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हालात: कोरोना महामारी ने न्यूरोसाइंस चिकित्सा को पीछे धकेला, ज्यादातर डॉक्टर पूरे नहीं कर पाए अध्ययन

Wed, 02 Oct 2024 05:11 AM IST
दीपक कुमार शर्मा परीक्षित निर्भय, अमर उजाला
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 02 Oct 2024 05:11 AM IST
सार

अध्ययन के अनुसार, साल 2020 में कोरोना महामारी की शुरुआत होने के बाद चिकित्सा के अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ तंत्रिका विज्ञान से जुड़े शोध अनुसंधान भी प्रभावित होना शुरू हुए। नौ अस्पतालों में करीब 500 से ज्यादा डॉक्टर उन दिनों अलग-अलग बीमारियों और उनके इलाज से जुड़े अध्ययन में लगे हुए थे, लेकिन 2021 में डेल्टा स्वरूप की लहर के कारण चिकित्सकों का पूरा समय कोरोना वार्ड में ही गुजरा।

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Corona epidemic pushed neuroscience therapy back Due to this doctors could not complete study on time
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

कोरोना महामारी ने देश की न्यूरोसाइंस चिकित्सा को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसकी वजह से तय समय पर चिकित्सा अध्ययन पूरे नहीं हुए, जिसके कारण डॉक्टरों को काफी समय देना पड़ा। यह जानकारी इंडियन मेडिकल जर्नल ऑफ रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित अध्ययन में सामने आई है, जिसमें दिल्ली एम्स, चंडीगढ़ पीजीआई और बंगलूरू के निम्हांस सहित नौ बड़े अस्पतालों से जानकारी एकत्रित की गई है।

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अध्ययन के अनुसार, साल 2020 में कोरोना महामारी की शुरुआत होने के बाद चिकित्सा के अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ तंत्रिका विज्ञान से जुड़े शोध अनुसंधान भी प्रभावित होना शुरू हुए। नौ अस्पतालों में करीब 500 से ज्यादा डॉक्टर उन दिनों अलग-अलग बीमारियों और उनके इलाज से जुड़े अध्ययन में लगे हुए थे, लेकिन 2021 में डेल्टा स्वरूप की लहर के कारण चिकित्सकों का पूरा समय कोरोना वार्ड में ही गुजरा। कई डॉक्टरों को अपना अध्ययन बीच में ही छोड़ना पड़ा, जो 2023 तक पूरा नहीं हुआ।
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चिकित्सा अनुसंधान पर विचार करना जरूरी
शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत सहित पूरी दुनिया में भविष्य की महामारी को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। इसे लेकर सरकार नीति बनाने में भी जुटी है। ऐसे में यह जरूरी है कि नीति में चिकित्सा अनुसंधान को लेकर भी विचार किया जाए, ताकि फिर से यह गंभीर प्रभाव देखने को न मिले।
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83.5 फीसदी के मुताबिक पड़ा प्रभाव
अध्ययन के अनुसार, 504 डॉक्टरों में से 83.5 फीसदी ने बताया कि महामारी ने उनके शोध को प्रभावित किया है। लगभग एक-तिहाई ने शोध अध्ययन पूरा करने में देरी की सूचना दी है। ज्यादातर डॉक्टरों (59.6%) ने बताया कि उन्हें अपनी पारंपरिक कार्य से हटकर कोरोना की नैदानिक सेवाओं की ओर मोड़ दिया गया। 126 (25%) डॉक्टरों ने अध्ययन के लिए नैतिक अनुमोदन प्राप्त करने में देरी की भविष्यवाणी भी की है। इनका मानना है कि भविष्य में तंत्रिका विज्ञान से संबंधित अनुसंधान के लिए धन के अवसरों में कमी हो सकती है।

इन संस्थानों के चिकित्सकों ने हकीकत से कराया रूबरू
इस अध्ययन में बंगलूरू के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान, तिरुवनंतपुरम के श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, चंडीगढ़ पीजीआई, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल, दिल्ली एम्स और दिल्ली के ही यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज और गुरु तेग बहादुर अस्पताल के अलावा तेलंगाना एम्स, पुडुचेरी के जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च और कोलकाता के बांगुर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज के न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन और मनोचिकित्सकों ने अपने अनुभवों को साझा किया है।

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