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इतना बदल गया संसार: लॉकडाउन के मुश्किल वक्त ने बहुत कुछ सिखाया

Wed, 24 Mar 2021 06:48 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Wed, 24 Mar 2021 06:48 AM IST
सार

  • वर्क फ्रॉम होम करने से लाखों  कर्मचारियों के जीवन पर असर पड़ा है
  • घर से काम करने को कर्मचारी वेतन कटवाने को भी तैयार
  • घर से काम करना स्टार्टअप्स के लिए बहुत फायदेमंद रहा

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corona virus, life after lockdown and work from home
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

विस्तार

मुश्किल वक्त हमें नई चीजें सीखने के लिए प्रेरित करता है। यही नई बातें जहां हमारा अस्तित्व बचाने में मदद करती हैं, वहीं आगे बढ़ने की ताकत भी देती हैं। लॉकडाउन ने भी वैसा ही किया।

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घर से काम करना, नई तकनीकों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना, घर में ज्यादा समय व्यतीत करना, दोस्तों-रिश्तेदारों से आपसी संबंध फिर से प्रगाढ़ बनाना, मनोरंजन के नए तौर-तरीकों को स्वीकार करना, उन चंद बातों में शामिल हैं जो हमने कोरोना महामारी और उसके चलते लगे लॉकडाउन में सीखीं। आम भारतीयों पर इसका छोटे और बड़े स्तर पर क्या असर हुआ, इसे पूरे वर्ष हमारी दुनिया कितनी बदल गई, इस पर एक नजर...

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घर से दफ्तर का काम

‘वर्क फ्रॉम होम’ ने लाखाें कर्मचारियों के जीवन पर डाला असर...
लॉकडाउन की वजह से ‘वर्क फ्रॉम होम’ यानी घर से ही ऑफिस का काम करने का चलन तेजी से बढ़ा। फ्रंटियर वर्कर्स को छोड़कर सभी पेशे में यह लागू हुआ। लॉकडाउन खुलने के बाद भी आईटी सहित कई सेक्टर कर्मचारियों से घर से काम करा रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम जीवन का हिस्सा बन चुका है।

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कंपनियां इसे फायदेमंद मान रही हैं तो कर्मचारी भी विभिन्न एजेंसियों के सर्वे में इससे खुश नजर आ रहे हैं। कोरोना के नए मामले जिस तरह महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में फिर मिल रहे हैं, लग रहा है कि वर्क फ्रॉम की आदत डाल लेनी होगी।

जब कर्मचारियों ने कही मन की बातें
तीन में से दो राजी : नवंबर, 2020 में ऑस्ट्रेलियाई रिसर्च एजेंसी पेपरजायंट के सर्वे में 83 फीसदी ने कहा कि घर से काम करने के बाद अब उनके लिए ऑफिस जाना मुश्किल होगा। 70 फीसदी बोले, घर से काम करके वे ज्यादा संतुष्ट हैं।

वेतन कटवाने को भी तैयार...
नवंबर 2020 में ही एजेंसी मेवरिक इंडिया ने सर्वे रिपोर्ट दी कि घर से काम करने पर 56 फीसदी भारतीय पेशेवरों की उत्पादकता बढ़ गई है।  34 फीसदी तो इस पर भी राजी हैं कि इसके लिए चाहें तो उनका वेतन 10 फीसदी तक कम कर लें। दरअसल, सर्वे में शामिल 81 फीसदी कर्मचारियों ने बताया कि ऑफिस आने-जाने में उनके दिन के 90 मिनट खर्च होते हैं, वर्क फ्रॉम होम से यह समय बचेगा।

ये भी होंगे फायदे

  • 5520 रुपये हर महीने कर्मचारी बचा पाएंगे
  • 1.47 घंटे तक रोजाना ऑफिस आने-जाने में खर्च नहीं होंगे
  • 428 अतिक्ति कार्य घंटे के बराबर है यह समय, जो काम को दे सकेंगे।


लेकिन बाधाएं भी...
मैकेंजी एंड कंपनी की ग्लोबल इंस्टीट्यूट एनालिसिस के अनुसार, भारत जैसे विकासशील देश में केवल 16% कर्मचारी ही ऐसे हैं, जो घर से काम करें तो उसकी गुणवत्ता पर असर नहीं होगा। ब्रिटेन, जर्मनी, जापान जैसे विकसित देशों में यह तादाद 33 से 39 फीसदी है। देश के 46.4 करोड़ लोग कृषि, रिटेल और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां घर से काम करना अभी संभव नहीं है।

भविष्य पर नजर

हफ्ते के कुछ दिन घर से काम
ऑन-साइट काम करने वालों की संख्या देश में भले ही बहुत अधिक है, लेकिन उन्हें कुछ दिन घर पर रहते हुए काम करने का विकल्प दिया जाता है। कई कंपनियां इस पर विचार भी कर रही हैं।

स्टार्टअप्स के लिए प्राणवायु
उद्योग प्रोत्साहन और आंतरिक व्यापार विभाग के अनुसार, फरवरी 2021 में देश में 43,149 स्टार्टअप पंजीकृत थे। एक स्टार्टअप औसतन 12 लोगों को रोजगार दे रहा है। छोटी, बड़ी और मध्यम कंपनियों का प्रति कर्मचारी औसत वर्कस्पेस करीब 150 वर्ग फुट माना गया है।

इस लिहाज से इन स्टार्टअप्स को करीब 7.76 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस की जरूरत होगी। क्रेडाई के 110 रुपये औसत किराये के अनुमान के अनुसार भी इन्हें ऑफिस लेना पड़ा तो उन्हें 800 करोड़ प्रतिमाह चुकाने होंगे। वर्क फ्रॉम होम इन स्टार्टअप को सालाना औसतन 22 लाख रुपये तक बचाने में मदद कर सकता है।

एक साल में हमने जो सीखा, उसने दी मुश्किल वक्त में आगे बढ़ने की ताकत


महिलाओं ने की दोगुनी मेहनत, यूं संभाले घर-परिवार
लॉकडाउन ने महिला सदस्यों को खासतौर पर प्रभावित किया। एक ओर जहां घर से काम करते हुए परिवार से संतुलन रखने की चुनौती थी, वहीं घरों में कैद रहने से मानसिक परेशानियां भी बढ़ रहीं थीं।

गृहिणियों के काम का वित्तीय आकलन करते हुए 2015 में पहली बार अर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने बताया कि भारतीय महिलाओं की ओर से घर को संभालने के लिए किया जाने वाला कार्य रोजाना के 5.51 घंटे के श्रम के बराबर है। यह विश्व में मैक्सिको के 6.23 घंटे के बाद सबसे ज्यादा है। इस काम को रुपयों में नहीं गिना जाता। लॉकडाउन में उनके इस काम में 25 से 30 फीसदी वृद्धि हुई है।

परिवार : 62% ने माना एक-दूसरे को ज्यादा समझा

  • परिवार के सदस्यों ने एक दूसरे को अधिक समय दिया और ज्यादा करीब आ सके।
  • 203 शहरों में 10 हजार परिवारों पर मिलेनियल सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि परिवारीजनों से संबंध बेहतर हुए हैं। काम और बाकी चीजों में व्यस्त रहने वाले सदस्यों को लॉकडाउन ने साथ-साथ समय बिताने का अवसर दिया।

बदल गई आदतें


ऑनलाइन किराना खरीद  49 फीसदी लोगों की पसंद
तेल-साबुन से दाल-चावल तक, ऑनलाइन खरीदने की आदत भारतीयों में तेजी से बढ़ी। लोकल सर्कल्स नामक एजेंसी के सर्वे में 358 शहरों के 49% लोगों ने बताया कि वे मोबाइल एप व ई-कॉमर्स वेबसाइट से खरीदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं।

वहीं, 18% खुदरा दुकानदारों ने सामान घर पहुंचाना शुरू कर दिया। यही वजह है कि आईवीसीए संगठन के अनुसार सालाना 27% वृद्धि दर के साथ बढ़ते हुए 2024 तक भारत में ऑनलाइन खरीदारी 7.17 लाख करोड़ पहुंच जाएगी।

ऑनलाइन बैठकें : करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा
ऑनलाइन बैठकों को भारतीयों ने इतनी तेजी से अपनाया कि जूम के सीईओ एरिक युआन के अनुसार, उनके प्लेटफॉर्म पर हमारी संख्या 70 गुना बढ़ी है। पिछले साल दिसंबर में 1 करोड़ यूजर्स से बढ़कर आंकड़ा अप्रैल तक ही 3.5 करोड़ हो चुका था। व्हाट्सएप कॉल से लेकर गूगल मीट को भी लाखों लोगों ने वैकल्पिक और सुरक्षित मानते हुए अपनाया है।

टेलीहेल्थ : नई गाइडलाइंस अब वीडियो कॉल से इलाज
नीति आयोग और एमसीआई के साथ मिलकर देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने टेलीमेडिसिन की गाइडलाइन जारी की, जिसमें पंजीकृत चिकित्सकों को फोन या वीडियो कॉल पर अपने मरीज को इलाज में मदद देने का प्रावधान है। महामारी ही नहीं, इसका उपयोग दूरदराज व प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में भी होगा।

दूसरी ओर, दसियों मोबाइल व डेस्कटॉप एप लॉन्च किए गए। इनमें से कई पर 50 लाख से 10 लाख तक लोग अभी तक जुड़ चुके हैं। वहीं, कुछ एप पर दो लाख डॉक्टर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। एजेंसियों का दावा है, 2025 तक यह सेक्टर सालाना 31 प्रतिशत वृद्धि करते हुए करीब 40 हजार करोड़ रुपये पहुंचेगा।

ई-बुक्स : डाउनलोडिंग के रिकॉर्ड
कर्नाटक सरकार ने बीते वर्ष फरवरी में डिजिटल लाइब्रेरी शुरू की, जहां 11 लाख किताबें और साढ़े पांच लाख वीडियो अपलोड किए गए। एक साल में 23.79 लाख इसके सदस्य बन चुके हैं। कई प्रमुख प्रकाशनों ने भी ई-बुक्स उपलब्ध कराने की शुरुआत कर दी।

विद्यार्थियों ने लाखाें की संख्या में ई-बुक्स डाउनलोड की, जिसमें बड़ी संख्या एनसीईआरटी की किताबों की रही। जिन प्रकाशकों ने यह किताबें बेचीं, उन्हाेंने कीमतें 30 से 55 प्रतिशत तक कम कर दीं, जिसका पाठकों को फायदा हुआ।

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