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कानों देखी : ये क्या कर रहे हैं रविशंकर प्रसाद जी

Fri, 15 Jun 2018 12:18 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Fri, 15 Jun 2018 12:18 AM IST
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Ears seen: What are these doing ravi shankar prasad
रविशंकर प्रसाद जी देश के कानून मंत्री हैं। नाक नीची ही नहीं होती। मंत्रालय भी ऐसे चला रहे हैं कि अफसर हैरान हैं। ताजा मामला अधिकारियों की तैनाती का है। खबर है कि एक पुराने रिटायर पूर्वविधायी सचिव को अपने मंत्रालय में रोजगार देने जा रहे हैं। अफसर उनका पुराना जानकार है। यहां तक तो ठीक था। इस अफसर की भी एक चहेती मंत्रालय में ही एडिशनल सेक्रेटरी है। एडिशनल सेक्रेटरी के मंत्रालय में चयन के दस्तावेजों को लेकर कैट ने दिशा-निर्देश जारी कर रखे हैं। इसे जारी हुए तीन-चार साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक उसके खिलाफ न तो जांच हुई और न रिपोर्ट पेश की गई। इसके बावजूद उसे अब लॉ कमीशन में मेंबर सेक्रेटरी भी बनवाने की तैयारी है। खबर है कि दोनों पर कानून मंत्री जी कृपा है। ऐसे में अधिकारियों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि जब मंत्रालय के पास अधिकारी है, तो उन्हें मौका देने के बजाय रविशंकर जी कुछ साल पहले रिटायर हुए अफसर को उनके सिर पर क्यों थोप रहे हैं। यह तो अफसरों की कानाफूसी है, बाकी सच तो रविशंकर जी ही जानें।
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जर्नादन जी ने फुलाए हाथ-पांव

कांग्रेस पार्टी के पूर्व महासचिव, खांटी समाजवादी सोच के जनार्दन द्विवेदी का मीडिया प्रेम जग जाहिर है। विचार, सिद्धांत और प्रयोग में अच्छी पकड़ रखते हैं। पार्टी के मीडिया प्रभारी रहते जनार्दन जी ने अपने हिसाब से मान-सम्मान की दबंगई बनाई थी। अब वह न तो राज्यसभा सदस्य हैं, न हीं पार्टी के महासचिव। ऐसे में एक भारतीय नागरिक और तीस साल पुराना प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का सदस्य होने के नाते जनार्दन जी ने सोमवार और शुक्रवार को चार बजे से प्रेस क्लब में आने का फैसला कर लिया है। जब जनार्दन जी ने पार्टी की इफ्तार दावत के दौरान ताज पैलेस होटल में जब यह इच्छा जाहिर की तो कांग्रेस कवर करने वाले कुछ प्रतिष्टित पत्रकारों ने भी तत्काल इस पर सहमति दे दी। बात यहां तक तो ठीक थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ वह बेहद चौंकाने वाला है। यह खबर जंगल के आग की तरह भाजपा और कांग्रेस के नेताओं तक पहुंच गई है। लिहाजा कई के हाथ- पांव फूलने लगे हैं। कांग्रेस के एक पुराने मीडिया विभाग के सदस्य का तो अभी रक्तचाप बढ़ने लगा है।
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लोहे का चना बनी वसुंधरा

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा आलाकमान के लिए लोहे का चना बन गई हैं। वह भी तब जब पूरी भाजपा और लगभग हर नेता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हर इशारे पर बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ता जा रहा है। लेकिन वसुंधरा हैं कि पूरे तेवर में हैं। राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी के इस्तीफा देने के काफी समय बाद भी भाजपा अध्यक्ष एक नाम को अंतिम रूप नहीं दे पा रहे हैं। हालांकि चर्चा में भूपेन्द्र यादव, श्रीचंद कृपलानी, अरुण चतुर्वेदी, अर्जुन राम मेघवाल और राजेन्द्र शेखावत तक का चल चुका है। सूत्र बताते हैं कि अभी तक की स्थिति दोनों तरफ से दांव-प्रतिदांव तक की है। फिलहाल भाजपा अध्यक्ष में मुख्यमंत्री से अब टकराने का विचार छोड़कर उनकी सहमति का ध्यान रखने का मन बनाया है, लेकिन वसुंधरा हैं कि उन्हें अपनी आगे की दस साल की राजनीति दिखाई दे रही है। लिहाजा वह हवा का रुख भांपकर अपना अड़ियल रुख बनाए हैं। कभी भाजपा आला कमान वसुंधरा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से भी हटाना चाहता था, लेकिन राजनीति की पक्की खिलाड़ी वसुंधरा जमी रही।
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अमित शाह चौंका रहे हैं

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने नये अवतार में हैं। वह उदार रूप दिखा रहे हैं। शाह केन्द्र सरकार के कार्यकाल का चार साल पूरा होने के बाद लोगों को कामकाज की जानकारी देकर उनसे भाजपा के पक्ष में समर्थन मांग रहे हैं। पूरे देश में समाज, शिक्षा, खेल समेत अन्य क्षेत्र की सेलेब्रिटी से मिलने निकले हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सुहाग, मशहूर फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित, हाकी खिलाड़ी बलबीर सिंह, पत्रकार कुलदीप नैय्यर, जस्टिस आरसी लोहाटी, योग गुरू रामदेव, रतन टाटा, मिल्खा सिंह, लता मंगेशकर समेत तमाम लोगों से मिल चुके हैं। अभी यह सूची जरा लंबी है। इसका असर चाहे जो पड़ रहा हो, लेकिन राजनीति के गलियारे में इसे कई तरीके से देखा जा रहा है।

कोई इसे भाजपा की खराब सेहत को दवा देने से जोड़ रहा है तो कुछ कहना है कि भाजपा राज्यसभा के लिए उपयुक्त उम्मीदवार ढूंढ रही है। वैसे भी सचिन तेंदुलकर, फिल्म अभिनेत्री रेखा का कार्यकाल खत्म हो चुका है। ऐसे में राष्ट्रपति द्वारा नये उम्मीदवार नामित किए जाने हैं। बताते हैं इस क्रम में कपिल देव से मुलाकात के बाद टीम कपिल के भी हौसले बुलंद हैं। वहीं कानूनविद सुभाष कश्यप के जानकारों की भी उम्मीद बढ़ गई है। वहीं, शाह के इस मिलन समारोह पर एक कांग्रेस के एक दिग्गज नेता का कहना है कि चलिए चार साल बाद भाजपा अध्यक्ष को यह ख्याल तो आया।

गोयल साहब का सिक्का

उदार, विनम्र और हंसमुख पीयूष गोयल का सिक्का चल रहा है। सरल स्वभाव के बावजूद विरोधियों की संख्या बढ़ रही है। जलन रखने वाले भी बढ़ रहे हैं। कारण साफ है। गोयल जी पर न केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, बल्कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी भरोसा करते हैं। पीयूष हैं भी पूरे पीयूष। मामला चाहे जितना नरम हो या जितना भी गरम, पूरी कोशिश से लो प्रोफाइल रहकर जुट जाते हैं। फिर नतीजा चाहे जो निकले लेकिन शीर्ष स्तर पर केवल वाहवाही मिलती है। खासकर उ.प्र. विधानसभा चुनाव की तैयारियों, प्रचार अभियान आदि में जोरदार मेहनत के बाद से इसका फल अच्छा ही आ रहा है। कभी समय था दो-चार केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल पर टांट कस देते थे। अब गोयल वहीं है, राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार से केन्द्रीय मंत्री बन गए हैं। उनका स्वभाव भी पहले जैसा ही है, लेकिन कोई टांट कसने का साहस नहीं कर पा रहा है। टटोलने पर पता चला कि जिसपर कृपा हो अब उसके गले घंटी बांधने कौन जाएगा। अब तो वह केन्द्रीय मंत्री भी नहीं बोलते जो कभी चुटकी लेने के साथ-साथ कुछ कर भी देते थे। बोले भी कैसे....सिर मुड़ाते ही ओले जो पड़ गए।


सोनिया-माया खिचड़ी पकने पर देगी स्वाद

हां, सोनिया-माया खिचड़ी पका रही हैं। इस खिचड़ी पर अखिलेश की लगातार निगाह है। अखिलेश तो चूल्हे के आग की गर्मी का भी अंदाजा लगाने में ही चूक जा रहे हैं। खबर है मायावती गठबंधन पर तैयार हैं, लेकिन पत्ते नहीं खोल रही हैं। दरअसल सोनिया गांधी और मायावती दोनों को अभी इसकी कोई जल्दी नहीं है। मायावती को उ.प्र. के साथ-साथ बाहर की बसपा दिखाई पड़ रही है और कांग्रेस को उ.प्र. में कम से कम एक दर्जन सीटें। 15 मांग रही है। 12 मिलने की उम्मीद है। दस सीट भी मिल जाएगी तो तालमेल बुरा नहीं। अमेठी, रायबरेली, प्रतापगढ़, शाहजहांपुर, बाराबंकी, कानपुर समेत कई सीटों पर प्रत्याशी उतारकर गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक पार्टी  अपना आधार बनाए रखना चाह रही है। खबर है कि मायावती ने सोनिया गांधी को सबकुछ ठीक होने का आश्वासन दिया है। वहीं सोनिया गांधी की तरफ से म.प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में बसपा को सम्मान देने में परहेज नहीं है। बिहार में भी बसपा खाता खोलना चाह रही है। उसे इसमें कांग्रेस का कंधा सटीक दिखाई पड़ रहा है।
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