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इसरो का 39 वां जीसैट-7ए उपग्रह लांच, मजबूत होगी भारतीय वायुसेना की संचार व्यवस्था

Wed, 19 Dec 2018 04:23 PM IST
Shilpa Thakur न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Shilpa Thakur Updated Wed, 19 Dec 2018 04:23 PM IST
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Communication satellite GSAT-7A on-board GSLV-F11 has been launched Sriharikota
ISRO Launch - फोटो : PTI

इसरो के भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान जीएसएलवी - एफ 11 बुधवार को देश के भूस्थिर संचार उपग्रह जीसैट - 7 ए को लेकर यहां से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुआ और उसे उसकी कक्षा में प्रवेश करा दिया गया है। यह उपग्रह वायु सेना की संचार प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाएगा। 


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इसरो के भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान जीएसएलवी - एफ 11 बुधवार को देश के भूस्थिर संचार उपग्रह जीसैट - 7 ए को लेकर यहां से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुआ और उसे उसकी कक्षा में प्रवेश करा दिया गया है। यह उपग्रह वायु सेना की संचार प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाएगा। 

जीसैट 7 - ए के लिए 26 घंटों की उलटी गिनती मंगलवार दोपहर दो बज कर 10 मिनट पर शुरू हुई और रॉकेट यहां से करीब 100 किमी दूर स्थित श्रीहरिकोटा के उपग्रह प्रक्षेपण स्थल से शाम चार बज कर 10 मिनट पर रवाना हुआ। इस उपग्रह का निर्माण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने किया है। इसका वजन 2,250 किग्रा है। यह आठ साल तक सेवा देगा। यह भारतीय क्षेत्र में केयू बैंड में संचार सेवाएं मुहैया करेगा। 

अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया कि जीएसएलवी - एफ 11 चौथी पीढ़ी का प्रक्षेपणयान है। यह यान तीन चरणों वाला है। रॉकेट के प्रथम हिस्से में एक मोटर और ठोस ईंधन है, जबकि दूसरे हिस्से में तरल ईंधन और उच्च क्षमता वाला इंजन है। वहीं, इसके तीसरे एवं ऊपरी हिस्से में क्रायोजेनिक इंजन है।

यह श्रीहरिकोटा से 2018 का सातवां प्रक्षेपण है और इसरो के लिए जीएसएलवी- एफ 11 का 69 वां मिशन है। 


जीसैट-7A से वायुसेना और ड्रोन ऑपरेशंस में मिलेगी मदद


जीसैट-7ए वायुसेना के एयरबेस को इंटरलिंक करने के अलावा ड्रोन ऑपरेशंस में भी मदद करेगा। फिलहाल भारत अभी अमेरिका में बने हुए प्रीडेटर-बी या सी गार्डियन ड्रोन को हासिल करने की कोशिश कर रहा है। सैटेलाइट कंट्रोल के जरिए ये ड्रोन अधिक ऊंचाई पर दुश्मन पर हमला करने की क्षमता रखता है।

-  500-800 करोड़ रुपये की लगात में तैयार हुई इस सैटेलाइट में 4 सोलर पैनल लगाए गए हैं। जिनकी मदद से 3.3 किलोवाट बिजली पैदा की जा सकती है। 

- इसके साथ ही इसमें कक्षा में आगे-पीछे जाने या ऊपर जाने के लिए बाई-प्रोपेलैंट का केमिकल प्रोपल्शन सिस्टम भी दिया गया है। इससे पहले इसरो ने जीसैट-7 सैटेलाइट को लांच किया था। इसे रुकमिणि के नाम से जाना जाता है।

- 29 सितंबर 2013 में लांच हुई यह सैटेलाइट नेवी के युद्धक जहाजों, पनडुब्बियों और वायुयानों को संचार की सुविधाएं प्रदान करती है। आने वाले समय में वायुसेना को जीसैट-7 सी मिलने के भी आसार हैं।

क्यों जरूरी हैं सैटेलाइट?

इस वक्त धरती के चारों ओर दुनियाभर की लगभग 320 मिलिटरी सैटेलाइट चक्कर काट रही हैं। जिनमें से अधिकतर अमेरिका की हैं। इसके बाद इस मामले में रूस और चीन का नंबर आता है।  

इनमें से अधिकतर रिमोट-सेंसिंग हैं। ये धरती की निचली कक्षा में मौजूद रहकर धरती के चित्र लेने में मददगार होते हैं। वहीं निगरानी, संचार आदि के लिए कुछ सैटेलाइट को धरती की भू-स्थैतिक कक्षा में ही रखा जाता है। ये सैटेलाइट पाकिस्तान के खिलाफ भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक में भी मददगार साबित हुई थीं। चीन इस मामले में लगातार प्रगति करता जा रहा है, जिसके बाद भारत भी अब तैयार हो रहा है।


 

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