दिल्ली विधानसभा चुनाव : कांग्रेस ने राजधानी में भी दुहरा दी हरियाणा वाली गलती!
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राहुल गांधी को बुधवार को कोंडली में एक जनसभा को संबोधित करना था। इसके लिए दोपहर तीन बजे का समय निर्धारित किया गया था। जनता उन्हें सुनने के लिए लगभग एक बजे से ही एकत्रित होने लगी थी। दो बजे तक कल्याणपुरी चौक का चौराहा लोगों से खचाखच भर गया था। लेकिन अपनी चुनावी व्यस्तता के कारण राहुल गांधी यहां पूरे ढाई घंटे की देरी से पहुंचे।
लेकिन उनकी देरी से किसी को कोई परेशानी होती नहीं दिखाई पड़ी। उलटे भीड़ ने राहुल गांधी का जबरदस्त स्वागत किया। कांग्रेस और उनके लिए खूब नारेबाजी की। पूरे भाषण के दौरान बार-बार ताली बजाकर लोग उनका समर्थन करते दिखाई पड़े। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रैलियों में इसी तरह का उत्साह देखा जा रहा है।
राहुल और प्रियंका गांधी के प्रति जनता का उत्साह देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव वाली गलती दुहरा दी है? उन दोनों ही चुनावों में पर्यवेक्षकों का मानना था कि जनता कांग्रेस को आगे बढ़कर समर्थन देने को तैयार थी, उसने दिया भी, लेकिन कांग्रेस ने ही अपनी चुनावी तैयारियों में कमी कर दी थी। अगर पार्टी बेहतर आक्रामक अंदाज में चुनाव लड़ती तो उसे ज्यादा बेहतर सफलता मिल सकती थी। क्या उसी तरह की भूल पार्टी ने दिल्ली में भी कर दी है?
हरियाणा में कांग्रेस अंतिम समय तक अपने नेताओं के अन्तर्द्वन्द में उलझी रही। पार्टी ने राज्य इकाई की कमान भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ में देने में देरी की। चुनाव में इसका भारी नुक्सान हुआ। माना जाता है कि अगर हुड्डा को यह कमान छह महीने और पहले मिल गई होती तो चुनाव परिणाम काफी बेहतर हो सकता था।
रुक नहीं रहा गलतियों का सिलसिला
दिल्ली में दुर्भाग्यवश कांग्रेस ने 20 जुलाई को अपनी बेहद साफ-स्वच्छ छवि की नेता शीला दीक्षित को खो दिया। उन्हीं के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में शानदार वापसी की थी। उनके देहावसान के बाद चुनाव के लिहाज से बेहद अहम समय में पार्टी ने तीन महीने तक दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष ही नियुक्त नहीं किया।
लंबे इंतजार के बाद 23 अक्तूबर को सुभाष चोपड़ा को पार्टी की कमान सौंपी गई। जबकि इन्हीं तीन महीनों में के दौरान आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनावों के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी थी। वह और भाजपा लगातार चुनावी कार्यक्रम कर जनता को अपने पक्ष में मोड़ने में लगे थे। हो सकता है कि जब 11 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आएं तब इस अहम समय को गंवाने का कांग्रेस पार्टी को अफसोस हो।
कांग्रेस की गलतियों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता जब सड़कों पर अपनी पार्टियों के लिए आक्रामक चुनाव प्रचार कर रहे थे, अरविंद केजरीवाल और अमित शाह गलियों की खाक छान रहे थे, कांग्रेस नेतृत्व शिथिल दिखाई पड़ा।
कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय चेहरे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अंतिम समय चार और पांच फरवरी को चुनाव प्रचार में उतरे। पार्टी को इसका भी नुकसान हो सकता है। ध्यान देने वाली बात है कि इसी बीच प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में बेहद सक्रिय रहीं। योगी आदित्यनाथ सरकार पर बेटियों से दुष्कर्म और मॉब लिंचिंग जैसे मामलों पर कड़ा हमला बोला। लेकिन अज्ञात रणनीति से उन्होंने दिल्ली से दूरी बनाए रखी।
भाजपा को रोकने के लिए आप के लिए रास्ता छोड़ा
कोंडली की चुनावी जनसभा में भीड़ एकत्र करने में पार्टी के पूर्वी दिल्ली के ही एक पूर्व विधायक की बेहद सक्रिय भूमिका थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी नेतृत्व ने इस चुनाव में आक्रामक चुनाव अभियान नहीं किया। अगर उनके नेता पहले ही जमीन पर उतरकर प्रचार करते तो कई सीटों पर बाजी पलट सकती थी।
राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस की इस सुस्त चाल को एक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा है कि कुछ मजबूत कांग्रेस प्रत्याशियों की सीटों को छोड़कर भाजपा को रोकने के लिए उसने आम आदमी पार्टी के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया है।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और दिग्गज नेता आनंद शर्मा ने इन चर्चाओं को सिरे से खारिज कर दिया। पार्टी का घोषणा पत्र जारी करने के अवसर पर उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें कांग्रेस को कमजोर करने के लिए कही जा रही हैं। लेकिन कांग्रेस पूरी मजबूती से चुनाव लड़ रही है।