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स्मृतिशेष: वाल्मीकि रामायण, महाभारत के अनुवाद के लिए याद किए जाएंगे देबरॉय, अर्थशास्त्र में थी विशेष रुचि
Sat, 02 Nov 2024 07:13 AM IST
शुभम कुमार
अमर उजाला, ब्यूरो
अमर उजाला, ब्यूरो
Published by: शुभम कुमार
Updated Sat, 02 Nov 2024 07:13 AM IST
सार
स्मृतिशेष: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय का निधन हो गया। उनके अर्थशास्त्र के साथ पुराणों, वाल्मीकि रामायण और महाभारत के अनुवाद में योगदान को लंबे समय तक याद किया जाऐगा।
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Bibek Debroy
- फोटो : ANI
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विस्तार
शास्त्रीय संस्कृत और प्राचीन ग्रंथों का गहरा ज्ञान बिबेक देबरॉय को बाकी अर्थशास्त्रियों से अलग करता था। उन्हें अर्थशास्त्र के साथ पुराणों, वाल्मीकि रामायण और महाभारत के अनुवाद के लिए भी लंबे समय तक याद किया जाएगा। वह अपनी रुचियों और ज्ञान के क्षेत्र में बेमिसाल थे।
संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद के लिए उनके गहरे जुनून, रेलवे सुधारों के प्रति उनके समर्पण, फाउंटेन पेन में रुचि और भारतीय-हिंदू जीवन में कुत्तों की भूमिका जैसे कुछ असामान्य विषयों में शोध के लिए भी उन्हें जाना जाता है। देबरॉय ने दर्जनों प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इनमें महाभारत के दस खंड, तीन खंडों वाली वाल्मीकि रामायण, शिव पुराण और लगभग एक दर्जन महापुराणों का संक्षिप्त संस्करण शामिल है।
चार दिन पहले लिखा था, बाहर एक दुनिया है जो मौजूद है
यह भी एक अजीब संयोग है कि देबरॉय ने अपने निधन से चार दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक स्तंभ में लिखा था, बाहर एक दुनिया है जो मौजूद है। अगर मैं वहां नहीं हूं तो क्या होगा? वास्तव में क्या होगा। वह पांच जून, 2019 तक नीति आयोग के सदस्य भी थे। उन्होंने कई किताबें, शोधपत्र और लोकप्रिय लेख लिखे। साथ ही कई अखबारों के लिए लेख लिखते रहे।
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अर्थशास्त्री के रूप में विवादों से भी रहा नाता
देबरॉय की आर्थिक रुचियों और शोध कार्यों में आर्थिक सिद्धांत, आय असमानता और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण जैसे कई क्षेत्र शामिल थे। सरकार के भीतर और बाहर लंबे समय तक कार्यरत अर्थशास्त्री के रूप में कई बार विवादों में भी रहे। इनमें 2005 में राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान के निदेशक (शोध) के रूप में एक विवाद भी शामिल है। उन्होंने एक शोध पत्र में गुजरात को आर्थिक स्वतंत्रता देने के मामले में भारत में अग्रणी राज्य बताया था। इसके बाद उनका तबादला कर दिया गया था। उस शोध पत्र को जर्मनी स्थित फ्रेडरिक-नौमान स्टिफ्टंग ने प्रायोजित किया था और संस्थान के संचालन की देखरेख करने वाले राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) ने प्रकाशित किया था।
राष्ट्रपति मुर्मू ने जताया दुख
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि देश ने एक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी खो दिया। उन्होंने नीति निर्माण से लेकर हमारे महान ग्रंथों के अनुवाद तक विविध क्षेत्रों को समृद्ध किया। भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य के बारे में उनकी समझ असाधारण थी।
गृह मंत्री अमित शाह ने जताया शोक
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शहा ने बिबेक देबरॉय की निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ। देबरॉय जी अद्वितीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान थे। जिन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहास और दर्शन के क्षेत्र में प्रचुर योगदान दिया। भारत की विकास यात्रा में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
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संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद के लिए उनके गहरे जुनून, रेलवे सुधारों के प्रति उनके समर्पण, फाउंटेन पेन में रुचि और भारतीय-हिंदू जीवन में कुत्तों की भूमिका जैसे कुछ असामान्य विषयों में शोध के लिए भी उन्हें जाना जाता है। देबरॉय ने दर्जनों प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इनमें महाभारत के दस खंड, तीन खंडों वाली वाल्मीकि रामायण, शिव पुराण और लगभग एक दर्जन महापुराणों का संक्षिप्त संस्करण शामिल है।
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चार दिन पहले लिखा था, बाहर एक दुनिया है जो मौजूद है
यह भी एक अजीब संयोग है कि देबरॉय ने अपने निधन से चार दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक स्तंभ में लिखा था, बाहर एक दुनिया है जो मौजूद है। अगर मैं वहां नहीं हूं तो क्या होगा? वास्तव में क्या होगा। वह पांच जून, 2019 तक नीति आयोग के सदस्य भी थे। उन्होंने कई किताबें, शोधपत्र और लोकप्रिय लेख लिखे। साथ ही कई अखबारों के लिए लेख लिखते रहे।
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अर्थशास्त्री के रूप में विवादों से भी रहा नाता
देबरॉय की आर्थिक रुचियों और शोध कार्यों में आर्थिक सिद्धांत, आय असमानता और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण जैसे कई क्षेत्र शामिल थे। सरकार के भीतर और बाहर लंबे समय तक कार्यरत अर्थशास्त्री के रूप में कई बार विवादों में भी रहे। इनमें 2005 में राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान के निदेशक (शोध) के रूप में एक विवाद भी शामिल है। उन्होंने एक शोध पत्र में गुजरात को आर्थिक स्वतंत्रता देने के मामले में भारत में अग्रणी राज्य बताया था। इसके बाद उनका तबादला कर दिया गया था। उस शोध पत्र को जर्मनी स्थित फ्रेडरिक-नौमान स्टिफ्टंग ने प्रायोजित किया था और संस्थान के संचालन की देखरेख करने वाले राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) ने प्रकाशित किया था।
राष्ट्रपति मुर्मू ने जताया दुख
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि देश ने एक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी खो दिया। उन्होंने नीति निर्माण से लेकर हमारे महान ग्रंथों के अनुवाद तक विविध क्षेत्रों को समृद्ध किया। भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य के बारे में उनकी समझ असाधारण थी।
गृह मंत्री अमित शाह ने जताया शोक
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शहा ने बिबेक देबरॉय की निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ। देबरॉय जी अद्वितीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी विद्वान थे। जिन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहास और दर्शन के क्षेत्र में प्रचुर योगदान दिया। भारत की विकास यात्रा में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।