CRPF Raising Day: यह केंद्रीय बल चीन-पाकिस्तान को भी मनवा चुका है वीरता का लोहा, प्रेरक है सीआरपीएफ का शौर्य
केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) के जवान अपना पराक्रम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखा चुके हैं। चीन और पाकिस्तान भी इनकी वीरता और शौर्य के सामने घुटने टेक चुके हैं। सीआरपीएफ ने लद्दाख के 'हॉट स्प्रिंग' क्षेत्र में चीन को और कच्छ के रण में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया था। तीन लाख से अधिक की संख्या वाला यह बल, हर जगह देश की शांति और सुरक्षा के लिए काम कर रहा है।
विस्तार
दुनिया का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ', रविवार को अपना 87वां स्थापना दिवस मना रहा है। 1939 में सीआरपीएफ का गठन क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस के नाम से किया गया था। इस फोर्स को इसका वर्तमान नया स्वरूप और ध्वज देने का काम देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। सीआरपीएफ एक ऐसा बल है, जिसने 'चीन' और 'पाकिस्तान' को भी अपना लोहा मनवाया है। सीआरपीएफ ने लद्दाख के 'हॉट स्प्रिंग' क्षेत्र में चीन को और कच्छ के रण में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया था। सरदार पटेल ने सीआरपीएफ की स्थापना की और ध्वज दिया। साथ ही इसके चार्टर को भी बहुत बखूबी चिह्नित करने का काम किया। सरदार पटेल के ही दिखाए गए रास्ते पर सीआरपीएफ ने इतनी लंबी गौरवशाली यात्रा पूरी की है।
आज यह बल अपने महानिदेशालय, 4 जोनल मुख्यालय, 21 प्रशासनिक सेक्टर, 2 परिचालनिक सेक्टर, 39 प्रशासनिक रेंज, 17 परिचालनिक रेंज, 43 ग्रुप केंद्र, 22 प्रशिक्षण संस्थान, 100 बिस्तरों वाले चार संयुक्त अस्पताल, 50 बिस्तरों वाले 18 संयुक्त अस्पताल, 6 फील्ड अस्पताल, 3 सीडब्लूएस, 7 एडब्लूएस, 201 सामान्य ड्यूटी बटालियन, 6 वीआईपी सुरक्षा बटालियन, 6 महिला बटालियन, 16 आरएएफ बटालियन, 10 कोबरा बटालियन, 7 सिग्नल बटालियन, 1 वीआईपी सुरक्षा ग्रुप और 1 स्पेशल ड्यूटी ग्रुप से युक्त एक बड़ा संगठन है। तीन लाख से अधिक की संख्या वाला यह बल, हर जगह देश की शांति और सुरक्षा के लिए काम कर रहा है।
लद्दाख के 'होट स्प्रिंग' में सीआरपीएफ के जांबाज सोनम वांग्याल ने वीरता का परिचय दिया था। सीआरपीएफ से रिटायर्ड और 'होट स्प्रिंग' मिशन के एकमात्र जीवित नायक सोनम वांगयाल ने बताया था, कि 1959 में चीनी सैनिकों ने लेह-लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की थी। भले ही भारतीय नायकों की संख्या मुट्ठीभर रही थी, लेकिन उन्होंने चीन की फौज का जमकर मुकाबला किया था। लद्दाख में चीनी फौज के सामने डीएसपी करमसिंह (आईटीबीएफ) ने मिट्टी हाथ में उठा कर कहा था, ये जमीन हमारी है। इसके बाद चीन की फौज की तरफ से एक पत्थर फेंका गया। बतौर वांगयाल, जब चीन की इस हरकत का विरोध किया गया तो उनके सैनिकों ने चारों तरफ से फायरिंग शुरू कर दी। भारत के कई जवान शहीद हुए। भारत के उन्हीं शहीदों के सम्मान में हर वर्ष 21 अक्तूबर को देश में पुलिस संस्मरण दिवस मनाया जाता है।
सोनम वांगयाल ने एक बातचीत में '21 अक्तूबर' और 'चीन की फौज' के धोखे को लेकर कई खुलासे किए थे। उन्होंने कहा था, हमारे जवान चीनी सैनिकों के साथ बहादुरी से लड़े थे। 21 अक्तूबर 1959 का दिन और 16,300 फुट की ऊंचाई पर भारतीय इलाके में घुसपैठ करने वाली चीन की फौज ने हमारे जवानों को धोखे से मार डाला था। उस वक्त लद्दाख में कई फुट बर्फ पड़ी थी। बतौर वांगयाल, मैं अकेला था। मेरे सामने दस जवानों के शव पड़े थे। शवों को लाने के लिए मैंने लकड़ी और तिरपाल का स्ट्रेचर बनाया। भारतीय जवानों के शवों को घोड़ों की मदद से खींचते हुए सिलुंग नाले के रास्ते होट स्प्रिंग (लेह में चीनी सैनिकों के कब्जे से मुक्त कराई गई भारतीय चौकी) तक लाया। शव इतने क्षत-विक्षत हो चुके थे कि उन्हें आगे ले जाना मुश्किल था। वांगयाल ने वहीं पर लकड़ियां एकत्रित कर अपने साथियों का अंतिम संस्कार कर दिया।
1962 की लड़ाई से पहले 1959 में चीनी सैनिकों ने लेह-लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की थी। मुट्ठीभर जवानों को होट स्प्रिंग पर चौकी स्थापित करने का आदेश मिला। भारतीय जवान चौकी स्थापित करने में तो कामयाब हो गए, लेकिन अपने लापता साथियों की तलाश के दौरान सैकड़ों चीनी सैनिकों ने उन्हें निशाने पर ले लिया। दर्जनभर जवानों को धोखे से मार डाला। जो बच गए उन्हें हिरासत में ले लिया गया। सितम्बर 1959 में वांगयाल के दस्ते को होट स्प्रिंग, जिसके निकट चीनी फौज पहुंच चुकी थी, पर चौकी स्थापित करने का आदेश मिला। 70 जवानों की दो टुकड़ी बनाई गई। एक का नेतृत्व आईटीबीएफ के डीएसपी करमसिंह और दूसरी टुकड़ी की कमान एसपी त्यागी को सौंपी गई। चौकी को चीनी कब्जे से मुक्त करा लिया गया, लेकिन सोनम सहित दर्जनभर जवान पकड़े गए। कुछ दिन बाद सोनम और उनके साथी चुशुल एयरपोर्ट के निकट रिहा कर दिए गए। बाद में पता चला कि डीएसपी करमसिंह की टुकड़ी के सात जवान जवान बेस कैंप पर नहीं पहुंचे।
20 अक्तूबर को डीएसपी कर्मसिंह के नेतृत्व में सोनम सहित करीब दो दर्जन जवान अपने लापता साथियों की तलाश में निकल पड़े। उन्हें रास्ते में चीनी सैनिकों और उनके घोड़ों के चिन्ह दिखाई दिए। इससे पहले कि वे कोई रणनीति बनाते, एकाएक चीनी सैनिकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। करमसिंह ने मिट्टी हाथ में उठाकर कहा, यह जमीन हमारी है। चीनी सैनिकों ने भी वैसा ही किया। खास बात है कि अगले दिन दोपहर तक यह खेल चलता रहा। लड़ाई का बहाना एक पत्थर बना, जिसे चीनी फौज के कमांडर ने फेंका था।
जब हमने विरोध किया तो हम पर चारों तरफ से फायरिंग शुरू कर दी गई। बर्फ में हमारे हथियार जवाब दे चुके थे। उस लड़ाई में हमारे दस जवान शहीद हुए और डीएसपी करमसिंह सहित कई सिपाही चीनी सैनिकों की गिरफ्त में आ गए। सिपाही मक्खन लाल जो कि उस वक्त घायल हुआ था, आज तक वापस नहीं लौटा। अन्य जवानों को बाद में रिहा कर दिया गया, मगर उनमें मक्खन नहीं था। बतौर सोनम, आज भी जब उसकी याद आती है तो मन भर उठता है।
1965 में सीआरपीएफ की छोटी सी टुकड़ी ने पाकिस्तान की इन्फेंट्री, जिसने गुजरात स्थित कच्छ के रण में 'टाक' और 'सरदार पोस्ट' पर हमला किया, को मुंह तोड़ जवाब दिया था। दुनिया हैरान थी कि अर्धसैनिक बल की सेकेंड बटालियन की दो कंपनियों (करीब 150 जवान) ने पाकिस्तानी सेना की 51 वीं ब्रिगेड के 35 सौ सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तान ने 14 घंटे में तीन बार हमले का प्रयास किया, लेकिन सीआरपीएफ के बहादुर जवानों ने उनके मंसूबे पूरे नहीं होने दिए। पाकिस्तान के पास तोपें भी थी, जबकि सीआरपीएफ जवानों के पास सामान्य हथियार थे। नतीजा, पाकिस्तान के 34 सैनिक मारे गए, जिनमें दो अफसर भी शामिल थे। चार को जिंदा पकड़ लिया गया। सीआरपीएफ के अदम्य शौर्य, रण कौशल और अद्वितीय बहादुरी के चलते हर साल 9 अप्रैल को शौर्य मनाया जाता है। 1965 में जब पाकिस्तान ने यह हमला किया तो उस वक्त बीएसएफ की स्थापना नहीं हुई थी।
अप्रैल 1965 में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा की एक सैनिक चौकी पर हमला करने की योजना बनाई। पाकिस्तानी सेना का मकसद भारतीय भू-भाग पर कब्जा करना था। इसके लिए उन्होंने ऑपरेशन डेजर्ट हॉक शुरू किया था। 9 अप्रैल, 1965 की सुबह 3 बजे पाकिस्तान की 51 ब्रिगेड ने अपने 3500 सैनिकों के साथ रण ऑफ कच्छ की 'टाक' और 'सरदार पोस्ट' पर हमला कर दिया। उस दौरान सीआरपीएफ और गुजरात राज्य पुलिस फोर्स को यहां पर तैनात किया गया था। सीआरपीएफ की दूसरी बटालियन की दो कंपनियां इस इलाके में सीमा पर तैनात थी। पाकिस्तान की एक पूरी इन्फेन्ट्री ब्रिगेड ने सरदार व टॉक चौकियों पर हमला कर दिया था।
करीब 14 घंटे तक यह भीषण समर चलता रहा। सीआरपीएफ के जवानों ने विशाल ब्रिगेड का डट कर मुकाबला किया और उसे सीमा से वापस खदेड़ दिया। इस युद्ध में सीआरपीएफ के जवानों ने पाकिस्तानी सेना के 34 जवानों को मार गिराया व 4 को जिंदा गिरफ्तार किया। इस युद्ध में सीआरपीएफ के सात जवानों ने निडरता से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और वे इतिहास में अमर हो गए। यह दुनिया के इतिहास में हुए कई युद्धों में से एकमात्र ऐसा युद्ध था जिसमें पुलिस बल की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन की विशाल ब्रिगेड को घुटने टेक वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।
70 के दशक के पश्चात जब उग्रवादी तत्वों द्वारा त्रिपुरा और मणिपुर में शांति भंग की गई तो वहां सीआरपीएफ बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी दौरान ब्रह्मपुत्र घाटी में भी अशांति थी। सीआरपीएफ की ताकत को न केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल्कि संचार तंत्र व्यवधान मुक्त रखने के लिए भी शामिल किया गया। 80 के दशक में जब पंजाब में आतंकवाद छाया हुआ था, तब राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर सीआरपीएफ की तैनाती की मांग की थी। मौजूदा समय में यह बल, 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने की मुहिम में लगा है।