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Corona virus: कोरोना को मात देने के दो सप्ताह बाद अब धमनियों में जम रहा है थक्का

Tue, 06 Jul 2021 06:13 AM IST
Amit Mandal अमर उजाला रिसर्च टीम
अमर उजाला रिसर्च टीम Published by: Amit Mandal Updated Tue, 06 Jul 2021 06:13 AM IST
सार

  • कोरोना के बाद धमनियों में ब्लड क्लॉट कारण पता करने में जुटे वैस्कुलर सर्जन
  • 30 से कम उम्र के युवाओं में दिखी ये गंभीर तकलीफ
  • 90 से 95 फीसदी मरीजों का समय रहते इलाज संभव
  • 6 से 8 शुरुआती घंटे लक्षण आने के बाद बेहद अहम
  • देरी तो जान बचाने के लिए काटना पड़ सकता है अंग

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Corona virus: After two weeks of Corona treatment, the clot is now freezing in the arteries
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay

विस्तार

कोरोना महामारी की दूसरी लहर में ब्लैक फंगस के बाद संक्रमण को मात देने वाले मरीजों में एक और गंभीर समस्या का पता चला है। मरीजों की नसों (वेन्स) की बजाए धमनियों (आर्टरी) में खून का थक्का (ब्लड क्लॉट) जमने पता चला है। जान बचाने के लिए अंगों को काटना पड़ सकता है।

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मुंबई के कोकिला बेन अस्पताल के वैस्कुलर एंड एंडोवैस्कुलर सर्जरी के विशेषज्ञ डॉ. रघुराम शेखर बताते हैं कि कोरोना वायरस के कारण खून की नसों में खून का थक्का जमने के मामले सामने आए थे। अब धमनियों में ब्लड क्लॉट के मामले सामने आ रहे हैं जिसे डॉक्टरी भाषा में आर्टरियल थ्रॉम्बोसिस कहते हैं। धमनियों में ब्लड क्लॉट से गैंगरीन का खतरा है। रोगी की जान बचाने के लिए हाथ या पैरों को काटना पड़ सकता है।
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आर्टरी में क्लॉट से दूसरे अंगों को भी खतरा है। हैरानी की बात ये है कि कोरोना को मात देने के औसतन दो सप्ताह बाद धमनियों में ब्लड क्लॉट के मामले सामने आ रहे हैं। चिंताजनक बात ये है कि ये तकलीफ युवाओं को भी हो रही है जिनकी उम्र 30 वर्ष से कम या इससे अधिक है। कोरोना के बाद ब्लैक फंगस और अब आर्टरियल थ्रॉम्बोसिस जीवन के लिए नई मुश्किल खड़ी कर सकता है। इसका सही कारण जानने के लिए मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद समेत अन्य बड़े सेंटरों के वैस्कुलर सर्जन की टीम अध्ययन कर रही है। जुलाई तक कुछ नतीजे आने की उम्मीद है।
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दूसरी लहर में हर दिन एक केस
वह बताते हैं कि कोरोना महामारी की पहली लहर में 30 दिन में चार से पांच केस देखने को मिलते थे। दूसरी लहर में धमनियों में ब्लड क्लॉट की शिकायत के बाद हर दिन औसतन एक मरीज अस्पताल पहुंच रहा है।  हाथ और पैर की धमनियों में खून का थक्का जमने का मामला अधिक है।

धमनियों में थक्के को ऐसे समझें
1- पैरों में दर्द जो समय के साथ बढ़ता ही चला जाएगा
2- अंगुलियों और अंगूठे का सुन्न महसूस होना
3- पैरों की गतिशिलता कम होना या बंद होना
4- ऑक्सीजन आपूर्ति बंद होने से शरीर पीला दिखेगा
5- तकलीफ बढ़ने पर रोगी की पल्स पता नहीं चलेगी

थक्का ठोस नहीं तभी राहत
डॉ. शेखर धमनियों में खून का थक्का जमने के 40 से अधिक मरीज देख चुके हैं। थक्का जमने के आठ से 24 घंटे के भीतर रोगी अस्पताल पहुंचे और अगर थक्का ठोस नहीं हुआ है तो एंजियोग्राफी के दौरान थ्रॉम्बोलिसिस और थ्रॉम्बोसक्शन से राहत मिल सकती है। रक्त वाहिकाओं से केमिकल भी देते हैं जिससे थक्का कम होता है।





सही कारण बता पाना मुश्किल
डॉ. शेखर बताते हैं कि ये तकलीफ कैसे और क्यों हो रही है, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। संभव है कि कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के साथ ही धमनियों में छोटे-छोटे खून के थक्के बनने लगे हों। समय के साथ ये बढ़ता गया और 14 या इससे अधिक समय बाद ये तकलीफ बड़ी हो गई।

खून के तत्व हो रहे हैं अलग
डॉ. शेखर बताते हैं कि मनुष्यों का खून गाढ़ा थ्रॉम्बो जेनिक होने लगता है। इस कारण नसों में उसका प्रवाह कम हो जाता है। खून में मौजूद ठोस तत्व और तरल पदार्थ एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, इस कारण रक्त का प्रवाह प्रभावित होता है और व्यक्ति को इसका नुकसान दिखने लग जाता है।

जानलेवा रोग की पुष्टि और इलाज
लखनऊ के लोहिया संस्थान के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. भुवन चंद्र तिवारी बताते हैं कि रोग की पुष्टि के लिए वैस्कुलर डॉपलर करते हैं। ये रक्त वाहिकाओं का अल्ट्रासाउंड करने जैसा है जिससे थक्के का पता चलता है। पैरों में पेरिफेरल एंजियोग्राफी से थक्के को कम किया जाता है इसके बाद कुछ समय तक जरूरी दवाएं चलती हैं।


खून का थक्का जानलेवा क्यों?
डॉ. तिवारी बताते हैं कि पैरों या शरीर के किसी हिस्से में खून का थक्का होने पर जान का जोखिम बढ़ जाता है। रोगी को खांसी या छींक आने पर ये थक्का हृदय तक पहुंच सकता है जिससे मरीज की अचानक मौत तक हो सकती है। धमनियों में खून जमने के बाद समय पर अस्पताल पहुंचने से अंग को काटने से बचाया जा सकता है।

नस और धमनी में अंतर : धमनी (आर्टरी) हृदय से शुद्ध रक्त जिसमें ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा होती है। वो उसे शरीर के अंगों तक ले जाकर अंगो को ऑक्सीजन पहुंचाती है। इसके बाद खून में ऑक्सीजन कम होता है जिसे डिऑक्सीजीनेटेड ब्लड कहते हैं। यह खून यह नसों (वेन्स) से होते हुए हृदय में वापस आता है।

नसों के रंग को समझें :  खून में ऑक्सीजन का स्तर पर्याप्त होने पर उसका रंग लाल होता है। ऑक्सीजन कम होने पर खून नीले और बैंगनी का रंग का दिखता है।

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