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कोरोना से बचाव: तीसरी लहर से बच्चों को बचाने के लिए इलाज की व्यवस्था ही विकल्प

Sun, 23 May 2021 06:25 AM IST
Kuldeep Singh अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली Published by: Kuldeep Singh Updated Sun, 23 May 2021 06:25 AM IST
सार

  • डॉक्टरों का कहना है कि पहली बार की तुलना में दूसरी लहर में बच्चों में संक्रमण की दर बढ़ी है। ऐसे में तीसरी लहर बच्चों के लिए और घातक हो सकती है
  • 40% बच्चों को वायरस से खतरा कम होने का अनुमान 
  • 60% बच्चों को महामारी की तीसरी लहर से खतरा

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Covid19: Treatment only option to save children from third wave of coronavirus
बच्चों में कोरोना के लक्षण - फोटो : Pixabay

विस्तार

देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के साथ ही तीसरी लहर को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का मानना है कि महामारी की तीसरी लहर में बच्चे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।

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  • आंकड़ों पर गौर करें तो महामारी की पहली लहर में आरटी-पीसीआर जांच में चार फीसदी संक्रमित मिले थे। जबकि दूसरी लहर में आंकड़ा 10 फ़ीसदी तक पहुंच गया है।
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  • आबादी से इसकी तुलना करेंगे तो देश भर में बच्चों की आबादी 30 करोड़ है। 14% यानी आबादी में 4.25 करोड़ बच्चे संक्रमित हो चुके हैं। 
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  • विशेषज्ञों का मत है कि आंकड़ों पर जोर देने की बजाय बच्चों को महामारी से बचाने के लिए इलाज की व्यवस्था पर जोर देना होगा। ऐसे ही बच्चों को भयावह स्थिति में जाने से बचाया जा सकता है।

लहर के साथ बच्चों में बढ़ रहा संक्रमण
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने फरवरी 2021 में एक रिपोर्ट में बताया था 25.3 फीसदी बच्चों में एंटीबॉडीज मिली थी। रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है, 25.3 फीसदी बच्चे संक्रमण की चपेट में आ चुके थे। डॉक्टरों का कहना है कि पहली बार की तुलना में दूसरी लहर में बच्चों में संक्रमण की दर बढ़ी है। ऐसे में तीसरी लहर बच्चों के लिए और घातक हो सकती है।

60% बच्चों को खतरा 
नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज बंगलुरू के वरिष्ठ वायरोलॉजिस्ट डॉ वी रवि का कहना है, पहली व दूसरी लहर में बच्चों में संक्रमण के आंकड़े व सीरो सर्वे के विश्लेषण के आधार पर कह सकते हैं कि देश में औसतन 40% बच्चे महामारी के संपर्क में आ चुके हैं। अगर ऐसा है तो तीसरी लहर में 60% बच्चों को संक्रमण का खतरा है।

डॉक्टर भी आशंकित 
आंकड़ों के हिसाब से भले 40 फीसदी बच्चों में एंटीबॉडीज का अनुमान है। कुछ डॉक्टरों का कहना है आंकड़ों के आधार पर तैयारी में लापरवाही भारी पड़ सकती है वैल्यू स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ जयप्रकाश का कहना है। बच्चों को तीसरी लहर से बचाने के लिए पूरी तैयारी करनी होगी जरा सी चूक भारी पड़ सकती है।

गांव में गंभीर बच्चों को इलाज की चुनौती
मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल के पीडियाट्रिक क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉक्टर प्रीथा जोशी बताती हैं- बड़े शहरों के कुछ चुनिंदा अस्पतालों में ही पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) और नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) की सुविधा है। 

महामारी अगर गांव के बच्चों तक पहुंचेगी तो मुश्किल बढ़नी तय है। ऐसे में बच्चों को संक्रमण से बचाने की सबसे पहले कोशिश होनी चाहिए। अस्पताल पहुंचने की नौबत का मतलब मुश्किल को दोगुना करना है।



बेड से लेकर ऑक्सीजन मास्क तक अलग
डोक्टर प्रीथा बताती हैं, बच्चों में संक्रमण से मल्टीसिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम (एमआईएस) का भी खतरा है। पीआईसीयू भी वयस्कों के आईसीयू से अलग होते हैं। बच्चों का ऑक्सीजन मास्क भी पूरी तरह अलग होता है, बड़ों के जो मास्क उपलब्ध हैं, वह बच्चों में काम नहीं करेंगे। ऐसे में बुनियादी सुविधाओं की तैयारी जरूरी है।

बच्चों में संक्रमण तो मुश्किल
आंकड़ों के आधार पर डॉ रवि का कहना है कि 30 करोड़ बच्चों में से 18 करोड़ बच्चों के संक्रमित होने की आशंका है। इसमें से अगर 20 फीसदी यानी 3.6 करोड़ बच्चे भी संक्रमित होते हैं और इसमें से भी एक फीसदी को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ जाए, तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।

  • 30 करोड़ आबादी है देश में बच्चों की 
  • अनुमान के अनुसार 14% बच्चे संक्रमित हैं देश में
  • 25.3% बच्चों में एंटीबॉडीज, आईसीएमआर का दावा 
  • 40% बच्चों को वायरस से खतरा कम होने का अनुमान 
  • 60% बच्चों को महामारी की तीसरी लहर से खतरा 
  • 10 से 15 लाख पीआईसीयू बैड तैयार करने में खर्च।
  • 60-70 हजार का इंजेक्शन एमआईएस से पीड़ित के लिए
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