Coronavirus: क्या होती है कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग, कोरोना से लड़ने में कैसे है कारगर?
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- किसी भी महामारी में सबसे बड़ा हथियार है कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग
- कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग बिना खत्म नहीं हो सकता संक्रमण
- महामारी में सदियों से हो रहा कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग का इस्तेमाल
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विस्तार
महामारी घोषित हो चुके कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए दो ही चीजें कारगर हैं, पहला- आइसोलेशन और दूसरा कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग। ऐसा नहीं है कि कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग का इस्तेमाल पहली बार किसी महामारी को रोकने में हो रहा है। महामारी को रोकने में सबसे बड़ा हथियार कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग ही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग को लेकर गाइडलाइंस जारी किए हैं। तो आइए समझते हैं कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग होता क्या है और यह काम कैसे करता है?
क्या है कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग?
कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग का हिंदी अनुवाद करें तो इसे संपर्क अनुरेखण कहा जाएगा। कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग में उन लोगों को चिन्हित किया जाता है जिनसे संक्रमण या किसी बीमारी के फैलने का खतरा रहता है। अगर हमें इस बात की जानकारी हो जाती है कि फलां आदमी को संक्रमण है तो महामारी की स्थिति में यह भी संभव है कि उस संक्रमित व्यक्ति के कारण किसी और में भी संक्रमण फैल जाए। ऐसे में उस संक्रमित व्यक्ति पर नजर रखने की जरूरत पड़ती है और इसी प्रकिया को महामारी विज्ञान में कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग कहा गया है।
महामारी के दौरान संक्रमण का पता लगाने और उसे रोकने का यह सबसे सरल और पुराना तरीका है। यदि आप ऑनलाइन फिल्में देखते हैं तो आपको हॉलीवुड फिल्म कॉन्टेजिअन (Contagion) जरूर देखनी चाहिए, क्योंकि इस फिल्म में कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग को बहुत ही आसान तरीके से समझाया गया है। इस फिल्म से आपको पता चलेगा कि कोरोना जैसी महामारी कैसे और कितनी तेजी से फैलती है।
कैसे काम करता है कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग?
कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के लिए जारी गाइडलाइन के मुताबिक जब किसी शख्स में बीमारी की पुष्टि होती है तो उसकी मौजूदा स्थिति के अनुसार उस पर नजर रखी जाती है। उसकी ट्रैवल हिस्ट्री के बारे में जानकारी जुटाई जाती है। इसके अलावा उस शख्स ने पिछले 14 दिनों में किस-किस से मुलाकात की है, उसका भी ब्योरा लिया जाता है। शख्स के पूरे परिवार की स्क्रीनिंग होती है। साथ ही उन लोगों की भी लिस्ट बनाई जाती है जिन्होंने संक्रमित शख्स के छह मीटर के दायरे में 30 मिनट से अधिक वक्त बिताया हो।
पहचान उजागर किए बिना दी जाती है जोखिम की जानकारी
संक्रमित शख्स के संपर्क में आए सभी लोगों को लिस्ट बनाई जाती है और उन्हें संभावित जोखिम के बारे में बताया जाता है, हालांकि लोगों को अलर्ट करते समय संक्रमित शख्स की पहचान नहीं बताई जाती है। इसके बाद सभी संदिग्ध लोगों और संक्रमित शख्स के साथ इस तरह से व्यवहार किया जाता है ताकि उनके अंदर इस बात का डर हो जाए कि उनकी बीमारी के बारे में लोगों को पता चल सकता है। ऐसे में डर के मारे लोग खुद को क्वारंटीन या आइसोलेट कर लेते हैं, जबकि डॉक्टर्स की नजर संदिग्ध और मरीज दोनों पर रहती है।
कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के लिए हो रहा टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल
कोरोना वायरस के मामले में दुनिया के अधिकतर देश कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के लिए मोबाइल एप की मदद ले रहे हैं। कई देश स्मार्ट रिस्टबैंड और क्यूआर का भी सहारा ले रहे हैं। भारत सरकार ने कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के लिए आरोग्य सेतु एप लॉन्च किया है जो कि एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर मौजूद है। कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग एप जीपीएस लोकेशन और ब्लूटूथ के जरिए काम करते हैं। ये एप संक्रमित इलाके में जाने पर लोगों को अलर्ट करते हैं।