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चेक बाउंस के मामलों का शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी हो सकता है निपटारा

Sat, 07 Oct 2017 04:04 AM IST
एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Updated Sat, 07 Oct 2017 04:04 AM IST
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Complaint of check bounce can also be Settlement done without consent
check bounce - फोटो : FILE PHOTO
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत किसी मामले के आरोपी को शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी बरी किया जा सकता है, अगर कोर्ट इस बात से संतुष्ट है कि उसने शिकायतकर्ता को पूरा मुआवजा दे दिया है। शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था चेक बाउंस के एक मामले में दी है। 
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अदालत के अनुसार धारा 138 का उल्लंघन मूलत: दीवानी मामला होता है। इसलिए कोर्ट के बाहर उनका निपटारा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था के बाद अदालतों में चल रहे चेक बाउंस के मामलों के शीघ्र निपटाने की उम्मीद जगी है।
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जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की खंडपीठ चेक बाउंस के एक आरोपी की अपील पर सुनवाई कर रही है। आरोपी के अनुसार वह बाउंस हुए चेक की पूरी राशि का ब्याज सहित भुगतान करने के लिए तैयार था और इस आधार पर मामले का निपटारा करने या सुनवाई की स्थिति में व्यक्तिगत पेशी से छूट की मांग की थी, लेकिन शिकायतकर्ता इसके लिए राजी नहीं था और इसी आधार पर मजिस्ट्रेट ने केस जारी रखने और व्यक्गित पेशी से छूट नहीं देने का फैसला किया।
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यह मामला हाईकोर्ट में गया लेकिन उसने भी सुप्रीम कोर्ट की इस संबंध में पूर्व की व्यवस्था का हवाला देते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। जब यह केस सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो उसने निगोशिएब इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत दी गई अपनी ही पुरानी व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का फैसला किया। 

इस काम में मदद के लिए केवी विश्वनाथन और रिषि कुमार को अदालत मित्र नियुक्त किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फौजदारी अदालतों में 20 फीसदी मामले धारा 138 से संबंधित हैं और उनकी वजह से अदालतों पर काम का बोझ काफी बढ़ गया है। इसके मद्देनजर ऐसे मामलों को दोनों पक्षों की सहमति से निपटाने पर जोर देना बहुत जरूरी हो गया है।
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