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डॉ. हर्षवर्धन की विदाई: न सुधार सके सेहत, न डॉक्टरों का जीता भरोसा, मंत्री समूह तक रहा फेल

Thu, 08 Jul 2021 02:17 AM IST
Jeet Kumar परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Thu, 08 Jul 2021 02:17 AM IST
सार

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के दोनों कार्यकाल में स्वास्थ्य मंत्री से हटे डॉ. हर्षवर्धन...
  • कोरोना की पहली लहर से ही पीएमओ के हवाले था स्वास्थ्य मंत्रालय
  • दवाओं की कालाबाजारी से लेकर चिकित्सा अव्यवस्थाओं के हवाले रहा पूरा सिस्टम
  • सरकार की साख पर खड़े हुए सवाल, रामदेव-एलोपैथी प्रकरण ने भी कराया नुकसान

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Dr Harsh Vardhan who was the Health Minister in both the terms of modi sarkar, left the minister post
डॉ हर्षवर्धन - फोटो : PTI

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में एक बार फिर डॉ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य मंत्री का पद छोड़ना पड़ा। साल 2014 में मोदी सरकार के पहले स्वास्थ्य मंत्री रहे डॉ. हर्षवर्धन को चंद महीने बाद ही कुर्सी छोड़नी पड़ी और फिर जेपी नड्डा पूरे कार्यकाल तक स्वास्थ्य मंत्री रहे लेकिन साल 2019 में फिर से मोदी सरकार बनने पर डॉ. हर्षवर्धन को दोबारा स्वास्थ्य मंत्री बनने का मौका दिया गया।

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 लेकिन ठीक दो साल 38 दिन बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ गया क्योंकि इस दौरान कोरोना महामारी के बीच उनसे न सेहत सुधर सकी और न ही देश का चिकित्सक वर्ग उन पर भरोसा कर सका। इनकी निगरानी में प्रधानमंत्री कार्यालय से गठित मंत्री समूह की जिम्मेदारी भी ठीक तरीके से नहीं निभा सके।
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स्थिति यह रही कि देश में दवाओं की खुलेआम कालाबाजारी चलती रही। रेमडेसिविर, टोसिलिजुमैब, प्लाज्मा, आइवरमेक्टिन सहित तमाम दवाओं के लिए लोगों को धक्के खाने पड़े।
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अस्पतालों में बिस्तरों से लेकर ऑक्सीजन का संकट छाया रहा और दूसरी लहर में लाखों लोगों की मौत हुई। इन सब के बीच सरकार की साख पर सवाल खड़े  होने लगे लेकिन हद तब हुई जब बाबा रामदेव और एलोपैथी प्रकरण को भी वेसंभाल न सके।

इस प्रकरण को शांत करने और एलोपैथी चिकित्सकों में भरोसा कायम रखने के लिए बीते एक जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे आए और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के कार्यक्रम में सभी चिकित्सकों को संबोधित करना पड़ा।

स्वास्थ्य मंत्रालय के ही अधिकारियों की मानें तो स्वास्थ्य मंत्री पिछले साल ही बैकपुट पर चले गए थे जब कोरोना महामारी की शुरुआत हुई और प्रधानमंत्री कार्यालय से फैसले लिए जाने लगे। दिन ब दिन बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए पीएमओ को सभी कार्य छोड़ हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ा। वर्तमान में स्थिति यह है कि कोविड-19 को लेकर सरकार के सभी एम्पॉवर्ड ग्रुप में पीएमओ के उच्च अधिकारी भी शामिल हैं।

चर्चा यहां तक है कि स्वास्थ्य मंत्री का कार्यकाल अब तक केवल सोशल मीडिया पर ही चलता रहा। बाकी कार्य छोड़ कभी छत्तीसगढ़ तो कभी महाराष्ट्र और फिर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चलता रहा।

दो महीने तक गायब रहा मंत्री समूह
महामारी से लड़ने के लिए सरकार ने करीब एक दर्जन से अधिक मंत्रालयों का एक समूह बनाया जिसकी अध्यक्षता डॉ. हर्षवर्धन कर रहे थे। अभी तक इस समूह की 29 बार बैठक पिछले डेढ़ साल में हो चुकी है लेकिन इस साल जनवरी माह के बाद फरवरी और मार्च में मंत्री समूह की कोई बैठक ही नहीं हुई। ये समय वह था जब वायरस के म्यूटेशन होते चले गए और कोविड सतर्कता नियमों पर ध्यान न रखते हुए देश एक बड़े संकट में आकर खड़ा हो गया।

नेता-कार्यकर्ता भी नहीं रहे खुश
चूंकि दिल्ली की चांदनी चौक से डॉ. हर्षवर्धन सांसद हैं। इसलिए दिल्ली भाजपा में यहां तक चर्चा है कि दूसरी लहर में जब कार्यकर्ता और नेताओं के घर मरीज ऑक्सीजन, इलाज व दवाओं के लिए तड़पते रहे तब उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। न ही भाजपा के जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई सुनवाई हुई।


गैर चिकित्सीय के लिए आसान नहीं राह
कोरोना महामारी के बीच नए स्वास्थ्य मंत्री को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं लेकिन मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि अगर मंत्री गैर चिकित्सीय हुए तो उनके लिए आगे की राह आसान नहीं होगी क्योंकि इस वक्त मंत्रालय और उनसे जुड़े पूरे सिस्टम को एक ऐसे स्वास्थ्य मंत्री की आवश्यकता है जो चिकित्सीय पेशे से भी जुड़ा हो क्योंकि स्वास्थ्य के साथ-साथ अनुसंधान और टीकाकरण को लेकर मौजूदा चुनौतियों का सामना करने में गैर चिकित्सीय मंत्री को थोड़ा वक्त लग सकता है।

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