अगर कोरोना चरम पर पहुंचा तो खून के लिए कहां जाएंगे ये लाखों मरीज
- लॉकडाउन में सबसे कम हुआ रक्तदान, अप्रैल में लगे केवल 148 कैम्प
- सिर्फ एक फीसदी आबादी करे रक्तदान तो पूरी हो सकती है खून की जरूरत
विस्तार
कोरोना के जुलाई में चरम पर पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो इस दौरान उन मरीजों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जिन्हें लगातार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। अभी तक का अनुभव यह है कि कोरोना संक्रमण से डर और लॉकडाउन के कारण अप्रैल माह में देश में सबसे कम रक्तदान शिविर लगाए जा सके। अप्रैल माह में केवल 148 रक्तदान शिविर ही लगाए गए जबकि इसके पहले मार्च में 369 रक्तदान शिविर लगाए गए थे। जनवरी में ब्लड डोनेशन कैंप की संख्या 606 और फरवरी में 474 थी। मई में 300 रक्तदान शिविर लगाए जा सके।
लेकिन लॉकडाउन खुलने से लोग रक्तदान के लिए सामने आ रहे हैं। ब्लड डोनेशन संस्थाओं द्वारा रक्तदाताओं की संक्रमण से सुरक्षा के बारे में जागरूक करने से भी असर पड़ता दिख रहा है। इसका परिणाम हुआ है कि जून के पहले 14 दिनों में ही 168 ब्लड डोनेशन कैंप लगाए जा चुके हैं। लेकिन विशेषज्ञों को आशंका है कि कोरोना के मामले बढ़ने से इसमें फिर कमी दर्ज की जा सकती है। इससे देश के एक लाख थैलेसीमिया के मरीजों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है जो लगातार रक्तदान पर ही जीवित रहते हैं।
थैलेसिमिक्स इंडिया की सेक्रेटरी शोभा तुली के मुताबिक कोरोना संक्रमण के डर से लोग रक्तदान के लिए सामने नहीं आ रहे थे। इस दौरान ब्लड डोनेशन कैंप लगाने में भी परेशानी हो रही थी। ऐसी स्थिति में थैलेसीमिया के मरीजों के लिए संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। कई संगठनों की मदद से इस दौरान रक्त की जरूरत को पूरा किया गया।
इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की प्रमुख डॉक्टर वनश्री सिंह के मुताबिक उन्हें ऐसे कई कैंप रद्द करने पड़े जहां संक्रमण के कारण एरिया को सील कर दिया गया। शनिवार को दिल्ली के गीता कालोनी में भी एक ऐसे ही कैंप को रद्द करना पड़ा क्योंकि वह एरिया संक्रमण के मामले सामने आने के बाद अचानक कंटेनमेंट जोन घोषित कर दिया गया।
कोरोना संक्रमण की स्थिति गंभीर होने पर सरकारी अस्पतालों को कोरोना के लिए आरक्षित कर दिया जाता है। ऐसे में उन मरीजों के लिए बड़ा संकट पैदा हो जाता है जो उस अस्पताल से लगातार रक्त लेकर अपना जीवन आगे बढ़ा रहे थे। एलएनजेपी और जीटीबी अस्पताल को कोरोना डेडिकेटेड घोषित किए जाने के बाद इसी तरह की स्थिति पैदा हुई। केंद्र के निर्देश पर अब अस्पतालों को कोविड के लिए जाने पर इससे जुड़े थैलेसिमिक मरीजों को इसकी जानकारी दे दी जाती है जिससे वे वैकल्पिक केंद्रों पर रक्त ले सकें।
प्रमुख तथ्य-
- देश में एक लाख से ज्यादा थैलेसीमिया के मरीज हैं जिन्हें जरूरत के मुताबिक हर माह एक से तीन यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है।
- अकेले दिल्ली-एनसीआर एरिया में 2500 थैलेसीमिया के मरीज हैं जिनके रक्त की जरूरत विभिन्न अस्पतालों से पूरी होती है।
- अनुमानत: प्रति वर्ष दस हजार बच्चे थैलेसीमिया पीड़ित पैदा होते हैं।
- थैलेसीमिया के मरीज के इलाज में गंभीरता के हिसाब से 60 हजार रूपये से तीन लाख रूपये प्रति वर्ष का खर्च करना पड़ता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक किसी देश की आबादी के एक फीसदी लोग भी अगर वर्ष में एक बार रक्तदान करें तो उस देश में खून की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।
- देश में कुल रक्तदाताओं का 65 फीसदी युवा वर्ग से आता है। एक स्वस्थ व्यक्ति हर तीन महीने में एक बार रक्तदान कर सकता है। प्लाज्मा का दान एक हफ्ते में दो बार तक भी किया जा सकता है।
- रक्तदान को प्रोत्साहित करने के लिए 14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस (14 June, Blood Donors Day) मनाया जाता है।
रक्त पाने के लिए यहां करें संपर्क
ई-रक्तकोष (eraktkosh) पोर्टल पर रजिस्टर कर पूरे देश में कहीं भी रक्त पाया जा सकता है। नेशनल ब्लड सेल, एनएचएम के माध्यम से लोगों को उनके नजदीकी सेंटर पर रक्त देने की सूचना दी जाती है। इन सेंटरों को भी जरुरतमंदों के बारे में सूचित कर दिया जाता है। केवल दिल्ली में इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी और विभिन्न अस्पतालों सहित कुल 62 ब्लड डोनेशन सेंटर हैं। रक्तदान करने के इच्छुक लोग भी इस पोर्टल पर संपर्क कर सकते हैं।