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दहेज उत्पीड़न में सीधी गिरफ्तारी पर रोक के खिलाफ फैसला सुरक्षित
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Tue, 24 Apr 2018 01:55 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
दहेज प्रताडना के मामले में सीधे गिरफ्तारी पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। गत वर्ष जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने दहेज प्रताडना अधिनियम के हो रहे दुरूपयोग के मद्देनजर कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सोमवार को सभी पक्षों की दलीलों को सुनने केबाद फैसला सुरक्षित रख लिया। मालूम हो कि तीन सदस्यीय पीठ ने गत वर्ष अक्टूबर में दहेज उत्पीडन कानून केदुरूपयोग को रोकने के मद्देनजर दो सदस्यीय पीठ द्वारा दिशानिर्देश बनाने केनिर्णय पर पुन: परीक्षण करने का निर्णय लिया था।
पीठ ने कहा था कि जब 498ए को लेकर आईपीसी में पहले से ही प्रावधान है ऐसे में कोर्ट दिशानिर्देश कैसे बना साकता है? हां, यह जरूर कह कहा जा सकता है कि जांच एजेंसी को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते वक्त चौकस रहना चाहिए लेकिन गाइडलाइंस क्यों बनाना चाहिए। तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में सहयोग के लिए वरिष्ठ वकील वी शेखर और इंदू मल्होत्रा को अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया था।
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गत वर्ष 28 जुलाई को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दो सदस्यीय पीठ ने कई दिशानिर्देश जारी किए थे। इनमें दहेज उत्पीडन मामले में बिना जांच-पड़ताल के पति और ससुरालियों की गिरफ्तारी पर रोक की बात कही गई थी। साथ ही पीठ ने कहा था हर जिले में कम से एक परिवार कल्याण समिति का गठन करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि 498 ए की हर शिकायत को समिति केपास भेजा जाए और समिति की रिपोर्ट आने तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। साथ ही इस काम के लिए सिविल सोसाइटी को शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने कहा था कि धारा-498ए केतहत पुलिस या मेजिस्ट्रेट तक पहुंचने वाली शिकायतों को इस तरह की समिति केपास रेफर कर दिया जाना चाहिए। एक महीने में समिति की रिपोर्ट देना होगा। रिपोर्ट आने तक किसी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। इसकेबाद रिपोर्ट पर जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट को मेरिट के आधार पर विचार करेंगे। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा-498 ए की शिकायत की जांच विशिष्ट अधिकारी द्वारा होनी चाहिए।
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चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सोमवार को सभी पक्षों की दलीलों को सुनने केबाद फैसला सुरक्षित रख लिया। मालूम हो कि तीन सदस्यीय पीठ ने गत वर्ष अक्टूबर में दहेज उत्पीडन कानून केदुरूपयोग को रोकने के मद्देनजर दो सदस्यीय पीठ द्वारा दिशानिर्देश बनाने केनिर्णय पर पुन: परीक्षण करने का निर्णय लिया था।
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पीठ ने कहा था कि जब 498ए को लेकर आईपीसी में पहले से ही प्रावधान है ऐसे में कोर्ट दिशानिर्देश कैसे बना साकता है? हां, यह जरूर कह कहा जा सकता है कि जांच एजेंसी को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते वक्त चौकस रहना चाहिए लेकिन गाइडलाइंस क्यों बनाना चाहिए। तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में सहयोग के लिए वरिष्ठ वकील वी शेखर और इंदू मल्होत्रा को अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया था।
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गत वर्ष 28 जुलाई को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दो सदस्यीय पीठ ने कई दिशानिर्देश जारी किए थे। इनमें दहेज उत्पीडन मामले में बिना जांच-पड़ताल के पति और ससुरालियों की गिरफ्तारी पर रोक की बात कही गई थी। साथ ही पीठ ने कहा था हर जिले में कम से एक परिवार कल्याण समिति का गठन करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि 498 ए की हर शिकायत को समिति केपास भेजा जाए और समिति की रिपोर्ट आने तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। साथ ही इस काम के लिए सिविल सोसाइटी को शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने कहा था कि धारा-498ए केतहत पुलिस या मेजिस्ट्रेट तक पहुंचने वाली शिकायतों को इस तरह की समिति केपास रेफर कर दिया जाना चाहिए। एक महीने में समिति की रिपोर्ट देना होगा। रिपोर्ट आने तक किसी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। इसकेबाद रिपोर्ट पर जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट को मेरिट के आधार पर विचार करेंगे। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा-498 ए की शिकायत की जांच विशिष्ट अधिकारी द्वारा होनी चाहिए।