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क्या 1967 में भेड़ों की वजह से बनी थी भारत-चीन के बीच युद्ध की स्थिति!

Wed, 05 Jul 2017 02:57 PM IST
amarujala.com- Presented by: ऋतुराज त्रिपाठी
amarujala.com- Presented by: ऋतुराज त्रिपाठी Updated Wed, 05 Jul 2017 02:57 PM IST
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due to two animals, the situation of world war between India and China
भारत- चीन

क्या आप जानते हैं 1967 में भारत और चीन के बीच तनाव की वजह कौन था! अगर आप सोचते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना की तरह किसी शख्स ने इन दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति पैदा की थी तो आप गलत हैं। शायद आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन भेड़ों और याकों के झुंड ने 1967 में भारत और चीन के बीच तनाव पैदा किया था। 

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बॉर्डर पर तिब्बती चरवाहों पर 800 भेड़ और 59 याक चुराने का आरोप लगा था। चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों से अपनी भेड़ें और याक वापस मांगे थे। चीनी सैनिकों और भारतीय सैनिकों के बीच पैदा हुए तनाव से दिल्ली में शांतिपथ पर चीनी दूतावास के सामने नाटकीय विरोध पैदा हो गया था।
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24 सितंबर 1965 की दोपहर में कांग्रेस नेताओं और अधिकारियों की भीड़ ने चीनी दूतावास के सामने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। भारतीयों की उग्र भीड़ में लोग चीख चीख कर कह रहे थे कि कुछ भेड़ और याक की वजह से चीन विश्व युद्ध शुरू करना चाहता है। भारतीयों के इस प्रदर्शन के जवाब में चीन ने एक नोट लिखा था जिसमें उसने भारतीयों के प्रदर्शन को बदसूरत बताते हुए कहा था कि यह भारतीय सरकार द्वारा फैलाया हुआ ड्रामा है। 
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चीनी नोट के जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने 1 अक्टूबर को पत्र लिखा था। जिसमें जानवरों के साथ लापता हुए चार तिब्बती चरवाहों का भी जिक्र था। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि अन्य तिब्बती शरणार्थियों की तरह, ये चार लोग भी अपनी इच्छा से भारत आए थे और हमारी अनुमति के बिना भारत में शरण ली थी। वे किसी भी समय तिब्बत वापस जाने के लिए स्वतंत्र हैं। भारत ने अपने नोट में यह भी कहा था कि हम भेड़ और याक के बारे में कुछ भी नहीं जानते। यह उन दो चरवाहों पर निर्भर है जिन्होंने चोरी की है। वे तिब्बत जाते समय अपनी भेड़ें और याक ले जा सकते हैं। 


भारतीय नोट में सरकार ने यह भी लिखा कि चीनी दूतावास के सामने भारतीयों ने जो प्रदर्शन किया वह शांतिपूर्ण था। और जो भेड़ें प्रदर्शन के लिए चीनी दूतावास के सामने लायी गईं थीं, वास्तव में वो प्रदर्शनकारियों की भेड़ें थीं। यह चीनी अल्टीमेटम के खिलाफ दिल्ली के नागरिकों के असंतोष की एक सहज और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति थी। लेकिन वास्तव में चीनी दूतावास के सामने कुछ भारतीय प्रदर्शनकारियों ने कहा था "मुझे खा लो, लेकिन दुनिया को बचा लो।"

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