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कोविड-19: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सरकार के विवेक पर नहीं थोपना चाहते अपनी इच्छा

Tue, 07 Apr 2020 03:30 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क/ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क/ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Tue, 07 Apr 2020 03:30 PM IST
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covid 19 Supreme Court on migration of labours says we are not health or management expert
लोगों को जागरुक करता पुलिसकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर 21 दिन के लॉकडाउन की वजह से पलायन करने वाले कामगारों के स्वास्थ्य और उनके प्रबंधन से जुड़े मुद्दों से निबटने के विशेषज्ञ नहीं है और बेहतर होगा कि सरकार से जरूरतमंदों के लिए हेल्पलाइन शुरू करने का अनुरोध किया जाए।

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प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। पलायन करने वाले कामगारों के जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा और लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हुए श्रमिकों को उनका पारिश्रमिक दिलाने के लिए सामाजिक कार्यकताओं हर्ष मंदर और अंजलि भारद्वाज ने दायर की थी।
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शीर्ष अदालत ने इससे पहले एक जनहित याचिका पर सरकार से जवाब मांगा था और उसने इस स्थिति से निबटने के बारे में उसके जवाब पर संतोष व्यक्त किया था। पीठ ने कहा था कि सरकार स्थिति पर निगाह रखे है और उसने इन कामगारों की मदद के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की है।
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पीठ ने इस याचिका की सुनवाई 13 अप्रैल के लिए स्थगित कर दी और कहा, 'हम सरकार के विवेक पर अपनी इच्छा नहीं थोपना चाहते। हम स्वास्थ्य या प्रबंधन के विशेषज्ञ नहीं है और सरकार से कहेंगे कि शिकायतों के लिए हेल्पलाइन बनाए।' पीठ ने कहा कि वह इस समय बेहतर नीतिगत निर्णय नहीं ले सकती और वैसे भी अगले 10-15 दिन के लिये नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि चार लाख से अधिक कामगार इस समय आश्रय गृहों में हैं और यह कोविड-19 का मुकाबला करने के लिये परस्पर दूरी बनाने का मखौल बन गया है।

उन्होने कहा कि अगर उन्हें आश्रय गृहों में रखा जा रहा है और उनमें से किसी एक व्यक्ति को भी कोरोना वायरस का संक्रमण हो गया तो फिर सारे इसकी चपेट में आ जाएंगे। उन्होंने कहा कि इन कामगारों को अपने अपने घर वापस जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनके परिवारों को जिंदा रहने के लिए पैसे की जरूरत है क्योंकि वे इसी पारिश्रमिक पर निर्भर हैं। 

भूषण ने कहा कि 40 फीसदी से ज्यादा कामगारों ने पलायन करने का प्रयास नहीं किया और वे शहरों में अपने घरों में रहे रहे हैं लेकिन उनके पास खाने पीने का सामान खरीदने के लिए पैसा नहीं है। इस पर पीठ ने कहा कि उसे बताया गया है कि ऐसे कामगारों को आश्रय गृहों में भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है और ऐसी स्थिति में उन्हें पैसे की क्या जरूरत है।

केंद्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार स्थिति पर निगाह रखे है और उसे मिलने वाली शिकायतों पर ध्यान भी दे रही है। इसके लिए कॉल सेन्टर बनाया गया है। गृह मंत्रालय और मंत्री हेल्पलाइन की निगरानी भी कर रहे हैं। इस दौरान पीठ ने कहा कि न्यायालय ऐसी शिकायतों की निगरानी नहीं कर सकता कि किसी आश्रय गृह में कामगारों को दिया गया भोजन खाने योग्य नहीं था।

सरकार ने 578 जिलों में बने शिविर, एक करोड़ नागरिकों को दे रहे भोजन

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सरकार हालात पर नियंत्रण रख रही है, शिकायतों को सुना जा रहा है। कॉल सेंटर बनाया गया है, जिसकी निगरानी गृह मंत्रालय कर रहा है। मंत्रालय के ही अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार ने बताया कि 578 जिलों में 22 हजार सरकारी राहत शिविर बनाए गए हैं।

इसके अलावा एनजीओ द्वारा 3909 केंद्र चलाए जा रहे हैं। इनमें एक करोड़ से अधिक लोगों को को भोजन मुहैया करवाया जा रहा है। 17 हजार भोजन शिविर भी बनाए गए हैं। 15 लाख लोगों को उनके कारोबारी संस्थानों ने आश्रय और भोजन मुहैया करवाया है।

आश्रय गृहों में भोजन दे रहे हैं तो पैसा क्यों चाहिए?

अदालत ने कहा कि श्रमिकों को आश्रय गृहों में रख भोजन दिया जा रहा है। ऐसे में श्रमिकों को भोजन खरीदने के लिए पैसे की जरूरत क्यों है? सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि किसी आश्रयगृह में भोजन खाने योग्य नहीं है, इस प्रकार की शिकायतों की निगरानी वह नहीं कर सकती।

इस पर याची की ओर से बताया गया कि सभी श्रमिक आश्रय गृहों में नहीं हैं। आश्रयगृहों में भी केवल भोजन ही उनकी जरूरत नहीं है। निजी जरूरतों और परिवार को भेजने के लिए उन्हें पैसा चाहिए।

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