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Madras High Court: 'प्रेस पर शिकंजा खतरे की आहट'; अन्ना विवि यौन उत्पीड़न FIR लीक केस में हाईकोर्ट की टिप्पणी
Thu, 06 Feb 2025 01:05 PM IST
शिव शुक्ला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: शिव शुक्ला
Updated Thu, 06 Feb 2025 01:05 PM IST
सार
अटॉर्नी जनरल पी.एस. रमण ने कहा कि प्राथमिकी लीक की वजह तकनीकी खामी हो सकती है। यह राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली (सीसीटीएनएस) पर काम करते समय हुआ।
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हत्याकांड में कोर्ट का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मद्रास हाईकोर्ट ने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए अपने एक आदेश में उसकी स्वतंत्रता पर अहम टिप्पणी की है। हाई कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी के इलानथिरायन ने कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता और गोपनीयता सहयोगी हैं, वहीं उसकी निगरानी करना हमले के डर की तरह ही है। न्यायमूर्ति जी के इलानथिरायन ने यह टिप्पणी चेन्नई प्रेस क्लब और तीन पत्रकारों द्वारा दायर याचिकाओं का निपटारा करते हुए की। इस याचिका में अन्ना विश्वविद्यालय यौन उत्पीड़न एफआईआर लीक मामले की जांच की आड़ में पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) को उन्हें परेशान करने से रोकने की मांग की गई थी।
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इस मामले में फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जांच की आड़ में याचिकाकर्ताओं (रिपोर्टरों) के मोबाइल फोन जब्त करना, उन्हें उनके व्यक्तिगत और निजी डेटा की जानकारी तक पहुंच देने के लिए मजबूर करने के साथ ही निजी और गोपनीय जानकारी प्रकट करने के लिए कहना और कुछ नहीं बल्कि प्रेस पर हमला करने और निगरानी के डर से उन पर अत्याचार करना है।
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आगे न्यायाधीश ने कहा कि समाचार एजेंसी द्वारा प्राप्त या रिपोर्ट की गई जानकारी का स्रोत प्रेस परिषद अधिनियम की धारा 15(2) के अनुसार विशेषाधिकार प्राप्त संचार के दायरे में आता है। ऐसे में मोबाइल फोन या अन्य उपकरणों को जब्त करने से सूचना के स्रोत का खुलासा हो जाएगा। बावजूद इसके जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ताओं के सेल फोन जब्त कर लिए। वह भी उनके उपकरणों में मौजूद किसी भी जानकारी के बिना। वहीं, याचिकाकर्ताओं ने कभी भी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) अपलोड नहीं की या इसे सोशल मीडिया पर भी पोस्ट नहीं किया। ऐसे में जांच अधिकारी को याचिकाकर्ताओं से सेल फोन जब्त नहीं करना चाहिए था। यह प्रेस परिषद अधिनियम की धारा 15(2) का साफ उल्लंघन है।
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अदालत ने यह भी कहा कि जांच के दौरान एसआईटी ने एफआईआर दर्ज कराने वाले और उसे पुलिस के आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करने वाले लोगों से भी पूछताछ नहीं की। साथ ही मामले में जांच कर रहे अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं की तरह कोई समन और प्रश्नावली जारी नहीं की। ऐसे में यह कहना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एफआईआर दर्ज करते समय पुलिस ने सिर्फ इतना कहा कि तकनीकी खामियों के कारण इसे वेबसाइट पर अपलोड किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अन्ना विश्वविद्यालय यौन उत्पीड़न एफआईआर लीक मामले में पहले उस व्यक्ति की जांच की जानी चाहिए थी जिसने जिसने एफआईआर अपलोड की थी। हाईकोर्ट ने इस मामले में शीर्ष कोर्ट के एक फैसले का हवाला भी दिया। अदालत ने कहा कि भले ही एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस के आधिकारिक वेब पोर्टल पर अपलोड की जाती है। लेकिन, संवेदनशील प्रकृति के अपराधों जैसे यौन अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और POCSO अधिनियम के तहत संबंधित मामलों में एफआईआर अपलोड नहीं की जानी चाहिए थी। इसलिए, यौन अपराधों से संबंधित एफआईआर अपलोड करना भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था।
मामले में फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से संबंधित एफआईआर अपलोड करने के मुद्दे की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया। हालांकि एसआईटी के लिए अदालत ने कई निर्देश भी जारी किए।
एसआईटी और याचिकाकर्ताओं को दिए निर्देश
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि एसआईटी के पास जांच के उद्देश्य से याचिकाकर्ताओं को बुलाने की शक्ति है, लेकिन याचिकाकर्ता को किसी भी तरह से परेशान नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 31 जनवरी के समन के अनुसार एसआईटी के समक्ष पूछताछ के लिए उपस्थित होने और जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। साथ ही एसआईटी को बीएनएसएस की धारा 179 और 94 के तहत जारी 31 जनवरी, 2025 के समन के अनुसार 10 फरवरी या उससे पहले सभी याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं से पूछताछ पूरी करने को कहा।
इसके अलावा, न्यायाधीश ने कहा कि एसआईटी याचिकाकर्ताओं के मोबाइल फोन, उपकरण आदि तुरंत लौटाए, जो पूछताछ के दौरान उनसे जब्त किए गए थे। अदालत ने कहा कि पुलिस टीम याचिकाकर्ताओं के व्यक्तिगत विवरण - उनके दोस्तों, रिश्तेदारों, रिश्तेदारों, उनके गोपनीय स्रोतों और अन्य के बारे में पूछताछ नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि जांच के विवरण को सामान्य डायरी और केस डायरी में दर्ज किया जाएगा। न्यायाधीश ने कहा, एसआईटी को पूछताछ की आड़ में याचिकाकर्ताओं को परेशान करने से रोका गया। अदालत ने कहा कि एसआईटी पूछताछ की आड़ में कोई अप्रासंगिक सवाल नहीं पूछेगी।
क्या है मामला?
अन्ना यूनिवर्सिटी में हुई घटना ने पूरे चेन्नई को हिलाकर रख दिया है। तमिलनाडु की राजनीति गरमाने लगी है। यहां एक इंजीनियरिंग की छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न किया गया। मामला तब सामने आया, जब छात्रा ने इसकी पुलिस से खुद शिकायत की थी। शुरू में पुलिस ने केस को हल्के में लिया और कोई कार्रवाई नहीं की। सोशल मीडिया पर केस उछला तब पुलिस हरकत में आई। मामले में पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया। 37 वर्षीय आरोपी यूनिवर्सिटी परिसर के पास में बिरयानी बेचता है। घटना 23 दिसंबर की है।
वहीं एफआईआर लीक को लेकर पहले अटॉर्नी जनरल पी.एस. रमण ने कहा कि प्राथमिकी लीक की वजह तकनीकी खामी हो सकती है। यह राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली (सीसीटीएनएस) पर काम करते समय हुआ। उन्होंने बताया कि पुलिस ने 14 लोगों को पकड़ा किया है, जिन्होंने प्राथमिकी हासिल की और पीड़िता की पहचान सहित विवरण साझा किए। हाईकोर्ट ने यह भी पूछा कि पुलिस ने मीडिया से बात करने की अनुमति क्यों नहीं ली। अटॉर्नी जनरल ने बताया कि जिला कलेक्टर, एसपी और पुलिस आयुक्त मीडिया से बात कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सरकार से पूर्व अनुमति नहीं थी।