हवा से निकलेगा पीने का पानीः पीएम मोदी के क्षेत्र वाराणसी में 'मेघदूत' करेंगे ये करिश्मा, हैंडपंप, कुएं या आरओ की नहीं रह जाएगी जरूरत
अगर सरकार इसी तकनीकी की बड़ी साइज की मशीनें लगाती है, जिनकी पेयजल उत्पादन क्षमता 10 हजार लीटर प्रतिदिन तक होती है, तो इससे किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन, बस अड्डे या अन्य सार्वजनिक स्थल पर पानी की जरूरत आसानी से पूरी की जा सकती हैं।
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अगर वैज्ञानिकों का प्रयोग सफल रहा तो पीने के पानी की समस्या पुराने जमाने की बात हो जाएगी। लोग सीधे हवा से पीने का शुद्ध पानी प्राप्त कर सकेंगे। इसके लिए न तो कुएं खोदने, हैंडपंप लगाने और न ही पाइपलाइन बिछाने की आवश्यकता होगी। आप अपने घर में सामान्य आरओ के साइज की एक मशीन लगाकर अपने दिनभर की जरूरत का पानी सीधे हवा से निकाल सकेंगे। उत्तरी भारत में प्रयोग के तौर पर इसकी शुरूआत उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी से होगी। यदि यहां यह प्रयोग सफल रहता है तो इसे बाकी के अन्य राज्यों में भी अपनाया जाएगा।
मैथ्री नाम की कंपनी तेलंगाना में पहले से ही समुद्री क्षेत्रों में वायु से पेयजल प्राप्त कर रही है। समुद्र के आसपास के क्षेत्रों में आर्द्रता अधिक रहती है जिससे वहां हवा से पानी निकालना ज्यादा आसान रहता है। उत्तरी भारत के राज्यों की हवा में आर्द्रता कम रहती है। ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन कर यह पता करना चाहते हैं कि यह तकनीकी शुष्क वायु वाले क्षेत्रों में कितनी कामयाब रहेगी, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यह तकनीकी इन राज्यों में भी सफल रही तो इससे पेयजल की समस्या का बड़ा समाधान हो सकता है।
इससे उपलब्ध पानी की कीमत एक से 1.50 रूपये प्रति लीटर के बीच आती है जबकि बाजार में उपलब्ध सामान्य पीने का पानी 15 से 20 रूपये प्रति लीटर में मिलता है। व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन के बाद अनुमान है कि इसकी कीमत में और अधिक कमी आ जाएगी।
इस प्रोजेक्ट में तकनीकी सहयोग प्रदान कर रहे संस्थान टेरी के रिसर्च फेलो श्रेष्ठ तायल ने अमर उजाला को बताया कि एक औसत मशीन एक दिन में हवा से लगभग 150 लीटर पीने का पानी निकाल सकती है। यह एक परिवार की जरूरत के लिए बहुत पर्याप्त होता है। यह मशीन एक सामान्य आरओ मशीन की साइज के लगभग बराबर है और इसे घर में कहीं भी लगाया जा सकता है।
वहीं, अगर सरकार इसी तकनीकी की बड़ी साइज की मशीनें लगाती है, जिनकी पेयजल उत्पादन क्षमता 10 हजार लीटर प्रतिदिन तक होती है, तो इससे किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन, बस अड्डे या अन्य सार्वजनिक स्थल पर पानी की जरूरत आसानी से पूरी की जा सकती हैं। आरओ मशीनों की तरह इस तकनीकी में भी मशीन हवा से पानी निकालकर टैंक में एकत्र करती रहती है। जैसे ही टैंक में से कुछ पानी निकाला जाता है, यह दोबारा हवा से पानी खींचना शुरू कर देती है। इस प्रकार टैंक में हमेशा इसकी क्षमता भर का पानी भरा रहता है।
पानी के प्रदूषित होने का खतरा नहीं
पेयजल की गुणवत्ता के मामले में इस तकनीकी से प्राप्त पानी विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होता है। सामान्य तौर पर जब टोंटी से पानी सप्लाई किया जाता है, तब पाइपलाइन के सड़ने-गलने या फटने के बाद पीने के पानी के साथ गंदा पानी मिल जाता है। यह लोगों के लिए डायरिया जैसी खतरनाक बीमारियों का कारण बनता है, लेकिन इस तकनीकी में पानी उत्पादन से लेकर इस्तेमाल के बीच कहीं कोई प्रदूषित होने का खतरा नहीं रहता है, यह बेहद शुद्ध होता है।
कीमत का चैलेंज
इस तकनीकी की सफलता में कीमत एक बड़ा चैलेंज है जिसे पूरा करने की दिशा में काम किया जा रहा है। वर्तमान में 150 लीटर पीने का पानी पैदा करने वाली मेघदूत मशीन की कीमत 1.5 लाख रूपये के करीब आती है, जबकि सामान्य आरओ सिस्टम आठ से दस हजार रूपये के बीच आ जाता है। ऐसे में यह कम लोकप्रिय हो सकता है। लेकिन इस तकनीकी की उपयोगिता देखते हुए यदि सरकारें सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट की तरह इस पर भी सब्सिडी देना शुरू कर दें, तो इससे लागत कम कर इसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
पहाड़ी या दूर-दराज के क्षेत्रों को लाभ ज्यादा
इस योजना के सफल होने का सबसे बड़ा लाभ पहाड़ी या दूर-दराज के क्षेत्रों में मिल सकता है, जहां पीने का पानी उपलब्ध कराना बड़ा चैलेंज होता है। इन इलाकों तक पीने के पानी की पाइप बिछाना भी भारी समस्या वाला काम होता है, जबकि इस तकनीकी में पाइपलाइन बिछाने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। साथ ही समुद्री जहाजों में जहां लंबे समय तक चालक दल समुद्री एरिया के बीच में होते हैं, वहां भी इससे साफ पीने का पानी लगातार प्राप्त किया जा सकता है।
सामान्य तौर पर एक मशीन 15-20 वर्षों तक लगातार काम करती रह सकती है। इस बीच समय-समय पर एक फिल्टर बदलने की आवश्यकता होती है जिसकी बड़ी मशीनों के लिए कीमत लगभग पांच हजार रूपये आती है।
पूरी तरह ग्रीन होगी तकनीकी
अभी उपलब्ध मेघदूत मशीनें बिजली से संचालित होती हैं और एक आरओ जितना बिजली की खपत करती हैं। लेकिन इस प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक इसे सौर ऊर्जा से संचालित करने की तकनीकी पर काम कर रहे हैं। यह तकनीकी सफल होने पर उन दूर-दराज इलाकों में भी साफ पेयजल पाना आसान हो जाएगा, जहां बिजली की उपलब्धता बड़ा संकट है। साथ ही सौर ऊर्जा से संचालित होने पर इससे प्रदूषण शून्य हो जाएगा। इस तरह यह पूरी तरह ग्रीन टेक्नोलोजी पर आधारित हो जाएगी।
कितनी कारगर है तकनीकी
आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिक डॉक्टर राहुल गडकरी ने अमर उजाला को बताया कि हवा की नमी से पेयजल बनाने का तरीका वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तो पूरी तरह खरा उतरता है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इसकी कुछ सीमाएं हैं। इस तरीके से समुद्र के आसपास के इलाकों और पहाड़ी इलाकों में पेयजल प्राप्त किया जा सकता है, जहां लगभग वर्षभऱ हवा में पर्याप्त मात्रा में नमी मौजूद रहती है, लेकिन यह उत्तरी भारत के शुष्क इलाकों में, विशेषकर गर्मी के मौसम में उचित तरीके से काम नहीं कर सकता है। इस तकनीकी की सफलता के लिए न्यूनतम 60-70 प्वाइंट की नमी आवश्यक होती है, जो हर समय बनाए रखना संभव नहीं होगा। थोड़ी बदली हुई तकनीकी में लगभग इसी तकनीकी का उपयोग करते हुए पूर्वोत्तर के राज्यों में वातावरण से पेयजल पाने की अच्छी कोशिश हो चुकी है।
इस तकनीकी के उपयोग से वायु में नमी के बेहद कम हो जाने की संभावना व्याहारिक नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक वर्षा में भी हवा की नमी ही संघनित होकर वर्षाजल के रूप में पृथ्वी पर नीचे आती है। लेकिन एयर कंडिशन यंत्रों की तरह इसका भारी मात्रा में हर घऱ में उपयोग होने लगे तो इससे वायु में शुष्कता बढ़ने की कुछ संभावना हो सकती है। लेकिन इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले पर्याप्त अध्ययन की आवश्यकता होगी।
पुरस्कार भी
टेरी, मैथ्री और यूएनडीपी ने साथ मिलकर आठ विभिन्न वर्गों में पुरस्कारों की घोषणा भी की है। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों, संस्थाओं को दिए जाएंगे, जिन्होंने अपने-अपने इलाकों में पेयजल संरक्षण के लिए बेहतर काम किए होंगे।