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जहां राम और अल्लाह को मानने वाले साथ मनाते हैं भारतीय होने का जश्न

Mon, 01 Oct 2018 11:13 AM IST
योगेश नारायण दीक्षित, नई दिल्ली
योगेश नारायण दीक्षित, नई दिल्ली Updated Mon, 01 Oct 2018 11:13 AM IST
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country trinidad and tobago where Where Ram and Allah celebrate with the celebration of being Indian
भारतीय उच्चायोग ने बुजुर्गों को किया सम्मानित - फोटो : amar ujala
गुलामी की जंजीरों की जकड़न, फिर कांट्रैक्ट लेबर और अब हंसती-खेलती आगे बढ़ती नई पीढ़ी के साथ ताल मिलाती जिंदगी। कोई अल्लाह पर भरोसा रखकर सुनहरे कल का सपना संजो रहा तो कोई भगवान राम को अपनी सफलता के लिए प्रेरणा मानता है। लेकिन, परिचय पूछने पर तपाक से एक ही जवाब देते हैं- भारतीय। वे अपने अंदाज में भारतीय होने का जश्न साथ मनाते हैं।
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ये कहानी है त्रिनिदाद एंड टोबैगो में बसे उन गिरमिटिया मजदूरों के बच्चों की जो आज 90 से 105 साल की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ हैं। इनके जज्बे से रूबरू होकर भारत के उच्चायुक्त इतने उत्साहित हुए हैं कि उन्होंने इन भारतीय मूल के बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा शुरू कर दी है। इसका नाम दिया 'बुजुर्गों का जश्न।'
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11 साल की उम्र में पहली बार जूते पहने, बाद में पीएम बने

त्रिनिदाद में भारत के उच्चायुक्त बिश्वदीप डे बताते हैं कि जब उन्होंने उन गिरमिटिया मजदूरों के बच्चों से मिलना शुरू किया तो उनकी मेहनत और तपस्या की कहानी सामने आईं। इनमें एक कहानी है पूर्व प्रधानमंत्री बासुदेव पांडे की। उनके दादा गिरमिटिया मजदूर थे पिता मूंगफली बोने वाले छोटे किसान। गरीबी इतनी कि उनके पैरों में जूता पहली बार तब आया जब वे 11 साल के थे और प्राइमरी स्कूल में पढ़ने गए थे। वहां प्रधानमंत्री रहे कमला प्रसाद बिस्सेसर का बचपन तो सर पर फसल लादकर बाजार तक लाने में बीता।
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भारतीय परंपरा का मान, खाना बनाने वाले का ज्यादा सम्मान

उच्चायुक्त डे गांव-गांव घूमकर भारतीय मूल के बुजुर्गों से मुलाकात का सिलसिला शुरू किया है। वह बताते हैं कि त्रिनिदाद के गांवों में वो परंपरा अभी तक जिंदा है जिसे कभी भारत में बहुत सम्मान मिलता था। वहां गांवों में खाना बनाने वाले भंडारी को सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता है।


सभी धर्म को मानने वाले बुजुर्गों का कहना है कि उनके हाथ के खाने की बदौलत इस उम्र में भी वे निरोगी हैं। उच्चायुक्त ने अभी तक 110 ऐसे बुजुर्गों का पता लगा लिया है जो 90 साल से ज्यादा की उम्र के हैं और जिन्होंने अपने दादा-दादी से भारत के संस्कारों को सुन रखा है।
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