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Supreme Court: 'आदेश की अवमानना करने वालों पर अदालतों को दया दिखाने की जरूरत नहीं', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

Fri, 08 Sep 2023 04:24 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 08 Sep 2023 04:24 PM IST
सार

Supreme Court: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, माफी बिना शर्त के अयोग्य और प्रामाणिक हो सकती है, फिर भी अगर आचरण गंभीर है, जिससे संस्थान की गरिमा को नुकसान पहुंचा है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

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Courts need not show compassion when contemnors use them as legal trick to wriggle out of responsibility: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि न्यायिक संस्थानों के उदार रवैये ने बेईमान वादियों को आदेश की अवमानना करने या उल्लंघन करने के लिए प्रोत्साहित किया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर अवमाननाकर्ता उन्हें एक शक्तिशाली हथियार और कानूनी चाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो अदालतों को दया दिखाने की जरूरत नहीं है।

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सर्वोच्च न्यायालय की ओर से यह टिप्पणी तब सामने आई जब वह गुजरात उच्च न्यायालय के एक मामले पर फैसला सुना रही थी। उच्च न्यायालय ने संपत्ति विवाद में 2015 में दिए गए वचन की जानबूझकर अवज्ञा करने के लिए 'अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971' के तहत पांच लोगों को सजा सुनाई थी।

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उच्च न्यायालय को दिए गए वचन के बावजूद इस मामले में अपीलकर्ताओं ने विभिन्न पक्षों के पक्ष में 13 बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित किए। उच्च न्यायालय ने उनमें से तीन को दो महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी और शेष दो को सजा के बदले एक लाख रुपये का भुगतान करने को कहा था।

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न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि फर्जी माफी स्वीकार नहीं की जानी चाहिए और अदालत अवमाननाकर्ताओं द्वारा मांगी गई माफी को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। एक सच्ची माफी आत्मनिरीक्षण, प्रायश्चित और आत्म-सुधार का एक गहरा नैतिक कार्य होना चाहिए। इसकी अनुपस्थिति में माफी को तमाशा कहा जा सकता है।

पीठ ने कहा, माफी बिना शर्त के अयोग्य और प्रामाणिक हो सकती है, फिर भी अगर आचरण गंभीर है, जिससे संस्थान की गरिमा को नुकसान पहुंचा है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब किसी वचन या आदेश की अवज्ञा पूरी चेतना के साथ हो तो अदालतों में दया दिखाने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि कानून द्वारा शासित समाज के लिए न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता सर्वोपरि है अन्यथा लोकतंत्र की इमारत टूट जाती है और अराजकता का शासन होता है।
 

अवमाननाकर्ताओं द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए पीठ ने अपीलकर्ताओं को आत्मसमर्पण करने और उच्च न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा पूरी करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। पीठ ने कहा कि अदालत की अवमानना के मामले में अदालतों द्वारा लागू अनुशासन का उद्देश्य अदालत या न्यायाधीश की गरिमा को सही ठहराना नहीं है, बल्कि न्याय प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप को रोकना है।

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