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Earthquake: तीव्रता कम फिर भी दिल्ली में क्यों ज्यादा महसूस हुए झटके, क्या भूजल स्तर बढ़ने से भी घटता है खतरा?
Mon, 17 Feb 2025 05:18 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 17 Feb 2025 05:18 PM IST
सार
भूकंप की तीव्रता सिर्फ 4.0 रहने के बावजूद दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों को इतने तेज झटके क्यों महसूस हुए? दिल्ली में इससे तेज भूकंप आने की आशंका कितनी है और इससे कितना नुकसान हो सकता है? इसके अलावा चीन में ऐसी क्या व्यवस्था तैयार हो रही है, जिससे भूकंप का असर कम किया जा सकता है? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए अमर उजाला ने बात की नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के महानिदेशक ओपी मिश्र से।
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दिल्ली में भूकंप के बाद चर्चा में चीन का स्पंज सिटी मॉडल।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली-एनसीआर में सोमवार सुबह महसूस किए गए भूकंप के झटकों ने यहां रहने वाले लोगों को दहशत से भर दिया। अलसुबह पहले आए भूकंप के चलते लोग अपने घरों से बाहर निकलने को मजबूर हो गए। भारत के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (एनसीएस) के मुताबिक, दिल्ली के धौलाकुआं में केंद्रित रहे इस भूकंप की तीव्रता 4.0 रही।
इस भूकंप को लेकर कई सवाल लोगों के मन में हैं। मसलन इसकी तीव्रता सिर्फ 4.0 रहने के बावजूद दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों को इतने तेज झटके क्यों महसूस हुए? दिल्ली में इससे तेज भूकंप आने की आशंका कितनी है और इससे कितना नुकसान हो सकता है? इसके अलावा चीन में ऐसी क्या व्यवस्था तैयार हो रही है, जिससे भूकंप का असर कम किया जा सकता है? भारत में यह व्यवस्था किस तरह लागू हो सकती है? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए अमर उजाला ने बात की नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के महानिदेशक ओपी मिश्र से। आइये जानते हैं इस भूकंप को लेकर उन्होंने क्या कहा...
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इस भूकंप को लेकर कई सवाल लोगों के मन में हैं। मसलन इसकी तीव्रता सिर्फ 4.0 रहने के बावजूद दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों को इतने तेज झटके क्यों महसूस हुए? दिल्ली में इससे तेज भूकंप आने की आशंका कितनी है और इससे कितना नुकसान हो सकता है? इसके अलावा चीन में ऐसी क्या व्यवस्था तैयार हो रही है, जिससे भूकंप का असर कम किया जा सकता है? भारत में यह व्यवस्था किस तरह लागू हो सकती है? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए अमर उजाला ने बात की नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के महानिदेशक ओपी मिश्र से। आइये जानते हैं इस भूकंप को लेकर उन्होंने क्या कहा...
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दिल्ली में कम तीव्रता वाले भूकंप के बावजूद तेज झटके क्यों महसूस किए गए?
दिल्ली में भूकंप के बाद भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत भूकंप के रिकॉर्ड रखने वाली संस्था- नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (NCS) के मुताबिक, झटकों की तीव्रता 4.0 मापी गई। इस पर एनसीएस के ही महानिदेशक ओपी मिश्र ने कहा, ''भूकंप कितना तेज लगेगा, यह तीन चीजों पर निर्भर होता है- 1. इसका परिमाप (मैग्निट्यूड), 2. गहराई (डेप्थ) और 3. तीव्रता (इंटेनसिटी)।''
''इस भूकंप का परिमाप काफी कम दर्ज किया गया। इसलिए यह उतना खतरनाक नहीं रहा। लेकिन भूकंप की गहराई उतनी नहीं थी। यह शैलो (जमीन से कम गहराई पर) रहा। भूकंप जितना गहराई पर होगा, उसका असर उतना कम होगा। अफगानिस्तान जैसी जगहों पर तेज भूकंप भी अधिकतर गहराई पर होता है। इसलिए इसका असर दिल्ली और उत्तर भारत तक महसूस होता है, लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता है। क्योंकि भूकंपीय तरंगों की ऊर्जा जितनी गहराई से आती हैं, वह पृथ्वी के अंदर अलग-अलग परतों द्वारा सोख ली जाती है। दिल्ली में भूकंप का स्रोत धौलाकुआं में जमीन के नीचे पांच किमी में ही रहा। इसके चलते भूकंपीय लहरों की ऊर्जा सोखी नहीं जा सकी और इसका असर ज्यादा महसूस हुआ।''
दिल्ली में भूकंप के बाद भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत भूकंप के रिकॉर्ड रखने वाली संस्था- नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (NCS) के मुताबिक, झटकों की तीव्रता 4.0 मापी गई। इस पर एनसीएस के ही महानिदेशक ओपी मिश्र ने कहा, ''भूकंप कितना तेज लगेगा, यह तीन चीजों पर निर्भर होता है- 1. इसका परिमाप (मैग्निट्यूड), 2. गहराई (डेप्थ) और 3. तीव्रता (इंटेनसिटी)।''
''इस भूकंप का परिमाप काफी कम दर्ज किया गया। इसलिए यह उतना खतरनाक नहीं रहा। लेकिन भूकंप की गहराई उतनी नहीं थी। यह शैलो (जमीन से कम गहराई पर) रहा। भूकंप जितना गहराई पर होगा, उसका असर उतना कम होगा। अफगानिस्तान जैसी जगहों पर तेज भूकंप भी अधिकतर गहराई पर होता है। इसलिए इसका असर दिल्ली और उत्तर भारत तक महसूस होता है, लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता है। क्योंकि भूकंपीय तरंगों की ऊर्जा जितनी गहराई से आती हैं, वह पृथ्वी के अंदर अलग-अलग परतों द्वारा सोख ली जाती है। दिल्ली में भूकंप का स्रोत धौलाकुआं में जमीन के नीचे पांच किमी में ही रहा। इसके चलते भूकंपीय लहरों की ऊर्जा सोखी नहीं जा सकी और इसका असर ज्यादा महसूस हुआ।''
ओपी मिश्र ने बताया कि इस तरह के शैलो (जमीन में 5 से 10 किलोमीटर की गहराई से आने वाले) भूकंप, ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। सतह से निकटता के कारण हल्के भूकंप आमतौर पर गहरे भूकंपों की तुलना में अधिक तीव्र महसूस किए जाते हैं। चूंकि रात का समय था, इसलिए जब लोग सो रहे थे, तब इस तरह के झटके और ज्यादा डराने वाले होते हैं।
दिल्ली में क्या ज्यादा तेज भूकंप दर्ज होने पर खतरा बड़ा हो सकता है?
दिल्ली सेस्मोजेनिक जोन-IV में आता है। यहां अधिकतर भूकंप के झटके हल्के से मध्यम रेंज के होते हैं। इस जोन में (धौलाकुआं-झील पार्क) वाले क्षेत्र में 1993 से अब तक देखा जाए तो 200 ऐसे भूकंप आए हैं। इनमें 2007 में 4.6 तीव्रता का भूकंप भी आया था। लेकिन उससे इतना डर नहीं फैला था, क्योंकि उसक केंद्र 10 किलोमीटर की गहराई पर था। चूंकि दिल्ली सेस्मोजेनिक क्षेत्र में है, इसलिए छोटे-छोटे भूकंप यहां आते रहे हैं और आते रहेंगे। बड़े-बड़े भूकंपों के आने की आशंका कम है।
दिल्ली सेस्मोजेनिक जोन-IV में आता है। यहां अधिकतर भूकंप के झटके हल्के से मध्यम रेंज के होते हैं। इस जोन में (धौलाकुआं-झील पार्क) वाले क्षेत्र में 1993 से अब तक देखा जाए तो 200 ऐसे भूकंप आए हैं। इनमें 2007 में 4.6 तीव्रता का भूकंप भी आया था। लेकिन उससे इतना डर नहीं फैला था, क्योंकि उसक केंद्र 10 किलोमीटर की गहराई पर था। चूंकि दिल्ली सेस्मोजेनिक क्षेत्र में है, इसलिए छोटे-छोटे भूकंप यहां आते रहे हैं और आते रहेंगे। बड़े-बड़े भूकंपों के आने की आशंका कम है।
चीन में किस तरह से भूकंप के असर को कम करने की तैयारी हो रही है?
चीन ने हाल ही में अपने शहरों को स्पंज सिटी मॉडल पर विकसित करना शुरू किया है। वैसे तो चीन का यह मॉडल बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए तैयार किया गया है, ताकि ज्यादा वर्षा या किसी नहर-नदी या समुद्र में पानी बढ़ने की स्थिति से आसानी से निपटा जा सके। लेकिन यही मॉडल भूकंप के प्रभाव को कम करने में भी काफी अहम साबित हो रहा है। इस मॉडल के जरिए चीनी सरकार शहरों को अधिक लचीला बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे वे प्राकृतिक आपदाओं- भूकंप और बाढ़ का प्रभाव झेल सकें। इन स्पंज शहरों के जरिए बाढ़ के पानी को सड़कों पर इकट्ठा होने से रोका जा सकेगा और इसे इकट्ठा कर जमीन के नीचे ग्राउंडवॉटर लेवल को भी बढ़ाया जा सकेगा।
चीन ने हाल ही में अपने शहरों को स्पंज सिटी मॉडल पर विकसित करना शुरू किया है। वैसे तो चीन का यह मॉडल बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए तैयार किया गया है, ताकि ज्यादा वर्षा या किसी नहर-नदी या समुद्र में पानी बढ़ने की स्थिति से आसानी से निपटा जा सके। लेकिन यही मॉडल भूकंप के प्रभाव को कम करने में भी काफी अहम साबित हो रहा है। इस मॉडल के जरिए चीनी सरकार शहरों को अधिक लचीला बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे वे प्राकृतिक आपदाओं- भूकंप और बाढ़ का प्रभाव झेल सकें। इन स्पंज शहरों के जरिए बाढ़ के पानी को सड़कों पर इकट्ठा होने से रोका जा सकेगा और इसे इकट्ठा कर जमीन के नीचे ग्राउंडवॉटर लेवल को भी बढ़ाया जा सकेगा।
स्पंज सिटी मॉडल भूकंप के प्रभाव को कैसे कम करता है?
1. लचीले और झटके सहन करने वाली आधारभूत संरचना: स्पंज सिटी के निर्माण के लिए ऐसे कॉन्क्रीट मैटेरियल का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो कि सख्त होने के साथ-साथ छिद्रयुक्त भी हों, ताकि कहीं पानी भरने की स्थिति में इसकी निकासी आसानी से हो सके। ऐसे मैटेरियल बीच में ज्यादा जगह होने की वजह से फ्लेक्सिबल यानी लचीले होते हैं और भूकंप की स्थिति में कंपन को आसानी से सोख लेते हैं।
इनके इस्तेमाल से बने छिद्रदार फुटपाथ झटकों को सोखने में सहायक होते हैं और सड़कों पर दरारें पड़ने की आशंका कम हो जाती है।
2. जमीन के कटाव और इमारत गिरने की संभावना में कमी: पारंपरिक शहरों में भूकंप के दौरान पानी और मिट्टी के असंतुलन से भूस्खलन और भवन गिरने का खतरा रहता है। हालांकि, स्पंज शहरों के मॉडल में मिट्टी के कटाव को रोककर इमारतों की नींव मजबूत रहती है, जिससे भूकंप के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
1. लचीले और झटके सहन करने वाली आधारभूत संरचना: स्पंज सिटी के निर्माण के लिए ऐसे कॉन्क्रीट मैटेरियल का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो कि सख्त होने के साथ-साथ छिद्रयुक्त भी हों, ताकि कहीं पानी भरने की स्थिति में इसकी निकासी आसानी से हो सके। ऐसे मैटेरियल बीच में ज्यादा जगह होने की वजह से फ्लेक्सिबल यानी लचीले होते हैं और भूकंप की स्थिति में कंपन को आसानी से सोख लेते हैं।
इनके इस्तेमाल से बने छिद्रदार फुटपाथ झटकों को सोखने में सहायक होते हैं और सड़कों पर दरारें पड़ने की आशंका कम हो जाती है।
2. जमीन के कटाव और इमारत गिरने की संभावना में कमी: पारंपरिक शहरों में भूकंप के दौरान पानी और मिट्टी के असंतुलन से भूस्खलन और भवन गिरने का खतरा रहता है। हालांकि, स्पंज शहरों के मॉडल में मिट्टी के कटाव को रोककर इमारतों की नींव मजबूत रहती है, जिससे भूकंप के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
3. कम प्रदूषण और बेहतर पुनर्निर्माण: पारंपरिक शहरों में भूकंप के बाद मलबे और प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। हालांकि, स्पंज सिटी में उपयोग की जाने वाली अधिकतर संरचनाएं प्राकृतिक हैं और इनकी सामग्री का इस्तेमाल कई बार किया जा सकता है, जिससे छोटी-मोटी तबाही की स्थिति में ज्यादा नुकसान नहीं होता।
चीन के इस मॉडल का बड़े स्तर पर कितना असर?
एनसीएस के महानिदेशक ने चीन के इस मॉडल को लेकर कहा कि ग्राउंडवॉटर लेवल का भूकंप पर असर होता है। दरअसल, पृथ्वी के अंदर से आने वाले कंपन को जमीन के नीचे मौजूद पानी सोख लेता है। ऐसे में जमीन पर इसका असर कुछ हद तक कम हो जाता है। हालांकि, पानी की मौजूदगी हर जगह भूकंप का असर कम नहीं कर सकती। यह उस क्षेत्र की सॉइल (मृदा) निर्भर करता है। जिस तरह की शहर की मिट्टी होगी, उसी के आधार पर पानी की मौजूदगी का भूकंप पर असर पड़ेगा। भारत में भी मेट्रो शहरों में इसी तरह के भूकंप-रोधी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम चल रहा है।
एनसीएस के महानिदेशक ने चीन के इस मॉडल को लेकर कहा कि ग्राउंडवॉटर लेवल का भूकंप पर असर होता है। दरअसल, पृथ्वी के अंदर से आने वाले कंपन को जमीन के नीचे मौजूद पानी सोख लेता है। ऐसे में जमीन पर इसका असर कुछ हद तक कम हो जाता है। हालांकि, पानी की मौजूदगी हर जगह भूकंप का असर कम नहीं कर सकती। यह उस क्षेत्र की सॉइल (मृदा) निर्भर करता है। जिस तरह की शहर की मिट्टी होगी, उसी के आधार पर पानी की मौजूदगी का भूकंप पर असर पड़ेगा। भारत में भी मेट्रो शहरों में इसी तरह के भूकंप-रोधी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम चल रहा है।
ओपी मिश्र ने बताया कि भारत अपने कूटनीतिक स्तर पर अहम शहरों, जहां आबादी 5 लाख से ऊपर है और जो सेस्मिक हजार्ड जोन 3, 4 या 5 है। उसके लिए अलग से भूकंप का जोखिम कम करने वाले बिल्डिंग डिजाइन कोड बना रहा है। इसी को हम इंजीनियरिंग सॉल्यूशन कहते हैं। उन्होंने कहा, ''मौजूदा जानकारी के स्तर से भूकंप को रोका नहीं जा सकता, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। लेकिन हम इसके असर को कम कर के लोगों और संपत्ति के नुकसान को भी घटा सकते हैं।''
कोई और देश, जहां भूकंप को रोकने के लिए अपनाई जा रही अलग तकनीक?
एनसीएस महानिदेशक के मुताबिक, जापान चार टेक्टॉनिक प्लेट्स के जंक्शन पर स्थित है- प्रशांत महासागर, उत्तरी अमेरिकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट और फिलीपींस सागर की टेक्टॉनिक प्लेट। उसके यहां कम से कम 5 से 7 तीव्रता के भूकंप आने का कटऑफ ही है। जापान ने इसके बावजूद भूकंप रोधी ढांचे तैयार कर लिए हैं। वहां, भूकंप तो छोड़िए सुनामी आने पर भी किसी भी इमारत को नुकसान नहीं होता। 2011 में जापान में 9 तीव्रता का भूकंप आया था और जापान को कोई नुकसान नहीं हुआ था। जितना नुकसान हुआ था, वह सिर्फ ऊंची लहरों की वजह से हुआ था, जिसके लिए 15 मीटर की ऊंचाई तक तो तैयारी थी, लेकिन तब लहरें 30 मीटर ऊंची उठ गई थीं। लेकिन यह नुकसान हल्का रहा था।
इसी तरह ताइवान में भी भूकंप और सुनामी का खतरा लगातार बना रहता है। अमेरिका में भी भूकंप से निपटने का अलग सिस्टम है। भारत में भुज में जो भूकंप आया था, उसके बाद सरकार ने भूकंप के जोखिम से निपटने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए थे। लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि सभी टेक्टॉनिक जोन में एक-जैसी तकनीक नहीं अपनाई जा सकती है।
एनसीएस महानिदेशक के मुताबिक, जापान चार टेक्टॉनिक प्लेट्स के जंक्शन पर स्थित है- प्रशांत महासागर, उत्तरी अमेरिकी प्लेट, यूरेशियन प्लेट और फिलीपींस सागर की टेक्टॉनिक प्लेट। उसके यहां कम से कम 5 से 7 तीव्रता के भूकंप आने का कटऑफ ही है। जापान ने इसके बावजूद भूकंप रोधी ढांचे तैयार कर लिए हैं। वहां, भूकंप तो छोड़िए सुनामी आने पर भी किसी भी इमारत को नुकसान नहीं होता। 2011 में जापान में 9 तीव्रता का भूकंप आया था और जापान को कोई नुकसान नहीं हुआ था। जितना नुकसान हुआ था, वह सिर्फ ऊंची लहरों की वजह से हुआ था, जिसके लिए 15 मीटर की ऊंचाई तक तो तैयारी थी, लेकिन तब लहरें 30 मीटर ऊंची उठ गई थीं। लेकिन यह नुकसान हल्का रहा था।
इसी तरह ताइवान में भी भूकंप और सुनामी का खतरा लगातार बना रहता है। अमेरिका में भी भूकंप से निपटने का अलग सिस्टम है। भारत में भुज में जो भूकंप आया था, उसके बाद सरकार ने भूकंप के जोखिम से निपटने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए थे। लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि सभी टेक्टॉनिक जोन में एक-जैसी तकनीक नहीं अपनाई जा सकती है।