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Maharashtra: 'नाबालिग दाता से लीवर ट्रांसप्लांट की मंजूरी पर करें फैसला', केईएम अस्पताल को हाईकोर्ट का निर्देश
Fri, 31 Oct 2025 04:18 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: पवन पांडेय
Updated Fri, 31 Oct 2025 04:18 PM IST
सार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के केईएम अस्पताल को नाबालिग दाता से लीवर प्रत्यारोपण के लिए मंजूरी मांगने वाले व्यक्ति के आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। बता दें कि मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण अधिनियम के अनुसार मरीज के निकट संबंधी ही अंगदान कर सकते हैं।
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बॉम्बे हाई कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के केईएम अस्पताल को निर्देश दिया है कि वह एक ऐसे व्यक्ति की अर्जी पर जल्द फैसला करे, जो गंभीर लीवर की विफलता से जूझ रहा है और चाहता है कि एक नाबालिग लड़का उसे अपना लीवर दान करे। यह मामला इसलिए खास है क्योंकि इसमें लीवर देने वाला दाता मात्र 17 साल का है और कानूनी तौर पर निकट संबंधी की श्रेणी में नहीं आता। कानून के अनुसार, केवल पति / पत्नी, माता-पिता, बेटे-बेटी, भाई-बहन, दादा-दादी या पोते-पोतियां ही अंगदान कर सकते हैं।
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क्या है पूरा मामला?
यह व्यक्ति एक्यूट-ऑन-क्रॉनिक लीवर फेलियर (एसीएलएफ) नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित है। उसका कहना है कि उसका जीवन बचाने के लिए जल्द लीवर ट्रांसप्लांट जरूरी है। उसने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी कि सरकार और संबंधित प्राधिकरण उसके मामले में विशेष अनुमति दें, ताकि नाबालिग दाता से लीवर ट्रांसप्लांट संभव हो सके। उसे आशंका थी कि उसे अनुमति नहीं मिल सकती क्योंकि दाता नाबालिग है और कानून के तहत रिश्तेदार की परिभाषा में नहीं आता है।
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सरकारी पक्ष ने क्या दिया जवाब?
सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता पूनम कंथारिया ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि केईएम अस्पताल में मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत एक ऑथराइजेशन कमेटी बनाई गई है, जो ऐसे मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार रखती है।
यह भी पढ़ें - Milan 2026: भारतीय नौसेना का फरवरी में 'मिलन 2026' समुद्री अभ्यास, अमेरिका और रूस सहित 55 देश होंगे शामिल
बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या दिया आदेश?
इस मामले में जस्टिस मंजूषा देशपांडे की अवकाश पीठ ने कहा कि केईएम अस्पताल की कमेटी को इस अर्जी पर यथा संभव जल्द फैसला लेना चाहिए और अपनी रिपोर्ट 3 नवंबर तक अदालत में पेश करनी होगी।
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क्या है पूरा मामला?
यह व्यक्ति एक्यूट-ऑन-क्रॉनिक लीवर फेलियर (एसीएलएफ) नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित है। उसका कहना है कि उसका जीवन बचाने के लिए जल्द लीवर ट्रांसप्लांट जरूरी है। उसने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी कि सरकार और संबंधित प्राधिकरण उसके मामले में विशेष अनुमति दें, ताकि नाबालिग दाता से लीवर ट्रांसप्लांट संभव हो सके। उसे आशंका थी कि उसे अनुमति नहीं मिल सकती क्योंकि दाता नाबालिग है और कानून के तहत रिश्तेदार की परिभाषा में नहीं आता है।
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सरकारी पक्ष ने क्या दिया जवाब?
सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता पूनम कंथारिया ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि केईएम अस्पताल में मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत एक ऑथराइजेशन कमेटी बनाई गई है, जो ऐसे मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार रखती है।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या दिया आदेश?
इस मामले में जस्टिस मंजूषा देशपांडे की अवकाश पीठ ने कहा कि केईएम अस्पताल की कमेटी को इस अर्जी पर यथा संभव जल्द फैसला लेना चाहिए और अपनी रिपोर्ट 3 नवंबर तक अदालत में पेश करनी होगी।