Coronavirus: जान हथेली पर रखकर कैसे काम कर रहे हैं डॉक्टर्स, बदल चुकी है पूरी जिंदगी
किसी भी खतरनाक बीमारी के वक्त स्वास्थ्यकर्मी आम लोगों के मुकाबले चार गुना ज्यादा खतरे का सामना कर रहे होते हैं। जिस कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया, उसके खिलाफ जंग में डॉक्टर और चिकित्साकर्मी पूरी ताकत से लगे हुए हैं, इसके लिए उन्हें अपने परिवार से भी दूरी बनाकर रहना पड़ रहा है।
कुछ डॉक्टर्स तो ऐसे हैं जो मरीजों की सेवा करते-करते खुद भी संक्रमित हो गए और अपनी जान तक गंवा बैठे। सभी का एक ही मकसद है कोरोना को हराना है, जिंदगी को बचाना है। इन तमाम चुनौतियों के साथ काम करते वक्त डॉक्टर शारीरिक तौर पर भी मुश्किल स्थितियों से जूझ रहे हैं।
ऐसी ही आत्मा को झकझोर देने वाली एक पोस्ट सोशल मीडिया पर इन दिनों तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें AIIMS के डॉक्टर सायन नाथ अपनी आपबीती सुना रहे हैं।
वायरल पोस्ट
मैं एम्स, ट्रॉमा सेंटर में एक वरिष्ठ स्थानीय डॉक्टर हुूं। मुझे COVID-19 ICU में प्रतिनियुक्त किया गया है। मैं शुरू से ही आकस्मिक तैयारी प्रक्रिया का एक हिस्सा रहा। हम छह घंटे की चार पालियों में काम करते हैं, ताकि 24 घंटे और सातों दिन मरीजों की देखभाल की जा सके। हम सात दिन काम और सात दिन आराम की दिनचर्या अपना रहे हैं। वर्तमान में, मैं अपना ब्रेक पूरा कर काम पर लौटा हूं।
पिछले कुछ हफ्तों में, जिंदगी काफी थकान भरी हो चुकी है। PPE को पहनने और उतारने में ही लगभग आधा घंटा लगता है। यह उपकरण सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल करने के लायक होते हैं। अपनी छह घंटे की शिफ्ट के दौरान हम सामान्य मानवीय जरूरतों जैसे भोजन, पानी, ताजी हवा यहां तक की बाथरूम का उपयोग करना तक भूल जाते हैं। मगर अमेरिका में काम कर रहे हमारे साथी डॉक्टर्स की जिंदगी तो इससे भी कठिन है, जो 8-12 घंटे लगातार काम कर रहे हैं। चूंकि एक शिफ्ट में प्रति डॉक्टर केवल एक ही पीपीई आवंटित की जाती है, वे शौचालय का उपयोग करने से बचने के लिए वयस्क डायपर पहनते हैं।
शरीर में एकदम चुस्त हो जाने वाले पीपीई उपकरण पहनने के बाद सांस लेना मुश्किल हो जाता है। घुटन महसूस होने लगती है। चश्मे के सामने भाप जम जाती है। हम आसानी से देख नहीं पाते। सभी की ड्रेस पर उनका नाम लिखा होता है, ताकि आसानी से हम-एक दूसरे को पहचान सके।
हेल्थकेयर टीमों के बीच इस दौरान बातचीत या समन्वय किसी चुनौती से कम नहीं। हमारी आवाज तक दूसरे व्यक्ति तक नहीं जा पाती। चिल्लाकर बोलने पर ऐसे सुनाई देती है जैसे कोई बड़बड़ा रहा हो। आपात स्थिति के दौरान, हम अतिरिक्त सतर्क हैं क्योंकि यहां एक छोटी सी गलती भी भारी पड़ सकती है। एक दूसरे तक संदेश सांकेतिक भाषा के माध्यम से किया पहुंचाया जा रहा है।
छह घंटे की शिफ्ट खत्म होते तक हम सभी बुरी तरह थक जाते हैं। मैं बस कुछ मिनटों के लिए, बाहर निकलने और ताजी हवा में सांस लेना चाहता हूं, लेकिन मुझे पता है कि ये तक कितना मुश्किल है। दो महीने से अपने घर कोलकाता भी नहीं गया। एक बार महामारी खत्म होने के बाद, मैं अपने माता-पिता से मिलने जाउंगा। जब 20 दिनों पहले मां को फोन करके बताया था कि कोरोना के मरीजों के इलाज में ड्यूटी लगाई गई है, तो मां कुछ देर के लिए चिंतित हुईं, लेकिन फिर आशीर्वाद देते हुए कहा कि बेटा देश की सेवा करो। देश पहले है, परिवार बाद में। मां की इस बात से काफी हौसला मिला।
कोरोना का संकट खत्म होने के बाद भी जीवन आसान नहीं होने वाला, क्योंकि अन्य बीमारियों के रोगियों की संख्या बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं, जो इस समय घर में हैं और हम उनका इलाज नहीं कर पा रहे। जब मैंने चिकित्सा पेशे में प्रवेश किया, तो मेरा एकमात्र मकसद लोगों की सेवा करना था। मगर इतने वर्षों और बीते कुछ हफ्तों से डॉक्टर्स पर हमले की खबरें देखकर, अपने करियर और फैसले पर ही सवाल उठाने लगा हूं। बावजूद इसके हम हर दिन उसी उत्साह और समर्पण के साथ काम करते हैं क्योंकि जानते हैं कि आपका जीवन हम पर निर्भर करता है और हमने इसकी रक्षा करने की शपथ ली है!
डॉक्टर्स के प्रति रोष नहीं आभार व्यक्त करें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर 22 मार्च दिन रविवार को भारत में कई लोगों ने कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में सबसे आगे खड़े स्वास्थ्य कर्मियों के लिए तालियां और थालियां बजाईं थी। पुलिस, बैंककर्मी, मीडिया जैसी मौलिक जरूरतों की पूर्ती करने वालों को धन्यवाद ज्ञापित किया था। बावजूद इसके देश के अलग-अलग कोने से लगातार डॉक्टर्स को पीटने, उनके साथ दुर्वव्यवहार करने के मामले सामने आ रहे हैं।
मरीजों के साथ पूरे वक्त डॉक्टर्स को खास ड्रेस जिसे पीपीई किट कहते हैं वो पहनकर गुजारना होता है। ये किट पहनकर वह गर्मी से जूझ रहे होते हैं। मास्क लगाना काफी दर्द भरा होता है। इसकी वजह से उनके चेहरे पर निशान बन रहे हैं। लगातार तीन से चार घंटे पहने रहने पर घाव जैसे हालात हो रहे हैं। ज्यादा देर तक चश्मा पहनने से भी निशान बन रहा है।
मुंह से भाप बनती है तो चश्में से सब धुंधला दिखने लगता है। कान भी कवर होते हैं तो सुनने में दिक्कत होती है, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए ये सब पहनना भी जरूरी है। उस किट में डॉक्टर्स और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मरीजों की जांच करना किसी मुश्किल चुनौती से कम नहीं।
आने वाले दिनों में अगर मामले बढ़ेंगे तो डॉक्टर्स के लिए परेशानियां भी बढ़ेंगी। अगर मरीजों का इलाज करने वाले लोग ही बीमार पड़ जाएंगे, तो उनकी देख-रेख कौन करेगा? इसलिए जरूरी है कि डॉक्टर की सेहत ठीक रहे। ये तभी हो सकता है जब डॉक्टर्स को पीपीई किट मिले और हम बतौर आम नागरिक उनके प्रति अच्छा व्यव्हार कर अपना फर्ज निभाए।