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Vaccine Booster Dose : डब्ल्यूएचओ ने क्यों युवाओं को इसके लिए मना किया, जानिए कौन लगवा सकते हैं दूसरी बूस्टर डोज

Thu, 19 May 2022 11:42 AM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Thu, 19 May 2022 11:42 AM IST
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सार
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि दूसरी बूस्टर डोज का फायदा ज्यादा जोखिम वाले लोगों, स्वास्थ्य कर्मियों, 60 साल से अधिक उम्र के लोगों या कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर देखने को मिल रहा है। 
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Covid Vaccine Booster Dose Why WHO Forbade the Youth for This Know Who Can Get Another Booster Dose
डब्ल्यूएचओ ने डबल बूस्टर डोज के लिए रिपोर्ट शेयर की है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना संक्रमण से बचने के लिए कई देशों में दूसरी बूस्टर डोज की भी शुरुआत हो गई है। भारत में अभी पहली बूस्टर डोज को मंजूरी मिली है। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने दूसरी बूस्टर डोज को लेकर एक स्टडी रिपोर्ट जारी की है। इसमें दूसरी बूस्टर डोज को युवाओं के लिए असरदार नहीं बताया गया है। आइए जानते हैं कि डब्ल्यूएचओ ने क्या-क्या कहा और कौन लोग दूसरी बूस्टर डोज लगवा सकते हैं? 


ये लगवा सकते हैं दूसरी बूस्टर डोज
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि दूसरी बूस्टर डोज का फायदा ज्यादा जोखिम वाले लोगों, स्वास्थ्य कर्मियों, 60 साल से अधिक उम्र के लोगों या कम प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों पर देखने को मिल रहा है। 

डब्ल्यूएचओ ने टीकाकरण पर विशेषज्ञों के रणनीतिक परामर्श समूह (एसएजीई) के सुझाव भी बताए।

कहा, सामान्य तौर पर टीकों की प्रारंभिक खुराकों के पूरे होने के चार से छह महीने के अंतराल पर पहली बूस्टर खुराक लगाई जा सकती है। विशेष रूप से ओमीक्रोन के संबंध में ऐसा किया जा सकता है। डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा कि जिन लोगों की जान को ज्यादा खतरा है उनको mRNA वैक्सीन की बूस्टर डोज फायदा दिलाएगी। 

युवाओं पर दूसरी बूस्टर डोज का कोई खास असर नहीं
डब्ल्यूएचओ ने कुल सात अलग-अलग स्टडी का हवाला दिया। इसमें दूसरी बूस्टर डोज को लेकर पड़ताल की गई है। इसके मुताबिक, एक्सपर्ट को इस बात के सबूत नहीं मिले कि दूसरी बूस्टर डोज का युवाओं पर भी कोई फायदा होगा। 
 

क्या है mRNA बेस्ड वैक्सीन? 

mRNA बेस्ड वैक्सीन
mRNA बेस्ड वैक्सीन - फोटो : अमर उजाला
एमआरएनए तकनीक से बने टीके में वायरस के जिनेटिक कोड (mRNA) के एक छोटे हिस्से का इस्तेमाल कर शरीर में वायरस के हमले के खिलाफ इम्यूनिटी पैदा की जाती है। इसमें इंसानी कोशिकाओं के लिए निर्देश तय कर दिए जाते हैं कि उन्हें किस तरह के प्रोटीन बनाने हैं जो कि वायरस की कॉपी लगें और शरीर उनको पहचान लें। बाकी वैक्सीन में जहां वायरस का हिस्सा या मूल वायरस का इस्तेमाल होता है, वहीं एमआरएनए वैक्सीन में किसी असल वायरस का इस्तेमाल नहीं होता। 

क्या भारत में लगाई जा रही है कोई mRNA बेस्ड वैक्सीन? 
नहीं, अभी भारत में  mRNA बेस्ड वैक्सीन नहीं लगाई जा रही है। अभी अमेरिका, रूस जैसे कुछ देशों में इस तकनीक पर तैयार वैक्सीन लोगों को लगाई जा रही है। 



 

mRNA बेस्ड वैक्सीन और अन्य वैक्सीन में क्या अंतर है?

कोरोना वैक्सीन
कोरोना वैक्सीन - फोटो : अमर उजाला
हमने ये जानने के लिए इस्राइल के नेशनल बायोलॉजिकल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक स्वरुप कुमार पांडेय से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि भारत में बड़ों के लिए कोविशील्ड और कोवैक्सिन का सबसे ज्यादा प्रयोग हुआ है। कोविशील्ड वायरल वेक्टर तकनीक पर तैयार है।  इसे चिम्पांजी में पाए जाने वाले आम सर्दी के संक्रमण के एडेनोवायरस का इस्तेमाल कर बनाया गया है। एडेनोवायरस की आनुवंशिक सामग्री SARS-CoV-2 कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन की तरह ही है। स्पाइक प्रोटीन के जरिये ही वायरस शरीर की कोशिका में प्रवेश करता है। कोविशिल्ड वैक्सीन शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को कोरोना संक्रमण से बचने के लिए प्रतिरोधक तंत्र बनाने में मदद करता है। कोविशील्ड को इबोला वायरस से लड़ने वाली वैक्सीन की तरह ही बनाया गया है। 

वहीं, कोवैक्सिन को कोविड-19 के वायरस को निष्क्रिय कर बनाया गया है। वैक्सीन में निष्क्रिय कोविड-19 वायरस हैं, जो लोगों को बिना नुकसान पहुंचाए कोरोना संक्रमण के खिलाफ शरीर में प्रतिरोधक तंत्र बनाने में मदद करता है। संक्रमण के वक्त शरीर में एंटीबॉडीज बनाकर वायरस से लड़ता है। कोवैक्सीन को मौसमी बुखार, रेबीज, जापानी इंसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार) जैसी बीमारियों में दिए जाने वाले पारंपरिक टीके की तरह ही बनाया गया है। 

अब बात करें mRNA बेस्ड वैक्सीन की तो ये एक छोटे हिस्से का इस्तेमाल कर शरीर में वायरस के हमले के खिलाफ इम्यूनिटी पैदा की जाती है। इसमें इंसानी कोशिकाओं के लिए निर्देश तय कर दिए जाते हैं कि उन्हें किस तरह के प्रोटीन बनाने हैं जो कि वायरस की कॉपी लगें और शरीर उनको पहचान लें। बाकी वैक्सीन में जहां वायरस का हिस्सा या मूल वायरस का इस्तेमाल होता है, वहीं एमआरएनए वैक्सीन में किसी असल वायरस का इस्तेमाल नहीं होता। कोवैक्सिन जैसे टीके में मूल वायरस का इस्तेमाल होता है।
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