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OPS-UPS: केंद्रीय बजट से रक्षा कर्मियों की उम्मीदें, 10 लाख तक आयकर में छूट की रखी मांग

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 31 Dec 2024 06:41 PM IST
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सार
Union Budget: साल के अंत में भी कर्मचारियों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर 12 मांगों को पूरा करने का आग्रह किया है। महासंघ ने अपने पत्र में कहा है कि नए साल में जब केंद्रीय बजट पेश हो, तो उसमें रक्षा कर्मचारियों की मांगों को लेकर सरकार का सकारात्मक रुख नजर आए।
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Defence personnel's expectations from Union Budget include income tax exemption up to Rs 10 lakh
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ, जिन मांगों के लिए कई वर्षों से संघर्ष कर रहा है, साल के अंत में भी कर्मचारियों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर 12 मांगों को पूरा करने का आग्रह किया है। महासंघ ने अपने पत्र में कहा है कि नए साल में जब केंद्रीय बजट पेश हो, तो उसमें रक्षा कर्मचारियों की मांगों को लेकर सरकार का सकारात्मक रुख नजर आए। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने 29 दिसंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा है। इस पत्र में जिन मांगों का जिक्र हुआ है, उनमें पुरानी पेंशन बहाली, आठवें वेतन आयोग का गठन, आयकर में दस लाख रुपये तक की छूट, तीन लाख रिक्त पड़े पदों को भरना और पांच रक्षा मंत्रियों का आश्वासन, सहित कई दूसरी मांगें शामिल हैं। 


श्रीकुमार के मुताबिक, 41 आयुद्ध कारखानों को निगमों में तब्दील करना, वह पांच रक्षा मंत्रियों द्वारा दिए गए लिखित आश्वासनों का उल्लंघन है। आने वाले दिनों में सबकी नजरें केंद्रीय बजट 2025-26 पर होंगी। एटक, एचएमएस, सीटू और इंटक सहित 10 प्रमुख केंद्रीय यूनियनों ने केंद्रीय बजट में शामिल करने के लिए अपने संयुक्त प्रस्ताव, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दे दिए हैं। 


अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ने केंद्रीय ट्रेड यूनियन द्वारा प्रस्तुत मांगों का समर्थन किया है। निर्मला सीतारमण को सौंपे गए अपने ज्ञापन में, एआईडीईएफ ने आयुध कारखानों के निगमीकरण को वापस लेने की बात कही है। श्रीकुमार का कहना है, हमारा अनुभव है कि सरकार, बजट में औद्योगिक घरानों, कॉरपोरेट्स और मल्टी-नेशनल कंपनियों के हितों का ध्यान रखती है। मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियनों की मांगों को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है। सरकार यह बात भूल जाती है कि श्रमिक, धन निर्माता हैं। देश के आम लोग आयकर और जीएसटी के माध्यम से सरकार के राजस्व में योगदान करते हैं, लेकिन बजट में उनके हितों का ख्याल नहीं रखा जाता। 

223 साल पुराने कारखानों का निगमीकरण वापस हो ...  
पहली मांग, आयुध कारखानों के निगमीकरण को वापस लिया जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा तैयारियों के हित में सभी सरकारी रक्षा उद्योगों को मजबूत करने की आवश्यकता है। रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत 41 आयुध कारखाने, देश की रक्षा का चौथा बल है। ये कारखानें, सभी प्रकार के गोला-बारूद / हथियार / हथियार / टैंक / उपकरण / सेना के आराम का सामान / पैराशूट / वाहन / बूट और टेंट आदि का निर्माण करते हैं। भारत ने अब तक जितने भी युद्ध सफलतापूर्वक लड़े हैं, उनमें आयुध निर्माणियों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 223 साल पुराने इन कारखानों को 2021 में 7 गैर-व्यवहार्य कंपनियों में निगमित किया गया है। कर्मचारियों और इस महासंघ के विरोध के बावजूद सरकार ने यह निर्णय लिया था। इसके अलावा यह निर्णय 5 रक्षा मंत्रियों द्वारा दिए गए लिखित आश्वासनों का भी उल्लंघन है। आयुध कारखानों को निगमित करने का निर्णय, सरकार की विफलता है। एआईडीईएफ की मांग है कि सभी रक्षा उद्योग, सरकार को अपने हाथ में रखने चाहिएं। 

खाली पड़े 3 लाख से अधिक पदों को भरना ... 
वर्तमान में रेलवे, रक्षा आदि सहित केंद्र सरकार के सभी विभागों में 13 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। अकेले रक्षा क्षेत्र में 3 लाख से अधिक सिविलियन पद खाली हैं। इन सभी नौकरियों को अनुबंध और आकस्मिक के माध्यम से आउटसोर्स / निजीकरण किया जा रहा है। इन पदों को नियमित आधार पर भरा जाए। एनपीएस और यूपीएस को वापस लिया जाए। सीसीएस (पेंशन) नियम 1972, (अब 2021) के तहत गैर-अंशदायी परिभाषित और गारंटीकृत पेंशन को बहाल किया जाए। बजट के दौरान एनपीएस और यूपीएस को वापस लेने व सीसीएस (पेंशन) नियम 1972, (अब 2021) के तहत गैर अंशदायी परिभाषित और गारंटीकृत पेंशन को बहाल करने की घोषणा की जाए। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें केंद्रीय वेतन आयोग का गठन किया जाए। सशस्त्र बलों और अर्ध-सैन्य बलों सहित केंद्र सरकार के कर्मचारियों/पेंशनभोगियों का वेतन/पेंशन संशोधन 10 वर्षों में एक बार होता है। अगला वेतन/पेंशन संशोधन 01.01.2026 को होने वाला है। वर्ष 2015 से 2023 तक केंद्र सरकार का राजस्व भी दोगुना हो गया है, जिसमें केंद्र सरकार के कर्मचारियों का बहुत बड़ा योगदान है। इसके अलावा, केंद्र सरकार के सभी प्रतिष्ठानों में जनशक्ति की भारी कमी के कारण प्रत्येक कर्मचारी को 2 से अधिक कर्मचारियों का काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बढ़ती महंगाई और बढ़ते चिकित्सा एवं आवास व्यय आदि के कारण पेंशनभोगी भी गहरे संकट में हैं। यह भी एक तथ्य है कि कर्मचारियों के वेतन/पेंशन का एक बड़ा हिस्सा आयकर और जीएसटी आदि के नाम पर सरकार के पास वापस चला जाता है। 

18 महीने के डीए/डीआर का बकाया जारी करना ...  
कोविड 19 के दौरान 18 महीने के डीए/डीआर का बकाया जारी किया जाए। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए फेस्टिवल एडवांस की बहाली हो।  राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की एक बैठक में आधिकारिक पक्ष ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों को फेस्टिवल एडवांस बहाल करने पर सहमति व्यक्त की है। 2 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। फेस्टिवल एडवांस केवल एक ब्याज मुक्त ऋण है, जिसे 10 किस्तों में वसूल किया जाना है। ऐसे में वित्त मंत्री से यह अनुरोध किया गया है कि राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) में कर्मचारी पक्ष की मांग के अनुसार महोत्सव अग्रिम के रूप में 30,000/-प्रति वर्ष स्वीकृत करें। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को सीजीएचएस सुविधाओं के संबंध में संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन किया जाए। संसदीय स्थायी समिति ने राज्यसभा में केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और उनके आश्रितों के लिए व्यापक चिकित्सा सुविधाओं पर 162वीं रिपोर्ट दी थी। 

सीजीएचएस को लेकर ये हैं कर्मचारियों की मांगें ...  
एक बार रेफरल जारी होने के बाद, रोगी को निर्धारित उपचार प्रक्रिया/जांच से गुजरने के लिए सीजीएचएस डॉक्टर के पास दोबारा जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। पैनल में शामिल अस्पतालों द्वारा लाभार्थियों से अधिक राशि वसूलने की शिकायतों का निपटान करना व सीजीएचएस दरों में संशोधन किया जाए। अतिरिक्त वेलनेस सेंटरों की स्थापना, डॉक्टरों की कमी की समस्या का समाधान करना, मरीजों के प्रति डॉक्टरों और सहयोगी कर्मचारियों के रवैये में सुधार करना व सभी प्रकार की दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। वेलनेस सेंटरों के बुनियादी ढांचे में सुधार, आवास वेलनेस सेंटर, नए वेलनेस सेंटरों की स्थापना के संबंध में मानदंडों में छूट और नए शहरों, विशेषकर बड़े शहरों के उपनगरों में तेजी से नए वेलनेस सेंटर स्थापित की जाएं। समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि व्यावहारिक चीजों पर विचार-मंथन करने के लिए शीर्ष स्तर पर डॉक्टरों, लाभार्थियों और संसद सदस्यों की एक अखिल भारतीय समिति का गठन किया जाना चाहिए। उस समिति को सीजीएचएस की समीक्षा के बाद इसके समग्र पहलुओं पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। 

संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट लागू हो ...  
पेंशनभोगियों की शिकायतों पर संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन किया जाए। कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति ने 10 दिसंबर, 2021 को पेंशनभोगियों की शिकायतों पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में बीमा राशि और मासिक के संबंध में 7वीं सीपीसी की सिफारिशों को लागू करने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार के कर्मचारी समूह बीमा योजना में योगदान के लिए, समिति ने 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर 5%, 70 वर्ष की आयु तक पहुंचने पर 10% अतिरिक्त पेंशन प्रदान करने की सिफारिश की है। 75 वर्ष तक पहुंचने पर 15% अतिरिक्त पेंशन हो। पेंशनभोगियों के लिए निश्चित चिकित्सा भत्ता बढ़ाकर रु. 3,000/- प्रति माह करना। 12 वर्ष बाद परिवर्तित पेंशन की बहाली हो। राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) का कर्मचारी पक्ष वर्तमान 15 वर्षों के बजाय 12 वर्षों के बाद कम्यूटेड पेंशन की बहाली की मांग कर रहा है, क्योंकि सरकार ब्याज सहित 11 वर्षों के भीतर पूरी परिवर्तित पेंशन की वसूली कर लेती है। कई राज्य सरकारें 12 साल के बाद पेंशन के परिवर्तित हिस्से को बहाल कर रही हैं। पेंशनभोगियों से 15 वर्ष तक 40 प्रतिशत परिवर्तित पेंशन वसूलने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे में सरकार संराशीकृत पेंशन को संराशीकरण की तारीख से 12 वर्ष के बाद बहाल करने की करे।

सेवा मामलों पर न्यायालय के निर्णयों का कार्यान्वयन ... 
केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के सेवा मामलों पर न्यायालय के निर्णयों का कार्यान्वयन नहीं हो पा रहा है। सरकार द्वारा कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के सेवा मामलों की वास्तविक शिकायतों पर विचार नहीं करने के कारण उन्हें न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। यदि कर्मचारी किसी विशेष मुद्दे पर न्यायालय में असफल हो जाता है तो सरकार सर्वमान्य रूप से यह कहकर निर्णय लागू कर देती है कि यह न्यायालय का निर्णय है। यदि कर्मचारी, मुकदमा जीत जाता है तो सरकार उसे सुप्रीम कोर्ट तक घसीटती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की जाती हैं। जब पुनरीक्षण याचिका भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दी जाती है तो लाभ केवल अदालती मामले में याचिकाकर्ताओं तक ही सीमित रहता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही निपटाए गए मामले के लिए मुकदमेबाजी की संख्या बढ़ जाती है। 
 
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