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Coronavirus: घर में काम करने वाली महिला ने पीएम मोदी से लगाई गुहार, 'पुरुषों से कहिए कि घर के काम में हाथ बटाएं'

Thu, 30 Jul 2020 02:08 PM IST
देव कश्यप बीबीसी, हिंदी
बीबीसी, हिंदी Published by: देव कश्यप Updated Thu, 30 Jul 2020 02:08 PM IST
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Coronavirus Impact suvarna ghosh urges PM Modi Ask men to help in household work
Subarna Ghosh - फोटो : BBC

कोरोना वायरस के दौर में लॉकडाउन के दौरान घरेलू कामकाज कौन करेगा इसे लेकर चली रस्साकसी ने भारत के घरों में मौजूद जेंडर पॉलिटिक्स को सतह पर ला दिया है। भारत में घरेलू कामकाज आमतौर पर एक बोझिल और थकाऊ काम होता है। पश्चिमी देशों के उलट चंद भारतीय परिवार ही ऐसे होंगे जहां डिशवॉशर, वैक्यूम क्लीनर या वॉशिंग मशीन हैं।

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भारत में आसान नहीं घर के कामकाज
ऐसे में हर थाली या कटोरी अलग से धोनी पड़ती है। कपडों को बाल्टियों में भिगोकर धोना पड़ता है और सूखने के लिए लटकाना पड़ता है। घरों को झाड़ू और पोंछे से साफ करना करना पड़ता है। इसके बाद बच्चों और बड़ों की देखभाल भी करनी पड़ती है।
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देश के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों में घर का कामकाज घरेलू सहायकों पर टिका होता होता है। इनमें पार्टटाइम रसोइये, साफ-सफाई करने वाले और आया शामिल होते हैं। लेकिन, पूरे देश में लागू किए गए लॉकडाउन के दौरान जब काम करने वाला शख्स घर पर न आ सके तो ऐसे हालात में घर के इन कामकाज को करने की जिम्मेदारी किस पर आती है?
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मोदी जी दखल दें
इसका जवाब है दरार और झगड़े। एक खास मामले में एक याचिका दायर की गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की दरख्वास्त की गई। याचिका में पूछा गया, "क्या झाड़ू पर यह लिखा होता है कि इसे केवल महिलाएं ही चलाएंगी?" यह याचिका चेंज.ऑर्ग पर डाली गई है।

इसमें कहा गया है, "वॉशिंग मशीन और गैस स्टोव के मैनुअल में क्या लिखा होता है? पुरुष क्यों नहीं घर के कामकाज में हिस्सा बंटाते हैं?" पिटीशन की लेखिका सुबर्णा घोष हैं जो कि खाना बनाते, साफ-सफाई करते और कपड़े धोते-धोते थक चुकी हैं। ऊपर से उन्हें अपने दफ्तर का काम भी घर से करना होता है।

वे चाहती हैं कि प्रधानमंत्री इस मामले में दखल दें और अपनी अगली स्पीच में इस मसले का उपाय सुझाएं। वे चाहती हैं कि पीएम भारतीय पुरुषों को इस बात के लिए उत्साहित करें कि वे घर का काम बराबरी से करने की अपनी जिम्मेदारी को समझें।

वह लिखती हैं, "यह एक मूलभूत सवाल है, ज्यादा लोग इस पर बात क्यों नहीं करना चाहते हैं।" घोष की याचिका पर अब तक 70,000 से ज्यादा दस्तखत हो चुके हैं।

घरेलू कामकाज की जिम्मेदारी नहीं लेते पुरुष
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में शहरी भारत में महिलाओं ने बिना भुगतान वाले देखभाल के काम करने में 312 मिनट खर्च किए। इसके उलट पुरुषों ने इस काम पर महज 29 मिनट लगाए। गांवों में महिलाओं के लिए यह समय 291 मिनट रहा जबकि पुरुषों ने केवल 32 मिनट इस पर दिए।

मुंबई में घोष का घर भी इससे अछूता नहीं है। उन्होंने बताया कि यह याचिका उन्हीं के जीवन के अनुभवों का सार है। उन्होंने कहा, "मेरी जैसी तमाम महिलाएं ऐसी ही परिस्थिति में हैं। घर के कामकाज का जिम्मा केवल महिलाओं पर होता है। मैं खाना बनाती हूं, साफ-सफाई करती हूं, बिस्तर बिछाती हूं, कपड़े धोती हूं, कपड़े तह करती हूं और बाकी दूसरे काम करती हूं।"

उनके पति एक बैंकर हैं। वह कहती हैं कि उनके पति घरेलू कामकाज करने वालों में नहीं हैं। उनका टीनेज बेटा और बेटी कभी-कभार जरूर उनकी मदद कर देते हैं।



दफ्तर के काम के साथ समझौता करना पड़ा
घोष एक चैरिटी चलाती हैं। वह बताती हैं कि वे उन लोगों में हैं जिनको लॉकडाउन में अपने कामकाज से सबसे ज्यादा समझौता करना पड़ा है। वे बताती हैं, "मेरे काम पर असर पड़ा है। लॉकडाउन के पहले महीने में मैं हर वक्त काम करके बुरी तरह से थक गई थी। हमारे परिवार के समीकरण बिगड़ गए थे। मैंने निश्चित तौर पर काफी शिकायत की। जब मैं शिकायत करती थी तो लोग कहते थे, "तो ये सब मत करो"

घोष ने इस सलाह को माना, मई की शुरुआत में तीन दिनों तक उन्होंने न तो बर्तन धोए ही न ही कपड़े तह किए। वे बताती हैं, "सिंक बिना धुले बर्तनों से भर चुकी थी। गंदे कपड़ों का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा था।" उनके पति और बच्चे जान गए थे कि वे कितनी नाराज हैं और उन्होंने इस गंदगी को निबटाना शुरू कर दिया।

वे कहती हैं, "मेरे पति ने घर के कामकाज में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। वे समझ चुके थे कि मुझ पर इसका बुरा असर पड़ा है। लेकिन, हमारे समाज के पुरुष इस संस्कृति और समाज से पीड़ित हैं। उन्हें घर के कामकाज सिखाए ही नहीं जाते हैं। उन्हें कुछ जिम्मेदारी लेना सिखाना चाहिए।"

पुरुषों को घर के काम सिखाए ही नहीं जाते
इसकी वजह यह है कि भारत और ऐसी ही दूसरे कई पितृसत्तात्मक समाजों में लड़कियों को बचपन से ही एक कुशल गृहिणी बनना सिखाया जाने लगता है। इस बात को हल्के में लिया जाता है कि घर के कामकाज उन्हीं की जिम्मेदारी हैं और अगर वे बाहर जाती हैं और कोई नौकरी हासिल कर लेती हैं तो उन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी होगी। उन्हें घर और दफ्तर दोनों को एकसाथ संभालना पड़ेगा।

एक महिला पल्लवी सरीन ने लिखा है, "बचपन में घर के सारे काम मुझे ही करने होते थे। मुझे किचन में काम करना होता था और मां की मदद करनी होती थी। मेरा भाई अपने लिए लंच भी खुद नहीं परोस सकता था।" जिन लोगों ने भी ये जवाब दिए कि उनका घर जेंडर न्यूट्रल है वे लोग या तो बाहर रहते हैं या फिर उन्होंने ऐसे पुरुषों से शादी की थी जो पश्चिमी देशों में वक्त गुजार चुके थे।

उपासना भट्ट ने लिखा है, "घर का काम अभी भी महिलाओं का काम माना जाता है। यहां तक कि अगर पुरुष घर के काम करना भी चाहें तो भी अगर परिवार सास-ससुर के साथ रहता है तो कितने पुरुष ये काम कर पाते हैं। मैं ऐसी महिलाओं को जानती हूं जिनके पति घर के काम करते हैं, लेकिन जब भी उनके पेरेंट्स घर आते हैं तो वे रत्ती भर भी घर के काम नहीं करते हैं।"

रोजाना तीन अरब घंटे काम लेकिन कोई पेमेंट नहीं
ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय महिलाएं और लड़कियां हर रोज बिना भुगतान वाला देखभाल का काम करने में तीन अरब घंटे खर्च करती हैं। अगर इसकी एक कीमत तय की जाए तो यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लाखों करोड़ रुपये का योगदान होगा। लेकिन, हकीकत में घरेलू कामकाज की कीमत शायद ही कैलकुलेट की जाती हो। यह माना जाता है कि महिलाएं स्नेह के चलते यह सब करती हैं।

बड़े होते वक्त घोष हटकर सोचती थीं। उन्होंने अपनी मां और दूसरी महिलाओं को ये ही काम करते देखा था और वे सोचती थीं, "मैं किसी भी हालत में ऐसी नहीं बनूंगी।"
जब उनकी शादी हुई तो घर के कामकाज को लेकर बनी हुई सीमा रेखाएं नजर नहीं आती थीं क्योंकि घर में नौकर थे। इससे घर पर एक समानता का फर्जी आवरण बना हुआ था।

वे कहती हैं, "नौकर हमारे घरों में शांति बनाए रखने में मदद करते हैं। घर के कामकाज हो जाते हैं और ऐसा लगता है कि सब ठीक है।" लेकिन, लॉकडाउन ने रोजाना के कामकाज के लिए परिवार को आमने-सामने ला खड़ा किया। इससे घर के अंदर मौजूद असमानता भी उभरकर सामने आ गई। इसी को देखते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री के यहां अपील करने का फैसला किया।

"पति कैसे कर पाएंगे घर के काम"
उन्होंने अपने पड़ोस की जितनी भी औरतों से बात की उन्होंने भी यही कहा कि वे अपने घर के कामकाज से थक चुकी हैं, लेकिन अपने पतियों के घर के काम में मदद देने के आइडिया को लेकर वे ज्यादा उत्साहित नहीं थीं।

वे बताती हैं, "कइयों ने मुझसे पूछा- वे खाना कैसे बनाएंगे या सफाई कैसे कर पाएंगे? कइयों ने तो घर के काम नहीं करने के लिए अपने पतियों की तारीफ तक कर डाली। उनका कहना था- वे बेहद अच्छे हैं, मैं जो कुछ भी बनाती हूं वे बिना शिकायत के उसे खा लेते हैं।" जब घोष ने अपने पति को बताया कि वे एक पिटीशन डालने वाली हैं तो उन्होंने इसका समर्थन किया।

"लैंगिक असमानता बड़ा मसला, मोदी इस पर बात करें"
वे बताती हैं, "उनके दोस्तों ने उनका मजाक बनाया। उन्होंने उनसे पूछा, 'तुम कुछ घर का काम क्यों नहीं करते हो?' अब देखो तुम्हारी पत्नी ने मोदी के यहां याचिका डाल दी है।"

वे हंसते हुए बताती हैं, "उन्होंने उन्हें बताया, 'क्योंकि ज्यादातर पुरुष अपनी पत्नियों की बजाय मोदी की बात ज्यादा मानते हैं।'" घोष की याचिका को सोशल मीडिया पर आलोचना का भी शिकार होना पड़ा है। कइयों ने प्रधानमंत्री को एक फालतू के मामले में प्रधानमंत्री को बीच में लाने के लिए उनकी आलोचना की है।


वे कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि मोदी इस बारे में जरूर बात करेंगे। वे कहती हैं, "मोदी को महिलाओं का बड़ा समर्थन हासिल है। ऐसे में उन्हें महिलाओं से जुड़े इस अहम मसले पर जरूर बात करनी चाहिए। उन्हें लैंगिक समानता पर क्यों नहीं बात करनी चाहिए?"

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