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SC: 'आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में सावधानी बरतें, पुलिस को संवेदनशील बनाने की जरूरत'; कोर्ट की टिप्पणी

Fri, 17 Jan 2025 07:27 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 17 Jan 2025 07:27 PM IST
सार

SC: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 306 का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। पुलिस इस धारा का इस्तेमाल बहुत जल्दी कर देती है। हालांकि, जिन मामलों में वास्तव में इस धारा का उल्लंघन हुआ हो, वहां आरोपियों को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। 

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Don't invoke abetment of suicide mechanically, need to sensitise police: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत केवल इस वजह से नहीं दर्ज किया जाना चाहिए कि मृतक के परिजन भावनात्मक रूप से टूटे हुए हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पुलिस को बहुत अधिक सतर्क और संवेदनशील होने की जरूरत है, ताकि किसी निर्दोष के खिलाफ कोई गलत मुकदमा न चलाया जा सके। 
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जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को बेबुनियाद आरोप के तहत परेशान न किया जाए। बेंच ने कहा, आईपीसी की धारा 306 का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। पुलिस इस धारा का इस्तेमाल बहुत जल्दी कर देती है। हालांकि, जिन मामलों में वास्तव में इस धारा का उल्लंघन हुआ हो, वहां आरोपियों को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन इसे केवल (मृतक के) परिवार के भावनात्मक दबाव के तहत नहीं लगाया जाना चाहिए। 
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कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी और मृतक के बीच बातचीत, उनके संबंधियों और उनके बीच हुई बातचीत को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बातचीत में कहे गए शब्दों को बिना किसी स्पष्ट कारण के आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 
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शीर्ष कोर्ट का यह फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर आया। याचिका में महेंद्र आवसे नामक व्यक्ति ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को खारिज करने की अपील की थी। मामले के अनुसार, मृतक व्यक्ति ने आत्महत्या करने से पहले एक नोट में लिखा कि आवसे द्वारा उसे परेशान किया जा रहा था। 


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में धारा 306 के तहत आरोप तभी लगाए जा सकते हैं, जब यह साबित हो कि आरोपी ने किसी तरह से आत्महत्या के लिए उकसाया था या उसकी परिस्थितियों को ऐसा बन दिया था कि आत्महत्या के लिए अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। कोर्ट ने कहा कि आवसे के खिलाफ आरोपों में कोई ठोस वजह नहीं दिख रही। आवसे द्वारा दिए गए ऋण के भुगतान की मांग को आत्महत्या के लिए उकसाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राथमिकी बहुत ही अजीब तरीके से दो महीने की देरी से दर्ज की गई थी, जिससे यह मामला और भी संदिग्ध हो गया। 
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