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दादा साहेब फाल्के का नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों के लिए बन गया है कारोबार का जरिया
Thu, 21 Feb 2019 11:49 PM IST
Avdhesh Kumar
ब्यूरो रिपोर्ट, अमर उजाला
ब्यूरो रिपोर्ट, अमर उजाला
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Thu, 21 Feb 2019 11:49 PM IST
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dada saheb phalke award
दादा साहब फाल्के का नाम यहां खूब चमक रहा है। लेकिन मकसद फाल्के को किसी तरह की श्रद्धांजलि देना या उनके काम को नई पीढ़ी तक पहुंचाना नहीं है। फाल्के का नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों के लिए कारोबार का नया जरिया है। हर साल इनके नाम पर कोई न कोई नया अवार्ड प्रकट हो जाता है, ये जानते हुए भी कि दादा साहब फाल्के के नाम पर भारत सरकार पूरे साल में एक ही पुरस्कार देती है और वह भी भारतीय सिनेमा के किसी बड़े दिग्गज को। लेकिन यहां हर कोई मौजूद है। जिनकी पहली फिल्म ही सुपर फ्लॉप रही यहां आयुष शर्मा भी अवार्ड के हकदार हैं।
एक फिल्म और एक आइटम नंबर कर पाई मौनी रॉय को भी अवार्ड का आकर्षण यहां खींच लाया है। फ्रेडी दारूवाला और डब्बू रत्नानी जैसे हाशिये पर पहुंच चुके लोग भी हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला चेहरा यहां दिखा विकी कौशल का। विकी की फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइक ने 200 करोड़ से ऊपर की कमाई कर ली है।
उनके पिता शाम कौशल इंडस्ट्री के दिग्गज स्टंट डायरेक्टर हैं और आने वाले समय में भारत सरकार के दादा साहब फाल्के अवार्ड के दावेदार भी। लेकिन, अवार्ड पाने का उतावलापन विकी को एक ऐसे अवार्ड फंक्शन में ले आया, जिसकी कोई मार्केट वैल्यू तक नहीं है। और भी तमाम भूले बिसरे चेहरे या फिर कैमरों के सामने अपने चेहरा चमकाने की चाहत रखने वाले कलाकार यहां मौजूद हैं। इनमें से किसी को नहीं पता कि दादा साहब फाल्के नाम की अहमियत क्या है और केंद्र सरकार साल में एक बार ही इस नाम पर सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान देती है।
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एक फिल्म और एक आइटम नंबर कर पाई मौनी रॉय को भी अवार्ड का आकर्षण यहां खींच लाया है। फ्रेडी दारूवाला और डब्बू रत्नानी जैसे हाशिये पर पहुंच चुके लोग भी हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला चेहरा यहां दिखा विकी कौशल का। विकी की फिल्म उरी द सर्जिकल स्ट्राइक ने 200 करोड़ से ऊपर की कमाई कर ली है।
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उनके पिता शाम कौशल इंडस्ट्री के दिग्गज स्टंट डायरेक्टर हैं और आने वाले समय में भारत सरकार के दादा साहब फाल्के अवार्ड के दावेदार भी। लेकिन, अवार्ड पाने का उतावलापन विकी को एक ऐसे अवार्ड फंक्शन में ले आया, जिसकी कोई मार्केट वैल्यू तक नहीं है। और भी तमाम भूले बिसरे चेहरे या फिर कैमरों के सामने अपने चेहरा चमकाने की चाहत रखने वाले कलाकार यहां मौजूद हैं। इनमें से किसी को नहीं पता कि दादा साहब फाल्के नाम की अहमियत क्या है और केंद्र सरकार साल में एक बार ही इस नाम पर सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान देती है।
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