CRPF: सीआरपीएफ डीजी ने कमांडेंट संवाद में खुद नोट किए पॉइंट, प्रमोशन में पिछड़े कैडर अफसरों को बंधी उम्मीद
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विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में लंबे समय से पदोन्नति के मोर्चे पर पिछड़ रहे कैडर अधिकारियों को नए डीजी अनीश दयाल सिंह से उम्मीदें बंध गई हैं। वजह, पिछले सप्ताह, यूनिट कमांडेंट के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बल प्रमुख की खुलकर बातचीत हुई है। सूत्रों का कहना है कि इस बैठक में यूनिट कमांडेंट द्वारा जो सुझाव दिए गए थे, उन्हें डीजी ने खुद नोट किया है। यूनिट कमांडेंट ने बटालियन के बजट को लेकर कई सुझाव दिए हैं। करीब डेढ़ दर्जन अधिकारियों ने इस बैठक में एचआरए का मुद्दा उठाया। अफसरों को भी जवानों की तर्ज पर एचआरए मिले। कैडर अफसरों की पदोन्नति को लेकर भी बातचीत हुई। बल में 'ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' और गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) पर भी अधिकारियों ने अपनी बात रखी। अटैचमेंट के चलते यूनिटों का कामकाज प्रभावित होता है, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान यह पॉइंट भी डीजी के समक्ष रखा गया।
13 जनवरी को यूनिट कमांडेंट से हुई थी बातचीत
अनीश दयाल सिंह, जिन्हें पिछले दिनों फोर्स प्रमुख की कमान सौंपी गई थी, उन्होंने 13 जनवरी को यूनिट कमांडेंट के साथ बातचीत की है। बल मुख्यालय से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई इस बातचीत में आरएएफ, कोबरा, वीएस विंग व एनएस के आईजी सहित कई दूसरे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। डीजी के समक्ष कई तरह के सुझाव रखे गए। इनमें बल की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने और बजट को लेकर कई तरह के सवाल सामने आए। कैडर अफसरों ने एचआरए का मुद्दा भी उठाया। अभी तक सभी अफसरों को जवानों की तर्ज पर एचआरए नहीं मिलता। इसके लिए कैडर अधिकारियों ने अदालती लड़ाई जीती थी। सीआरपीएफ में लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे कैडर अधिकारियों ने ओजीएएस/एनएफएफयू का मुद्दा भी उठाया।
अफ़सरों को लेनी पड़ रही अदालत की शरण
सीआरपीएफ में युवा अफसरों द्वारा फोर्स को छोड़ने के मामलों में तेजी देखी गई है। समय पर पदोन्नति न मिलने के कारण अनेक कैडर अधिकारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है। कैडर समीक्षा रिपोर्ट भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद सभी कैडर अफसरों को पदोन्नति एवं वित्तीय फायदे नहीं मिल सके हैं। कैडर अफसरों को अपने हितों से जुड़े मामलों में अदालत की शरण लेनी पड़ रही है। यूनिट कमांडेंट ने कल्याण, तकनीक, प्रोविजनिंग एवं ट्रेनिंग आदि विषयों को लेकर अपने सुझाव दिए। यूपीएससी की परीक्षा पास कर सीआरपीएफ व बीएसएफ में सीधी भर्ती के माध्यम से बतौर सहायक कमांडेंट के पद पर ज्वाइन करने वाले युवा अफसरों की पदोन्नति की राह लंबी होती जा रही है। सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति मिलने में ही लगभग 15 साल लग रहे हैं।
अधर में लटका है कैडर रिव्यू
पूर्व अधिकारियों के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में पदोन्नति की यह दूरी कम होने की बजाए बढ़ने के ही आसार दिख रहे हैं। वजह, दोनों ही बलों के कैडर रिव्यू की फाइल आगे नहीं सरक रही है। सीआरपीएफ का पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। इसी तरह बीएसएफ के कैडर रिव्यू को 12 सितंबर 2016 को कैबिनेट की स्वीकृति प्रदान की गई थी। नियम है कि हर पांच वर्ष में कैडर रिव्यू हो, मगर अभी तक इन दोनों ही बलों में कैडर रिव्यू नहीं हो सका है। इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरू की तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की।
हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया।
सभी को नहीं मिला एनएफएफयू का लाभ
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। उस वक्त कैडर अफसरों को यह उम्मीद जगी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे। इस मामले में सभी अफसरों को एनएफएफयू का लाभ नहीं मिल सका। रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया।
पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस
कैडर अफसरों के मुताबिक, सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की एक बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रही। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई। अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग है कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। अनेकों बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए।
न पदोन्नति मिली और न ही आर्थिक फायदा
कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी वे दोहरी मार झेल रहे हैं। सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को मनमर्जी से लागू कर दिया है। एनएफएफयू का फायदा देने के लिए पदोन्नति का नियम लागू किया गया। जब पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा था तो ही सरकार, एनएफएफयू लेकर आई थी। अब जिसकी पदोन्नति हो रही है, उसे ही एनएफएफयू दिया जा रहा है। कैडर अधिकारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का नोटिस, सर्वोच्च अदालत में फाइल किया गया है। कैडर रिव्यू को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का जो आदेश आया था, वह भी सुप्रीम कोर्ट में है। सर्वोच्च अदालत ने इन दोनों केसों को एक साथ क्लब कर दिया है। मौजूदा स्थिति में अधिकांश कैडर अफसरों को न तो एनएफएफयू का फायदा मिल सका और न ही समय पर उनका कैडर रिव्यू हो सका है। कैडर रिव्यू नहीं होने के कारण सीएपीएफ के ग्राउंड कमांडर व अन्य रैंक वाले अधिकारी पदोन्नति के मोर्च पर बुरी तरह पिछड़ गए हैं। सीधी भर्ती के माध्यम से विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ में आने वाले सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति लगभग 15 वर्ष में मिल रही है। डिप्टी कमांडेंट तक पहुंचने में 22 साल तो कमांडेंट के लिए 27 साल लग रहे हैं। डीआईजी, आईजी व एडीजी के पद तक कैसे और कब पहुंचेंगे, इस बाबत अंदाजा लगाया जा सकता है।