काबुल में अमेरिकी इंटेलिजेंस की कहानी: पक्का खुफिया अलर्ट होने के बावजूद अपने मरीन नहीं बचा सका 'महाशक्ति'
कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, काबुल में यूएस 'इंटेलिजेंस' की अपनी कहानी है। पहला अलर्ट चूंकि हवाई अड्डे का था, जहां पहले से ही हजारों लोग खड़े थे। इतनी भीड़ में यूएस को हमलावर की स्क्रीनिंग का मौका ही नहीं मिल सका, नतीजा, उसने वहीं पर धमाका कर दिया...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अफगानिस्तान में दो-तीन दिनों के भीतर काफी उथल-पुथल मची रही। अमेरिकी सेना वापस लौट रही थी। आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और दूसरे देशों के सैनिक एवं नागरिक भी अपने-अपने देशों को लौटने लगे थे। एकाएक अमेरिकी रक्षा विभाग 'पेंटागन' की तरफ से यह अलर्ट आता है कि काबुल एयरपोर्ट पर हमला हो सकता है। इसमें आत्मघाती धमाके का जिक्र किया गया। अमेरिका ने काबुल हवाई अड्डे के तीन गेटों से अपने नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों को दूर जाने की हिदायत दी। तय समय अवधि के भीतर धमाका हो गया।
पक्का 'खुफिया' अलर्ट होने के बावजूद 'महाशक्ति' अपने 'मरीन' कमांडो को नहीं बचा सकी। लंबे समय तक इंटेलिजेंस में रहे कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, काबुल में यूएस 'इंटेलिजेंस' की अपनी कहानी है। पहला अलर्ट चूंकि हवाई अड्डे का था, जहां पहले से ही हजारों लोग खड़े थे। इतनी भीड़ में यूएस को हमलावर की स्क्रीनिंग का मौका ही नहीं मिल सका। बड़ी बात यह रही कि आतंकी संगठन 'आईएसआईएस-खोरासान' के आत्मघाती हमलावर को गेट के अंदर नहीं जाने दिया गया। नतीजा, उसने वहीं पर धमाका कर दिया।
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन से गत सप्ताह एक सवाल पूछा गया था कि अफगानिस्तान से यूएस आर्मी की जल्दबाजी में वापसी, क्या यह एक स्पष्ट खुफिया विफलता थी। बाइडन ने जवाब देते हुए कहा, उन्हें नहीं लगता कि यह एक विफलता थी, ये 'एक सरल विकल्प' था। अफगानिस्तान में पुलआउट के बाद के नतीजे 'अराजकता' के बिना एक तरह से नियंत्रित नहीं किए जा सकते थे। बाइडन ने अफगान सरकार और अफगान सेना के पतन के लिए दक्षिण एशियाई राष्ट्रों को भी दोषी ठहराया, क्योंकि उन्होंने प्रतिक्रिया के बीच खुद का बचाव किया। जब आपके पास अफगानिस्तान की सरकार थी, तो उस सरकार के नेता एक विमान में सवार होकर दूसरे देश में जा रहे थे। जब आपने अफगान सैनिकों के महत्वपूर्ण पतन को देखा, जिन्हें हमने प्रशिक्षित किया था। उन्हीं में से 300,000 जवान, बस अपने उपकरण छोड़कर इधर-उधर हो गए। वही हुआ, बस वही हुआ।
बतौर यशोवर्धन आजाद, 'इंटेलिजेंस' का फील्ड उतना आसान नहीं होता, जितना देखने में लगता है। जो भी 'खुफिया' सूचना मिलती है, उसे कई तरह से जांचा-परखा जाता है। उससे हजारों-लाखों लोगों का जीवन जुड़ा होता है, इसलिए ऐसे इनपुट को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इनपुट को कई तरह की प्रक्रिया से गुजारने के बाद ग्रेडिंग दी जाती है। संबंधित एजेंसी के साथ उसे साझा किया जाता है। इसके बाद भी वह सौ फीसदी पुख्ता, इस तथ्य का अभाव रहता है। हर परिस्थिति में एक इनपुट को नहीं काटा जा सकता। काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिका ने इनपुट जारी किया कि आत्मघाती हमला हो सकता है। कुछ समय सीमा भी बताई गई थी। यूएस ने तीन गेटों का जिक्र भी कर दिया कि यहां हमला होने की आशंका है। इसके बावजूद हमले को रोका नहीं जा सका और दर्जनभर मरीन कमांडो मारे गए। दरअसल, इस केस में एयरपोर्ट के आसपास जो भीड़ जमा थी, उसने 'हमलावर' की राह आसान कर दी। जहां हजारों लोगों की भीड़ है, अफरातफरी है और स्थानीय पुलिस जैसा कुछ नहीं है। ऐसे में हमले को रोक पाना मुश्किल है।
अमेरिका ने अपने सैनिकों और आम नागरिकों से कह दिया था कि वे तीनों सुरक्षा गेट से हट जाएं। यशोवर्धन आजाद ने कहा, बड़ी समस्या यह थी कि उस भीड़ को वहां से कैसे हटाते, जो नाले के भीतर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही है। यूएस ने आत्मघाती हमले का अलर्ट जारी किया था। जाहिर सी बात है कि भीड़ में उसे पहचानना आसान नहीं था, जबकि उस वक्त अमेरिकी सेना के पास लोकल एजेंसी का स्पोर्ट नहीं था। वहां हवाई अड्डे के दो पार्ट हैं। एक मिलिट्री साइड है और दूसरी सिविल लोगों के लिए है। ब्लास्ट करने वाले को यह पता था कि वह गेट के अंदर नहीं जा सकेगा। वहां पहचान या स्क्रीनिंग सिस्टम लगा है। वह बाहर ही भीड़ का हिस्सा बन गया। नतीजा, वह स्क्रीनिंग जैसी प्रक्रिया से बाहर हो गया। यही वजह रही कि उसे ब्लास्ट करने में कोई दिक्कत नहीं आई।
अमेरिका ने जब 'आईएसआईएस-के' आतंकियों की कार पर हमला किया तो उसे इनपुट के मुताबिक सफलता मिल गई। वहां भीड़ नहीं थी, इसलिए ड्रोन की मदद से टारगेट को मार गिराने में कोई दिक्कत नहीं आई। उस कार में विस्फोटक पदार्थों की पेटी बांधे लोग बैठे थे। काबुल एयरपोर्ट के आसपास होटल और दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर भी था। साथ ही हजारों लाखों लोगों की लंबी कतारें, इसके चलते पहले इनपुट के आधार पर हमले को नहीं रोका जा सका।