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अमन और भाईचारे की मिसाल रही दिल्ली के हालात बिगाड़ने का जिम्मेदार आखिर कौन?
Tue, 25 Feb 2020 04:38 PM IST
अमित कुमार
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
Published by: अमित कुमार
Updated Tue, 25 Feb 2020 04:38 PM IST
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Violence in delhi
- फोटो : अमर उजाला
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हमारी दिल्ली कभी ऐसी न थी। यहां की हर गली अमन और भाईचारे की मिसाल रही है। चांदनी चौक और जामा मस्जिद तो छोड़ दीजिए, ये आज जहां हिंसा हो रही है जाफराबाद, भजनपुरा, यमुना विहार, सीलमपुर, मौजपुर, गोकुलपुरी, कर्दमपुरी, घौण्डा से लेकर सादतपुर तक और शाहदरा से जुड़े तमाम इलाकों तक...। यहां बरसों से संकरी गलियों में लोग रहते आए हैं... कुछ कट्टर तो कुछ बेहद अमनपसंद।
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अपराध की कई वारदातें यहां जरूर होती रही हैं। अगर पुलिस की नजर से देखें तो इन्हें संवेदनशील इलाकों की फेहरिस्त में भी रखा जाता रहा है। बावजूद इसके, यहां आमतौर पर दंगे नहीं होते हैं। तनावपूर्ण स्थितियां तो कई दफा हुईं – अयोध्या में मस्जिद गिराए जाने के बाद भी और उसके बाद जब जामा मस्जिद और शाही इमाम सियासी तकरीर करते थे, तब भी। लेकिन हालात इतने कभी बिगड़े नहीं।
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वैसे भी मुसलमानों के पिछड़े इलाकों के बारे में धारणाएं बनाई गई हैं कि वो आमतौर पर इसलिए भी साथ रहते आए हैं ताकि संगठित तरीके से एकसाथ रह सकें, कोई मुश्किल आए तो मिलकर उसका मुकाबला कर सकें। हां, यह शक भी जाहिर किया जाता रहा है कि यहां कई ऐसे तत्व भी रहते आए हैं जिनके पास हथियारों का ज़खीरा भी होता है। आपराधिक गतिविधियां, काले कारोबार, इस्लामी आतंकवाद जैसे शब्द भी इन इलाकों से जोड़े जाते रहे हैं। मगर उनकी कमजोर आर्थिक हालत, बदहाल जीवनशैली की मजबूरियां, कुपोषण का आलम, शिक्षा और असुरक्षा के माहौल का हमेशा से राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है, ये यहां रहने वाले लोग बखूबी जानते हैं।
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तो क्या शाहीन बाग और यहां के इलाकों में फर्क है? नागरिकता कानून के खिलाफ तो शाहीन बाग में पिछले कई महीनों से शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहा है। वहां भी हालात बिगाड़ने की कई कोशिशें हुईं, लेकिन लोगों ने संयम का परिचय दिया। जाफराबाद में भी शाहीन बाग के साथ साथ ही आंदोलन शुरू हुआ था, लेकिन पिछले दो महीनों तक सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से चलते चलते आखिर अचानक ऐसा क्या और क्यों हो गया कि हालात इतने बिगड़ गए?
दिल्ली चुनाव बुरी तरह हार जाने के बाद जिस तरह कपिल मिश्रा जैसे शख्स बौखलाहट में भड़काऊ भाषण देते रहे हैं। दो दिन पहले धमकी वाले अंदाज़ में दिए गए कपिल मिश्रा के बयान ने जिस तरह हालात बिगाड़े, इतने लोगों की जानें गईं, सैकड़ों दुकानें जला दी गईं, मोहल्ले तबाह कर दिए गए और हालात लगातार बेकाबू होते चले जा रहे हैं, क्या केन्द्र सरकार इसी का इंतजार कर रही थी?
एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत की वो तस्वीर दिखाई जा रही थी, जहां संस्कृति से लेकर एकता-भाईचारे की मिसाल नज़र आती है। अहिंसा के पुजारी गांधी जी का आश्रम घुमाया जा रहा था, आगरा में मोहब्बत की निशानी दिखाई जा रही थी, वहीं दिल्ली लगातार धधक रही थी। एक तरफ मेलानिया ट्रंप सरकारी स्कूलों के हैप्पीनेस क्लास देखकर खुश हो रही थीं, तो दूसरी तरफ दिल्ली मौत और तबाही के भयानक और 'अनहैप्पी' माहौल में डूबती चली जा रही थी। मोदी जी ट्रंप के साथ रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में समझौते किए जा रहे थे, दूसरी तरफ देश के गृहमंत्री और दिल्ली के मुख्यमंत्री मिलकर दिल्ली के हालात सुधारने की कसमें खा रहे थे।
कहा ये जा रहा था कि शाहीनबाग और इससे प्रभावित होकर दूसरे इलाकों में फैला आंदोलन दिल्ली चुनाव के बाद खत्म हो जाएगा या करवा दिया जाएगा। मगर सीएए और एनआरसी की आग बुझने की बजाय और तेजी से धधकने लगी। इसे कुछ जानकार सोची समझी साजिश बताते हैं, तो कुछ ट्रंप के सामने भारत की छवि खराब करने की कोशिश करार देते हैं।
मगर इन सबसे अलग पुलिस की भूमिका और गृह मंत्रालय का रवैया सबसे ज्यादा संदेह पैदा करने वाला है। क्या इसे केजरीवाल सरकार को बदनाम करने की साजिश माना जाए, जो हमेशा से पुलिस अपने पास नहीं होने का रोना रोती रहती है? या केन्द्र सरकार की दिल्ली हारने की बौखलाहट समझा जाए? या फिर ये मान लिया जाए कि यह केंद्र और सियासत शाहीन बाग और इससे जुड़े आंदोलनों का फाइनल राउंड खेल रही है, ताकि इसके बाद इसे कुचलकर हमेशा के लिए शांत किया जा सके? जो भी हो, हालात बेहद खराब हैं और लगता नहीं कि इतनी आसानी से दिल्ली को फिर से पहले जैसा बनाया जा सकेगा।