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जल संकट: किसने बिगाड़े हालात और कौन इसे सुधार पाएगा?
सचिन यादव/अमर उजाला, दिल्ली।
Updated Fri, 15 Apr 2016 01:51 PM IST
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पानी को लेकर सामने आने वाला गंभीर संकट कोई एक दिन में पैदा नहीं हो गया
- फोटो : Getty
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देश भर के ग्रामीण और शहरी इलाकों में अगर पानी की कमी सामने आ रही है तो यह पानी को गलत तरह से प्रयोग करने का ही नतीजा है। पानी को लेकर सामने आने वाला गंभीर संकट कोई एक दिन में पैदा नहीं हो गया। या फिर इसके लिए कोई एक सरकार और एक व्यक्ति जिम्मेदार है। यह हम सभी के सामूहिक 'कुकर्मों' का ही नतीजा है। हर साल पानी संकट को लेकर ऐसी रिपोर्ट सामने आती रही हैं। पर जैसे ही गर्मी का सीजन आता है तभी हमें क्यों याद आता है कि देश भर में पानी का संकट है? पिछले साल उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र समेत आठ राज्यों ने अपने आप का सूखाग्रस्त घोषित किया था। सामान्य से कम हुई बरसात के चलते कई राज्यों में किसानों ने आत्महत्या भी की थी। बाद में केंद्र सरकार ने इसके लिए सभी राज्यों को किसानों की तत्काल मदद के लिए मुआवजा भी बांटा था।
पानी के संकट को लेकर कई सालों पहले नासा के एक वैज्ञानिक ने भी ऐसी ही एक रिपोर्ट के जरिए देश में होने वाले पानी संकट को लेकर आगाह कर दिया था। नासा ने वर्ष 2009 में अपनी रिपोर्ट में भारत में पानी संकट को लेकर होने वाली तस्वीर का खाका खींच दिया था। नासा के हाइड्रोलॉजिस्ट मैट रोडेल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से भारत में जमीन के अंदर से मिलने वाले जल का संकट बढ़ता जा रहा है। नासा की रिपोर्ट की यह बात सामने आई थी कि उत्तर भारत में जहां पर आबादी तेजी से बढ़ रही है वहां के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में पैदा की जाने वाली गेहूं और चावल की फसलों को खासा नुकसान हो सकता है। पर इस बात पर तब किसी ने ध्यान नहीं दिया और आज उसके परिणाम लोगों के सामने आ रहे हैं। नासा के ग्रेविटी रिकवरी एंड क्लाइमेंट एक्सप्रेरिमेंट के अध्ययन में यह बात सामने आई थी।
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नासा के वैज्ञानिक मैट रोडेल ने तब ही अपनी रिपोर्ट में कह दिया था कि अगर जमीन के अंदर से मिलने वाले पानी का सही प्रयोग नहीं किया गया तो उत्तर भारत की कम से कम 11.4 करोड़ से ज्यादा की आबादी को पानी के संकट का सामना करना पड़ेगा। साथ ही कृषि क्षेत्र में पानी की कमी का संकट भी पैदा हो जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक अगर ऐसे ही पानी का स्तर लगातार नीचे जाता रहा तो ग्रेविटी और जमीन के अंदर से मिलने वाले सिग्नल पर भी असर पड़ेगा। साथ ही इसका असर यह होगा कि वैज्ञानिकों को शोध करने में काफी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि जिस क्षेत्रों में खुद के प्राकृतिक संसाधन नहीं होंगे, वहां के हालात और ज्यादा बिगड़ सकते हैं।
कैसे सुधरेंगे हालात?
मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक पिछले दो सालों में देश में सामान्य से कम मानसून हुआ जिसका असर पूरे देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ा और उसकी आंच शहरों तक देखी गई। वर्ष 2016 में मानसून सामान्य से अच्छा होगा और अच्छी बारिश की उम्मीद है। अच्छी बारिश के चलते किसानों को पानी की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया कि हम कुछ माह पहले ही भविष्याणी कर देते हैं। हमारा पूरा मकसद होता है कि मौसमी भविष्यवाणी के अनुसार ही किसान और राज्य अपने आप को तैयार कर लें।
जल मंत्रालय और नासा की रिपोर्ट बता रही है कि जमीन के अंदर पानी का स्तर हर तीन साल में एक मीटर नीचे गिरता जा रहा है। तालाब और कुएं सूखते जा रहे हैं। सिंचाई और कृषि के तरीकों में भी कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया है। गरीब किसान आज भी पुराने तरीकों से कृषि कर रहे हैं। ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं के समय सबसे ज्यादा नुकसान भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और देश की जीडीपी को होगा। हर साल तेजी से बढ़ने वाली जीडीपी बिना कृषि क्षेत्र के आगे नहीं बढ़ सकती है। अगर गांवों में अच्छा अन्न नहीं पैदा हुआ तो शहर के लोग महंगी कीमतों पर अपना राशन खरीदने पर मजबूर हो जाएंगे और भविष्य में अनाज का संकट भी लोगों के सामने आ सकता है। ऐसा समय आ सकता है जब लोगों के पास रूपए तो होंगे पर खरीदने के लिए अन्न नहीं होगा।
जल मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को सलाह दी है कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों में भूगर्भ जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वहां पर जल्द से जल्द तालाब और कुओं का निर्माण करवाया जाए। साथ ही एकीकृत पाइप लाइन की व्यवस्था को गांवों को तक पहुंचाने के लिए जल्द से जल्द प्रयास हों। खेती के तरीकों और किसानों के बीच जागरूकता फैलाकर कृषि में तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे कठिन समय पर किसानों को आसानी से मदद मिल सके।
शहर में जमीन के पानी का स्तर सुधारने के लिए लोगों को अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा। बिना अपनी आदत बदले लोग कुछ भी नहीं कर पाएंगे और शहरों में तेजी से पानी का स्तर गिरता जाएगा। उदाहरण के तौर पर आज भी देश की राजधानी दिल्ली में हजारों लोग ट्रीटमेंट प्लांट का पानी पीते हैं। दिल्ली के पास खुद के प्राकृतिक स्रोत नहीं हैं और अगर हरियाणा-उत्तर प्रदेश अपनी पानी की आ पूर्ति यहां रोक दें तो दिल्ली में पानी के लिए आपातकाल लागू करना पड़ सकता है।
मौसम विभाग की डिक्शनरी में नहीं है 'सूखे' नाम का शब्द
आप भले ही जोर-जोर से चिल्लाएं देश में पड़ गया सूखा-सूखा पर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की डिक्शनरी से 'सूखा' शब्द ही गायब हो गया है। वर्ष 2015 में देश भर में गंभीर सूखा पड़ने के बाद मौसम विज्ञान विभाग ने अधिकारिक तौर पर सूखे शब्द को अपनी डिक्शनरी से हटा लिया है।
मौसम विज्ञान विभाग की तरफ से जारी किए गए सर्कुलर के मुताबिक 'सूखा' शब्द वैज्ञानिक तौर पर परिभाषित नहीं है और इसे नया नाम देने की जरूरत है। सर्कुलर के मुताबिक अब अगर देश में मानसून के दौरान वर्षा सामान्य से 10 फीसदी कम होती है और देश के भूभाग में 20-40 फीसदी से कम तो इसे 'डिफिशन्ट इयर' कहा जाएगा, नाकि 'आल इंडिया ड्राउट इयर'। अगर देश भर में 40 फीसदी से भी कम वर्षा होती है तो इसे आल 'इंडिया सर्व ड्राउट इयर' की जगह पर 'लार्ज डिफिशन्ट इयर' कहा जाएगा।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में 'सूखे' शब्द को लेकर कुछ लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। मौसम विज्ञान विभाग ने कभी भी अपनी मौसम संबंधी भविष्यवाणियों में सूखे शब्द का प्रयोग नहीं किया है।
आपको बताते चले कि मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार मौसम, भूगर्भ और कृषि के आधार पर सूखे की अलग-अलग परिभाषा दी गई है। एक राज्य जिसमे 90 फीसदी से कम बारिश हुई हो उसे मौसम के आधार सूखा ग्रस्त घोषित किया जा सकता है पर कृषि के आधार पर सूखा घोषित नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक सूखे को लेकर मौसम विज्ञान विभाग और केंद्र सरकार कभी कोई घोषणा नहीं करती हैं।
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पानी के संकट को लेकर कई सालों पहले नासा के एक वैज्ञानिक ने भी ऐसी ही एक रिपोर्ट के जरिए देश में होने वाले पानी संकट को लेकर आगाह कर दिया था। नासा ने वर्ष 2009 में अपनी रिपोर्ट में भारत में पानी संकट को लेकर होने वाली तस्वीर का खाका खींच दिया था। नासा के हाइड्रोलॉजिस्ट मैट रोडेल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से भारत में जमीन के अंदर से मिलने वाले जल का संकट बढ़ता जा रहा है। नासा की रिपोर्ट की यह बात सामने आई थी कि उत्तर भारत में जहां पर आबादी तेजी से बढ़ रही है वहां के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में पैदा की जाने वाली गेहूं और चावल की फसलों को खासा नुकसान हो सकता है। पर इस बात पर तब किसी ने ध्यान नहीं दिया और आज उसके परिणाम लोगों के सामने आ रहे हैं। नासा के ग्रेविटी रिकवरी एंड क्लाइमेंट एक्सप्रेरिमेंट के अध्ययन में यह बात सामने आई थी।
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नासा के वैज्ञानिक मैट रोडेल ने तब ही अपनी रिपोर्ट में कह दिया था कि अगर जमीन के अंदर से मिलने वाले पानी का सही प्रयोग नहीं किया गया तो उत्तर भारत की कम से कम 11.4 करोड़ से ज्यादा की आबादी को पानी के संकट का सामना करना पड़ेगा। साथ ही कृषि क्षेत्र में पानी की कमी का संकट भी पैदा हो जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक अगर ऐसे ही पानी का स्तर लगातार नीचे जाता रहा तो ग्रेविटी और जमीन के अंदर से मिलने वाले सिग्नल पर भी असर पड़ेगा। साथ ही इसका असर यह होगा कि वैज्ञानिकों को शोध करने में काफी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि जिस क्षेत्रों में खुद के प्राकृतिक संसाधन नहीं होंगे, वहां के हालात और ज्यादा बिगड़ सकते हैं।
कैसे सुधरेंगे हालात?
मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक पिछले दो सालों में देश में सामान्य से कम मानसून हुआ जिसका असर पूरे देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ा और उसकी आंच शहरों तक देखी गई। वर्ष 2016 में मानसून सामान्य से अच्छा होगा और अच्छी बारिश की उम्मीद है। अच्छी बारिश के चलते किसानों को पानी की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया कि हम कुछ माह पहले ही भविष्याणी कर देते हैं। हमारा पूरा मकसद होता है कि मौसमी भविष्यवाणी के अनुसार ही किसान और राज्य अपने आप को तैयार कर लें।
जल मंत्रालय और नासा की रिपोर्ट बता रही है कि जमीन के अंदर पानी का स्तर हर तीन साल में एक मीटर नीचे गिरता जा रहा है। तालाब और कुएं सूखते जा रहे हैं। सिंचाई और कृषि के तरीकों में भी कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया है। गरीब किसान आज भी पुराने तरीकों से कृषि कर रहे हैं। ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं के समय सबसे ज्यादा नुकसान भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और देश की जीडीपी को होगा। हर साल तेजी से बढ़ने वाली जीडीपी बिना कृषि क्षेत्र के आगे नहीं बढ़ सकती है। अगर गांवों में अच्छा अन्न नहीं पैदा हुआ तो शहर के लोग महंगी कीमतों पर अपना राशन खरीदने पर मजबूर हो जाएंगे और भविष्य में अनाज का संकट भी लोगों के सामने आ सकता है। ऐसा समय आ सकता है जब लोगों के पास रूपए तो होंगे पर खरीदने के लिए अन्न नहीं होगा।
जल मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को सलाह दी है कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों में भूगर्भ जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वहां पर जल्द से जल्द तालाब और कुओं का निर्माण करवाया जाए। साथ ही एकीकृत पाइप लाइन की व्यवस्था को गांवों को तक पहुंचाने के लिए जल्द से जल्द प्रयास हों। खेती के तरीकों और किसानों के बीच जागरूकता फैलाकर कृषि में तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे कठिन समय पर किसानों को आसानी से मदद मिल सके।
शहर में जमीन के पानी का स्तर सुधारने के लिए लोगों को अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा। बिना अपनी आदत बदले लोग कुछ भी नहीं कर पाएंगे और शहरों में तेजी से पानी का स्तर गिरता जाएगा। उदाहरण के तौर पर आज भी देश की राजधानी दिल्ली में हजारों लोग ट्रीटमेंट प्लांट का पानी पीते हैं। दिल्ली के पास खुद के प्राकृतिक स्रोत नहीं हैं और अगर हरियाणा-उत्तर प्रदेश अपनी पानी की आ पूर्ति यहां रोक दें तो दिल्ली में पानी के लिए आपातकाल लागू करना पड़ सकता है।
मौसम विभाग की डिक्शनरी में नहीं है 'सूखे' नाम का शब्द
आप भले ही जोर-जोर से चिल्लाएं देश में पड़ गया सूखा-सूखा पर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की डिक्शनरी से 'सूखा' शब्द ही गायब हो गया है। वर्ष 2015 में देश भर में गंभीर सूखा पड़ने के बाद मौसम विज्ञान विभाग ने अधिकारिक तौर पर सूखे शब्द को अपनी डिक्शनरी से हटा लिया है।
मौसम विज्ञान विभाग की तरफ से जारी किए गए सर्कुलर के मुताबिक 'सूखा' शब्द वैज्ञानिक तौर पर परिभाषित नहीं है और इसे नया नाम देने की जरूरत है। सर्कुलर के मुताबिक अब अगर देश में मानसून के दौरान वर्षा सामान्य से 10 फीसदी कम होती है और देश के भूभाग में 20-40 फीसदी से कम तो इसे 'डिफिशन्ट इयर' कहा जाएगा, नाकि 'आल इंडिया ड्राउट इयर'। अगर देश भर में 40 फीसदी से भी कम वर्षा होती है तो इसे आल 'इंडिया सर्व ड्राउट इयर' की जगह पर 'लार्ज डिफिशन्ट इयर' कहा जाएगा।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में 'सूखे' शब्द को लेकर कुछ लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। मौसम विज्ञान विभाग ने कभी भी अपनी मौसम संबंधी भविष्यवाणियों में सूखे शब्द का प्रयोग नहीं किया है।
आपको बताते चले कि मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार मौसम, भूगर्भ और कृषि के आधार पर सूखे की अलग-अलग परिभाषा दी गई है। एक राज्य जिसमे 90 फीसदी से कम बारिश हुई हो उसे मौसम के आधार सूखा ग्रस्त घोषित किया जा सकता है पर कृषि के आधार पर सूखा घोषित नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक सूखे को लेकर मौसम विज्ञान विभाग और केंद्र सरकार कभी कोई घोषणा नहीं करती हैं।