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Crude Crisis: गिरता रुपया, मंहगा तेल, मजबूत डॉलर और झुलसता भारत; आखिर कब तक चलेगा ये सब?
सार
जब दुनिया में तेल मंहगा था, रूस भारत को सस्ता तेल दे रहा था। भारत अपने हित से जोड़कर इसे ले रहा था। लेकिन बाद में अमेरिका को साधने के लिए भारत ने ये खरीद कम कर दी। रूस भारत का पुराना सामरिक और रणनीतिक साझीदार देश है। कई विपरीत मौकों पर उसने भारत का साथ दिया है।
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तेल की बढ़ती कीमतें और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भारतीय रिजर्व बैंक चाहता है कि 100 रुपया प्रति डॉलर की स्थिति न आए। भारत सरकार की इच्छा भी यही है। हालांकि अर्थशास्त्री और वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया इसे बस एक नंबर गेम का भ्रम मानकर रिजर्व बैंक को संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं। आइए जानते हैं कि गिरता रुपया, मंहगा तेल, मजबूत डॉलर के बीच में भारत कब तक झुलसेगा?
जब दुनिया में तेल मंहगा था, रूस भारत को सस्ता तेल दे रहा था। भारत अपने हित से जोड़कर इसे ले रहा था। लेकिन बाद में अमेरिका को साधने के लिए भारत ने ये खरीद कम कर दी। रूस भारत का पुराना सामरिक और रणनीतिक साझीदार देश है। कई विपरीत मौकों पर उसने भारत का साथ दिया है। भारत ने अमेरिका के विरोध को दर किनार कर उससे एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली का सौदा और रक्षा संबंध को जारी रखा है। भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर ब्रिक्स फोरम को मजबूती दी है और इसमें ईरान समेत तमाम देश जुड़े हैं। एससीओ में भी भारत साथ है। हालांकि रंजीत कुमार और पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि पश्चिम एशिया संकट के बाद से ईरान बहुत तेजी से उभरा है। अब वह ब्रिक्स में भी मजबूत स्थान रख सकता है। इसके सामानांतर चीन और रूस इस समय अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत बॉडिंग का संदेश दे रहे हैं। चीन से भारत प्रतिस्पर्धी संबंध रखता है। चीन हिन्द महासागरीय क्षेत्र में विस्तार की नीति पर लगातार काम कर रहा है।
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जब दुनिया में तेल मंहगा था, रूस भारत को सस्ता तेल दे रहा था। भारत अपने हित से जोड़कर इसे ले रहा था। लेकिन बाद में अमेरिका को साधने के लिए भारत ने ये खरीद कम कर दी। रूस भारत का पुराना सामरिक और रणनीतिक साझीदार देश है। कई विपरीत मौकों पर उसने भारत का साथ दिया है। भारत ने अमेरिका के विरोध को दर किनार कर उससे एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली का सौदा और रक्षा संबंध को जारी रखा है। भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका ने मिलकर ब्रिक्स फोरम को मजबूती दी है और इसमें ईरान समेत तमाम देश जुड़े हैं। एससीओ में भी भारत साथ है। हालांकि रंजीत कुमार और पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि पश्चिम एशिया संकट के बाद से ईरान बहुत तेजी से उभरा है। अब वह ब्रिक्स में भी मजबूत स्थान रख सकता है। इसके सामानांतर चीन और रूस इस समय अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत बॉडिंग का संदेश दे रहे हैं। चीन से भारत प्रतिस्पर्धी संबंध रखता है। चीन हिन्द महासागरीय क्षेत्र में विस्तार की नीति पर लगातार काम कर रहा है।
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क्वॉड मजबूत हो या फिर ब्रिक्स?
भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान का फोरम क्वॉड है। 23 से 26 मई के बीच अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत आ रहे हैं। इस दौरान ‘क्वॉड’को लेकर चर्चा होगी। जब भारत राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ से त्रस्त था तो इसने ‘ब्रिक्स’ फोरम पर थोड़ी ऊर्जा दिखाई। ब्रिक्स ने डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा में काम करने की इच्छा शक्ति दिखाई और इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ब्रिक्स की आलोचना पर उतर आए। हालांकि भारत की विदेश नीति लगातार तटस्थ रहने की रही है। भारत नॉन एलाइग्न मूवमेंट का अगुआ देश रहा है, लेकिन इस समय समीकरण साधने में चुनौती आ रही है। इसमें सबसे बड़ा संकट ऊर्जा सुरक्षा का है।
पड़ोसी देश कर रहे हैं खेल
पाकिस्तान से भारत की पारंपरिक दुश्मनी है। दोनों देशों के बीच में अगस्त 2014 से अब तक कोई विदेश सचिव स्तरीय वार्ता नहीं हो पाई है। चीन के साथ लद्दाख में गतिरोध बना है। मालदीव के साथ संबंध बहुत बेहतर नहीं हैं। बांग्लादेश के साथ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद से खराब चल रहे हैं। नेपाल में बालेन शाह सरकार के साथ संबंध को पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। इस तरह से भारत को अंतरराष्ट्रीय मोर्चे के साथ-साथ क्षेत्रीय मोर्चे पर भी जूझना पड़ता है।
भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान का फोरम क्वॉड है। 23 से 26 मई के बीच अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत आ रहे हैं। इस दौरान ‘क्वॉड’को लेकर चर्चा होगी। जब भारत राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ से त्रस्त था तो इसने ‘ब्रिक्स’ फोरम पर थोड़ी ऊर्जा दिखाई। ब्रिक्स ने डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा में काम करने की इच्छा शक्ति दिखाई और इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ब्रिक्स की आलोचना पर उतर आए। हालांकि भारत की विदेश नीति लगातार तटस्थ रहने की रही है। भारत नॉन एलाइग्न मूवमेंट का अगुआ देश रहा है, लेकिन इस समय समीकरण साधने में चुनौती आ रही है। इसमें सबसे बड़ा संकट ऊर्जा सुरक्षा का है।
पड़ोसी देश कर रहे हैं खेल
पाकिस्तान से भारत की पारंपरिक दुश्मनी है। दोनों देशों के बीच में अगस्त 2014 से अब तक कोई विदेश सचिव स्तरीय वार्ता नहीं हो पाई है। चीन के साथ लद्दाख में गतिरोध बना है। मालदीव के साथ संबंध बहुत बेहतर नहीं हैं। बांग्लादेश के साथ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद से खराब चल रहे हैं। नेपाल में बालेन शाह सरकार के साथ संबंध को पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। इस तरह से भारत को अंतरराष्ट्रीय मोर्चे के साथ-साथ क्षेत्रीय मोर्चे पर भी जूझना पड़ता है।
फिर कहां फंसी है गाड़ी?
भारत के निवेशक विदेश में पैसा लगा रहे हैं। विदेश के निवेशक डॉलर के मजबूत होने और परिस्थितियां बदलने के बाद अमेरिका की ओर रुख कर रहे हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए झटका है। देश के राज्य मुफ्त की रेवड़ी बांटकर सत्ता में बने रहने की नीति को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके लिए ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेना जरूरत बन रही है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत ईधन तेल आयात करता है और भारत को उसकी जरूरत देखकर कोई देश सस्ता तेल देने के लिए तैयार नहीं है। समस्या यहीं नहीं है, होर्मुज में नाकेबंदी और खाड़ी देश से गैस और तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। तीसरा संकट देश में सोने और चांदी का प्रेम है। भारत की परंपरा में इससे बने आभूषण का चलन है। दूसरे यह निवेश का सुरक्षित, फायदेमंद तरीका है। भारत को सोने का भी आयात करना पड़ता है। जेएनयू के पूर्व प्रो. अरुण कुमार तो लगातार इस बारे में चेताते रहते हैं। अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भी समय रहते चेताया, लेकिन तब बात आई गई हो गई।
तो अब आगे क्या?
प्रधानमंत्री ने एक साल संयम बरतने की सलाह दे दी है। माइक्रो इकोनॉमिक्स की समझ रखने वाले एसके सिंह कहते हैं कि अगर आज होर्मुज में सब कुछ सामान्य हो जाए, उसके बाद भी स्थिति को सामान्य होने में पांच-छह महीने का समय लगेगा। इसका अर्थ है कि संकट तो आएगा। लेकिन इससे भयभीत होने की जरूरत नहीं है। एसके सिंह कहते हैं कि आने वाले संकट को देखकर तैयारी करने की आवश्यकता है। कुछ कड़े फैसले लेने का समय है। विदेश मामले के जानकार एस के शर्मा करते हैं कि अभी हाल फिलहाल कोई समाधान होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए देश नागरिकों को राष्ट्र हित में अपना योगदान बढ़ाना चाहिए। संयम से काम लेना चाहिए। एसके सिंह कहते हैं कि अभी रुपया गिर रहा है। आगे भी गिरेगा। अरविंद पनगढि़या ने भी यही आशंका जताई है। अर्थशास्तत्रयों का मानना है कि मंहगाई भी बढ़ेगी।
भारत के निवेशक विदेश में पैसा लगा रहे हैं। विदेश के निवेशक डॉलर के मजबूत होने और परिस्थितियां बदलने के बाद अमेरिका की ओर रुख कर रहे हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए झटका है। देश के राज्य मुफ्त की रेवड़ी बांटकर सत्ता में बने रहने की नीति को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके लिए ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेना जरूरत बन रही है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत ईधन तेल आयात करता है और भारत को उसकी जरूरत देखकर कोई देश सस्ता तेल देने के लिए तैयार नहीं है। समस्या यहीं नहीं है, होर्मुज में नाकेबंदी और खाड़ी देश से गैस और तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। तीसरा संकट देश में सोने और चांदी का प्रेम है। भारत की परंपरा में इससे बने आभूषण का चलन है। दूसरे यह निवेश का सुरक्षित, फायदेमंद तरीका है। भारत को सोने का भी आयात करना पड़ता है। जेएनयू के पूर्व प्रो. अरुण कुमार तो लगातार इस बारे में चेताते रहते हैं। अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भी समय रहते चेताया, लेकिन तब बात आई गई हो गई।
तो अब आगे क्या?
प्रधानमंत्री ने एक साल संयम बरतने की सलाह दे दी है। माइक्रो इकोनॉमिक्स की समझ रखने वाले एसके सिंह कहते हैं कि अगर आज होर्मुज में सब कुछ सामान्य हो जाए, उसके बाद भी स्थिति को सामान्य होने में पांच-छह महीने का समय लगेगा। इसका अर्थ है कि संकट तो आएगा। लेकिन इससे भयभीत होने की जरूरत नहीं है। एसके सिंह कहते हैं कि आने वाले संकट को देखकर तैयारी करने की आवश्यकता है। कुछ कड़े फैसले लेने का समय है। विदेश मामले के जानकार एस के शर्मा करते हैं कि अभी हाल फिलहाल कोई समाधान होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए देश नागरिकों को राष्ट्र हित में अपना योगदान बढ़ाना चाहिए। संयम से काम लेना चाहिए। एसके सिंह कहते हैं कि अभी रुपया गिर रहा है। आगे भी गिरेगा। अरविंद पनगढि़या ने भी यही आशंका जताई है। अर्थशास्तत्रयों का मानना है कि मंहगाई भी बढ़ेगी।