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कोरोना संक्रमण: विशेषज्ञ बोले- अभी खत्म न करें ऑनलाइन और वर्चुअल मीटिंग का दौर, जरूरी हो तभी मिलें लोगों से

Wed, 24 Mar 2021 02:22 PM IST
Harendra Chaudhary आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली
आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 24 Mar 2021 02:22 PM IST
सार

जिपमर, पूडुचेरी के निदेशक प्रोफेसर राकेश अग्रवाल ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ बातचीत में कहा, कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए हमें केवल अपने बारे में सोचने की बजाय एक समाज के रूप में सोचना होगा...

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Coronavirus: JIPMER PONdicherry Director said, online and virtual meeting should continue and meet people only when necessary
जवाहर लाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमर) पूडुचेरी के निदेशक प्रोफ़ेसर राकेश अग्रवाल - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कोरोना महामारी के दौरान देश में मरीज़ों के इलाज के लिए बेहतर लाइन ऑफ ट्रीटमेंट तैयार करने वाले जवाहर लाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमर) पूडुचेरी के निदेशक प्रोफेसर राकेश अग्रवाल का कहना है, अभी कोरोना को हल्के में लेना ठीक नहीं है। बेहतर है अभी भी वर्चुअल मीटिंग बंद न हों। ऑनलाइन व्यवस्था चलती रहनी चाहिए। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचना चाहिए और ज़रूरत हो तभी लोगों से मिलें अन्यथा वर्चुअल मुलाकात ही रखें तो बेहतर है। क्योंकि अभी यही ट्रेंड दोबारा देखने को मिल रहा है कि बीमारी लापरवाही से ज़्यादा फैल रही है न कि वायरस के म्यूटेशन से।

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अचानक कोरोना के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है क्या यह चिंता का विषय है?

हां, निश्चित रूप से यह चिंता का विषय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोरोना के बचाव के उपायों के प्रति लोग लापरवाह हो गए हैं, अब लोग संक्रमण के प्रति उतने अधिक गंभीर नहीं हैं, जितना पहले थे। कोरोना अत्याधिक संक्रामक वायरस है इसका फैलाव बहुत तेजी से होता है। यदि आप अपने आसपास देखेंगे तो पाएंगे कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने मास्क नहीं पहना हुआ है और यदि पहना भी है तो वह गलत तरीके से पहना हुआ है। मास्क को लोग कान के पीछे से मुंह के नीचे लटका लेते हैं, या फिर मुंह पर यदि मास्क लगा भी होता है तो वह नाक नहीं ढंकते।

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आप यह भी देख सकते हैं कि लोग एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठ रहे हैं, या फिर हाथ में हाथ डालकर घूम रहे हैं। बड़ी पार्टियां और उत्सवों का आयोजन किया जा रहा है। लोग एक साथ रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हैं और जाहिर सी बात है खाना खाते हुए उनका मास्क भी नीचे होता है, इससे संक्रमण का खतरा बढ़ा है। इसी बीच वायरस के नये म्यूटेंट भी हमारे बीच मौजूद हैं जो लोगों को संक्रमित करने की फिराक में घुम रहे हैं। यह हमारे लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि लोग दिन पर दिन लापरवाह होते जा रहे हैं।
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समाज का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें यह जरूर सोचना होगा कि कोरोना महामारी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, हम अब भी महामारी के बीच ही जी रहे हैं, अब भी हम संक्रमण के जोखिमों के बीच हैं और इससे बचने के लिए हमें सतर्क रहना ही होगा।

टीकाकरण से इसमें क्या मदद मिलेगी?

कोरोना वायरस का असर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति पर अलग-अलग तरह का होता है, यह अंतर मुख्य रूप से मरीज की उम्र के आधार पर होता है। बुजुर्ग व्यक्तियों में कोरोना संक्रमण का अधिक गंभीर प्रभाव देखा गया है, जिसमें उन्हें आईसीयू में भर्ती करने और वेंटिलेटर की जरूरत भी देखी गई। कोरोना टीकाकरण अभियान का मुख्य लक्ष्य संक्रमण से होने वाली मृत्यु को रोकना, आईसीयू बेड और वेंटिलेटर की जरूरत को कम करना है। इसलिए पहले बुजुर्गों और संक्रमण के अधिक जोखिम वाले समूह को वैक्सीन दी जा रही है।

हालांकि इस समूह को संक्रमण से सुरक्षित करने के बाद भी टीकाकरण अभियान बड़ी जनसंख्या को वैक्सीन देने तक जारी रहेगा, जिससे संक्रमण के मामलों में कमी आ जाएगी। कुछ छोटे देशों जैसे कि इस्राइल, यहां टीकाकरण कवरेज काफी बेहतर था, जिसकी वजह से संक्रमण का स्तर काफी नीचे आ गया। यूके का एक शोध कहता है कि ऐसे देश जहां टीकाकरण निर्धारित लक्ष्य या बड़ी आबादी तक नहीं हो पाया वहां दोबारा कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ने लगी। इसलिए यदि टीकाकरण की गति बढ़ा दी जाती है तो निश्चित रूप से यह वायरस को नियंत्रित करने में मददगार होगा।

आपके अनुसार भारत को अब किस रणनीति पर काम करना चाहिए?

हम सभी को बहुत ही अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। हम सभी को एक नये सिरे से जीवन जीने की आदत डालनी होगी। हमें समूहों के बीच जाने से बचना चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मीटिंग करने की जगह अब भी हमें ऑनलाइन या वर्चुअल मीटिंग ही करनी चाहिए। सभी गैर-जरूरी यात्राओं को फिलहाल टाल देना चाहिए। इन छोटे लेकिन बेहद जरूरी उपायों से हम संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। बड़े मॉल और भीड़भाड़ वाली जगह से शॉपिंग करने की जगह हम पड़ोस की दुकान से खरीदारी कर सकते हैं, जहां औसतन कम लोगों का आना-जाना हो। इससे हम संक्रमित होने के जोखिम को कम कर सकते हैं।

यदि कोई वैक्सीन लेने का पात्र है तो उसे वैक्सीन जरूर लेनी चाहिए, वैक्सीन लेने से किसी भी तरह के खतरे की बात नहीं है, वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है। वैक्सीन न लेने के खतरों के मुकाबले वैक्सीन से होने वाले दुष्प्रभाव काफी मामूली हैं, जिन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है। इसके साथ हमें हमारी सामाजिक सहभागिता को भी ध्यान में रखना है, यदि हम खुद को संक्रमण से सुरक्षित रखते हैं जो हम अपने समुदाय में भी संक्रमण के खतरे को कम कर सकते हैं। महामारी के समय बहुत से लोगों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, हमें ऐसे जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए भी अपने हाथ बढ़ाने चाहिए।

कोरोना संक्रमण से अब कुछ मरीजों में डायरिया और कंजेक्टिवाइटिस की शिकायत भी देखी जा रही है, कोरोना वायरस का प्रभाव लोगों अलग-अलग क्यों दिखाई देता है?

सभी तरह की बीमारियों का असर अलग-अलग तरह के लोगों में भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, उदाहरण के लिए खसरा, चिकन पॉक्स, डायबिटीज और यहां तक की मस्तिष्काघात में भी, अभी हम कुछ ही वायरस के इस तरह के बायोलॉजी आधारित प्रभाव को समझ पाए हैं। इसकी अहम वजह जो कोरोना वायरस के संदर्भ में हमने देखी वह है उम्र का प्रभाव। बुजुर्ग व्यक्तियों पर वायरस का प्रभाव अधिक गंभीर असर छोड़ता है जबकि कम उम्र के युवाओं में इसके अधिक गंभीर प्रभाव नहीं देखे गए।

यह भी सत्य है कि महामारी के शुरुआती समय से ही कोरोना पॉजिटिव कुछ मरीजों में डायरिया के लक्षण देखे गए थे। यहीं नहीं चीन ने जब कोरोना संक्रमण बढ़ने के शुरुआती समय में बीमारी की जानकारी दी थी, उसमें कोरोना संक्रमित पांच से दस फीसदी लोगों में डायरिया होने की बात कही गई थी। कोरोना में आंखों का संक्रमण या कंजेक्टिवाइटिस का बहुत मामूली प्रभाव देखा जाता है। यह प्रभाव इतने कम होते हैं कि इन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि यह गंभीर नहीं होते।

कोरोना पॉजिटिव मरीजों के इलाज संबधी आपके क्या अनुभव रहे और इस दौरान आपके संस्थान को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

कोविड काल में काम करने की सबसे अहम चुनौती यह थी कि खतरे को देखते हुए हमें तुरंत कई तरह के संक्रमण नियंत्रण संसाधनों के साथ काम करना था। जैसे कि शुरुआत में पीपीई किट पहनना और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, ग्लब्स, सर्जिकल लेंस, शू आदि के साथ काम करना आसान नहीं था। बाद में हमें इसकी आदत हो गई। बीमारी ने हमारे सभी स्टॉफ को एकजुट कर दिया, सभी के अवकाश रद्द कर दिए गए, डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टॉफ और तकनीशियन सभी ने हर तरह का काम किया।

ऐसा अधिकतर कम होता है कि एक सर्जन को आप वेंटिलेटर से जुड़ी व्यवस्था को सही करते हुए देखे, लेकिन ऐसा किया गया, जबकि सामान्य दिनों में सर्जन केवल सर्जरी करने के लिए ही ओटी में जाते हैं। सीनियर डॉक्टर, विभागाध्यक्ष और बाकी सभी मेडिकल स्टॉफ अस्पताल में दिन-रात काम करते रहे यह देखने के लिए कि सभी कुछ व्यवस्थित रहे। मैं यह कहना चाहूंगा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में संस्थान के सभी लोग एकजुट हो गए। यह हमारे लिए वास्तव में बहुत ही गर्व का भी समय है जबकि महामारी से देश को बचाने के लिए संस्थान और स्टॉफ बेहतर काम कर रहा है।

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