PM IST
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ED
- फोटो : ED
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के जालंधर ज़ोनल ऑफिस ने अजय सहगल के खिलाफ मोहाली की स्पेशल कोर्ट (पीएमएलए) में एक प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (पीसी) दायर की है। उन पर आरोप है कि उन्होंने नकली सहमति पत्रों के आधार पर 'चेंज ऑफ़ लैंड यूज़' (सीएलयू) हासिल करके अपराध से हुई कमाई (पीओसी) को लॉन्डर करने में भूमिका निभाई। आरोपियों ने पंजाब के 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट' को नकली सहमति पत्र देकर अपना काम शुरू कर दिया। रजिस्ट्रेशन से पहले ही प्रोजेक्ट में प्लाट बेचने प्रारंभ कर दिए। आरोपियों ने आरईआरए की मंजूरी के बिना ही 'ला कैनेला फेज 2' में भी रेजिडेंशियल यूनिट्स बेचीं।
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108.58 एकड़ कृषि भूमि का इस्तेमाल बदला
ईडी ने पंजाब पुलिस द्वारा अजय सहगल और अन्य आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की थी। जांच से पता चला कि 'इंडियन को-ऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसाइटी लिमिटेड' के सेक्रेटरी अजय सहगल ने 'टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट' में नकली सहमति पत्र जमा किए थे। ये पत्र 'सनटेक सिटी' नाम के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए 108.58 एकड़ कृषि भूमि का इस्तेमाल बदलकर उसे रिहायशी और कमर्शियल प्लॉट में बदलने (सीएलयू) के लिए जमा किए गए थे। नकली सहमति पत्र जमा करके हासिल किए गए सीएलयू के आधार पर, जीएमएडीए ने 'सनटेक सिटी' के विकास के लिए लाइसेंस जारी किया था।
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बिना सर्टिफिकेट जमीन मालिकों को कब्जा दे रहे थे
ईडी के मुताबिक, उन्होंने नकली सहमति पत्रों के आधार पर ही प्रोजेक्ट के लिए आरईआरए रजिस्ट्रेशन भी हासिल किया था। इसके अलावा, यह भी पता चला कि वे लाइसेंस की शर्तों के अनुसार 'इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन' (ईडब्लूएस) के लिए आरक्षित ज़मीन को जीएमएडीए के एस्टेट ऑफिसर को ट्रांसफर करने में नाकाम रहे। साथ ही, उन्होंने आरईआरए रजिस्ट्रेशन मिलने से पहले ही प्रोजेक्ट में यूनिट्स बेचना शुरू कर दिया था। जीएमएडीए से कंप्लीशन सर्टिफिकेट (आंशिक या पूरा) लिए बिना ही ज़मीन मालिकों को कब्ज़ा दे रहे थे।
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गैर-कानूनी तरीके से मंज़ूरी दी गई
जांच के दौरान यह भी पता चला कि बिल्डिंग प्लान और सीएलयू को गैर-कानूनी तरीके से मंज़ूरी दी गई थी, जिसमें 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एरिया' शामिल नहीं था। 'बिल्डिंग प्लान नियम 3.12.2' (इंटरनल डेवलपमेंट वर्क्स) के तहत इसकी ज़रूरत होती है। इंडियन को-ऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसाइटी लिमिटेड और वीआरएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड (अब एबीएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड) के बीच एक जेडीए (जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट) हुआ था। इसके तहत प्रोजेक्ट के सभी डेवलपमेंट और बिक्री के अधिकार एबीएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दिए गए थे, जिसके डायरेक्टर अजय सहगल के भाई संजय सहगल और अनिल सहगल थे।
आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं
इसके बाद, एबीएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड ने आरईआरए के साथ 'ला कैनेला फेज 1' और 'डिस्ट्रिक्ट 7' को रजिस्टर कराया। इन प्रोजेक्ट्स में यूनिट्स बेचकर अपराध से कमाई की। यह भी पता चला कि एबीएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड ने बिना किसी आरईआरए मंज़ूरी के 'ला कैनेला फेज 2' में भी रेजिडेंशियल यूनिट्स बेचीं। जांच में पता चला कि जीएमएडीए को 2020 से ही जाली सहमति पत्रों के इस्तेमाल के बारे में शिकायतें मिलनी शुरू हो गई थीं। हालांकि, आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिससे उन्हें ऐसे प्रोजेक्ट में रेजिडेंशियल और कमर्शियल यूनिट्स बेचकर अपराध से कमाई करने का मौका मिला। इसकी मंज़ूरी गैर-कानूनी तरीके से ली गई थी।
केवल आंशिक सीएलयू रद्द किया गया
इसके बजाय, एबीएस टाउनशिप प्राइवेट लिमिटेड को आरईआरए एक्ट की धारा 14 के तहत तय प्रक्रिया का पालन किए बिना, मूल मंज़ूर प्रोजेक्ट के लेआउट में बदलाव करके 14.59 एकड़ के लिए लैंड यूज में बदलाव की मंजूरी दे दी गई। बाद में भी, पंजाब रीजनल एंड टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट की धारा 85 के तहत केवल आंशिक सीएलयू रद्द किया गया, जिससे आरोपी व्यक्ति को अपराध से और कमाई करने का मौका मिला। इससे पहले, ईडी ने मई और जून 2026 में पीएमएलए की धारा 17 के तहत आरोपी व्यक्तियों से जुड़ी कई जगहों और लॉकर्स की तलाशी ली थी।
212.58 करोड़ रुपये की बिक्री
तलाशी के दौरान आपत्तिजनक दस्तावेज़, डिजिटल डिवाइस और 30.98 लाख रुपये का बिना हिसाब-किताब वाला कैश ज़ब्त किया गया। जांच के दौरान यह पता चला कि अजय सहगल अपराध से कमाई करने और उसे छिपाने के मास्टरमाइंड थे। उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध किया है। नतीजतन, अजय सहगल को 22 मई को पीएमएलए, 2002 की धारा 19 के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया। जांच में अपराध से हुई कमाई का अनुमान लगभग 348 करोड़ रुपये लगाया गया है, जिसमें 212.58 करोड़ रुपये की बिक्री और 135.41 करोड़ रुपये की बिना बिकी इन्वेंट्री शामिल है। जांच से यह साबित हुआ है कि आरोपी ने जानबूझकर अपराध से हुई कमाई की। उसे अपने पास रखा, छिपाया और उसका इस्तेमाल किया। यह कमाई आरईआरए एक्ट के तहत नकली सहमति पत्रों, गैर-कानूनी मंजूरी और धोखाधड़ी से रजिस्ट्रेशन के ज़रिए जमीन के इस्तेमाल में बदलाव कराने जैसे अपराधों से हुई थी।