पत्नी की लाश या समाज की बेहिसी का बोझ?
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मांझी ने कहा कि अस्पताल ने उनकी मदद करने से इंकार कर दिया था और उनके पास बस यही एक चारा था कि वह अपनी पत्नी की लाश को खुद ही उठा कर अपने गांव लेकर जाएं जो काफी दूरी पर था। टीवी चैनलों पर दाना मांझी को एक चादर में लिपटी हुई लाश को अपने कंधों पर लेकर चलते हुए दिखाए जाने का दृश्य बेहद दर्दनाक था।
यह भारतीय समाज की उदासीनता को दिखाता है जो काफी चिंताजनक है। भारत की कम से कम एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजार रही है। इनमें अधिकांश आबादी दलित और आदिवासियों की है जो देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं।
उनका जीवन मात्र कुछ सौ रुपये में बचाया जा सकता है
भारत की सामाजिक व्यवस्था का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह एक लोकतंत्र है और इसका सबसे कमजोर पहलू यह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी देश की राजनीति और संसाधन एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग की गिरफ्त में हैं। भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसका देश का गरीब और कमजोर वर्ग हिस्सा नहीं बन सका है। गरीब वर्ग जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अपना मालिकाना हक पहले ही खो चुका है।
देश की न्याय प्रणाली ऐसी बनाई गई है कि देश की बहुमत न्याय तक पहुँच नहीं सकती। चिकित्सा सुविधाएं इतनी महंगी हैं और संसाधन इतने कम है कि देश की एक बड़ी आबादी इलाज न हो पाने के कारण छोटी बीमारियों से मौत का शिकार हो जाती है। जबकि उनका जीवन मात्र कुछ सौ रुपये में बचाया जा सकता है।
भारत के विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें गरीब और कमजोर के लिए सोचने की जगह सीमित होती जा रही है। यह एक ऐसा समाज है जहाँ अधिकांश लोगों की सोच सिर्फ खुद तक सीमित है। दूसरों के बारे में सोचने और उनकी फिक्र करने की प्रवृति यहां कम मिलती है।
मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा
मांझी अपनी पत्नी की लाश नहीं भारतीय लोकतंत्र और समाज की बेहिसी का बोझ अपने कमजोर कंधों पर उठाए हुए थे। मांझी की पत्नी को चंद रुपयों में बचाया जा सकता था। समाज ने जीवन से ही नहीं, इस गरीब को मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा।
यह तस्वीर बहुत लंबे समय तक मानवता की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी। भारतीय समाज में भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र दाना मांझी के सामने हमेशा शर्मसार रहेगा।