दिल्ली चुनाव में 'पाकिस्तान' की एंट्री, क्या बंद शाहीन बाग से खुलेगा भाजपा की जीत का रास्ता?
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शाहीन बाग...ये नाम नागरिकता कानून के विरोध का प्रतीक बन गया है। 15 दिसंबर 2019 से स्थानीय लोग सीएए-एनआरसी का विरोध करते हुए यहां धरना दे रहे हैं। अब इसकी गूंज दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी सुनाई देने लगी है। सवाल है कि क्या शाहीन बाग का मुद्दा दिल्ली के चुनाव नतीजों पर असर डालेगा? शाहीन बाग में धरना-प्रदर्शन का फायदा किसे मिलेगा? भारतीय जनता पार्टी को, आम आदमी पार्टी को या फिर कांग्रेस को?
विपक्ष की चुप्पी के बीच भाजपा लगातार आक्रामक अंदाज में इस मुद्दे को उठा रही है। इसके बहाने चुनाव में पाकिस्तान की एंट्री भी हो गई। भाजपा उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने अपने ट्वीट से हंगामा खड़ा कर दिया। हालांकि प्रचार के दौरान विपक्षी नेता इसे लेकर अमूमन चुप ही हैं और फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। लेकिन भाजपा ने मजबूती से इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है। तो क्या बंद शाहीन बाग से उसकी जीत का रास्ता खुल सकता है?
इस चुनाव में मजबूत दिख रहे अरविंद केजरीवाल पूरी तरह इस मुद्दे पर चुप हैं। हां, उनके सिपहसालार मनीष सिसोदिया ने जरूर इसका जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि वे प्रदर्शनकारियों के साथ हैं। बस, उनके बयान की देरी थी, भाजपा ने जोरदार हमला बोल दिया। आप से भाजपा में आए कपिल मिश्रा ने कहा कि शाहीन बाग में आतंकी आंदोलन चलाया जा रहा है। उन्होंने ये तक कह दिया कि 8 फरवरी (मतदान वाले दिन) को दिल्ली में हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मुकाबला होगा।
अगले दिन यानि 24 फरवरी को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी विपक्ष पर हल्लाबोल किया। उन्होंने कहा कि शाहीन बाग आप और कांग्रेस का पॉलिटिकल टास्क है। शाहीन बाग में जिन्ना वाली आजादी के नारे लग रहे हैं। लोगों को क्या चाहिए, जिन्ना वाली आजादी या भारत माता की जय?
इसी दिन करावल नगर में हुई रैली में अमित शाह ने आप को निशाने पर लेते हुए कहा कि ये आज भी निर्लज्ज होकर कहते हैं, हम शाहीन बाग वालों के साथ हैं। जो दंगे करते हैं, दंगे के लिए उकसाते हैं, उनको दिल्ली वालों ने वोट देना चाहिए? 25 फरवरी को भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा नए तथ्य लेकर आए और शाहीन बाग को दिशाहीन बाग और तौहीन बाग कह दिया।
विपक्ष की तरफ से जवाब नहीं आ रहा
तो विपक्ष शाहीन बाग के जिक्र से कतरा क्यों रहा है? जबकि भाजपा फ्रंटफुट पर खेल रही है। न कांग्रेस की तरफ से ये मुद्दा उछला न आप ने इस पर ज्यादा जोर डाला। क्या विपक्ष को ये डर सता रहा है कि अगर भाजपा ने शाहीन बाग की पिच पर मैच खेला तो बाजी पलट सकती है। साथ ही लगता है जैसे केजरीवाल शाहीन बाग के मुद्दे से दूर रहकर खुद को किसी भी तरह के विवाद से बचाना चाहते हैं और भाजपा के हाथ मुद्दा नहीं थमाना चाहते। वह अबतक प्रदर्शनकारियों के बीच भी नहीं पहुंचे हैं। क्या चुनाव के बाद उनकी रणनीति में बदलाव आएगा?
शायद केजरीवाल और विपक्ष को अहसास है कि अगर शाहीन बाग और सीएए-एनआरसी का मुद्दा जोर शोर से उठा तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है। सिसोदिया के बयान ने बता दिया कि ये मुद्दा किस कदर आग में घी का काम कर सकता है। केजरीवाल कभी नहीं चाहेंगे कि भाजपा को ऐसा मुद्दा थमाया जाए जो उसे मुकाबले में वापस ले आए।
मतदान हो सकता है बाधित
सियासी चर्चा के बीच शाहीन बाग कुछ और दिक्कतों की वजह भी बन सकता है। करीब 40 दिन से प्रदर्शनकारी यहां जुटे हुए हैं। अगर यहां हालात ऐसे ही रहे तो मतदान पर भी इसका असर पड़ने की संभावना है। कई मतदान बूथों पर धरना-प्रदर्शन का असर पड़ सकता है। बताया जा रहा है कि धरना-प्रदर्शन के चलते करीब 25 मतदान केंद्रों पर वोटिंग बाधित हो सकती है। इनमें से 20 केंद्र शाहीन बाग में ही हैं। इसके आसपास के इलाके भी प्रभावित हो सकते हैं।
अगर यहां पोलिंग पार्टी पहुंच भी जाए तो वोटर कैसे पहुंचेंगे। इसके अलावा दिल्ली में शाहीन बाग के अलावा जाफराबाद, मुस्तफाबाद, तुर्कमान गेट, खुरेजी, इंद्रलोक, भजनपुरा आदि में प्रदर्शन चल रहे हैं। यहां भी वोटिंग के दिन असर नजर आ सकता है। एक तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होगी जिसका सही संदेश कतई नहीं जाएगा।
धरना-प्रदर्शन के चलते सरिता विहार-कालिंदी कुंज मार्ग 40 दिन से बंद है और लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। डीएनडी भी जाम से जूझ रहा है। लोगों में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। अदालत भी कह चुकी है कि दिल्ली पुलिस हालात के मुताबिक फैसला ले सकती है। तो क्या मतदान से पहले पुलिस का एक्शन होगा? क्या मतदान होने तक केजरीवाल चुप रहेंगे? चुनाव नतीजे पर इसका कितना असर पड़ेगा? ऐसे कई सवालों के जिनके जवाब 11 फरवरी के बाद ही मिलेंगे।