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Common Electoral Roll: क्या है आम मतदाता सूची जो अब है सरकार का अगला एजेंडा, इसके पीछे की मंशा क्या?

Wed, 22 Dec 2021 01:22 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Wed, 22 Dec 2021 01:22 PM IST
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सार
सरकार, फिलहाल कानून में संशोधन के पक्ष में नहीं है, लेकिन वह राज्यों को एक आम मतदाता सूची अपनाने के लिए राजी करना चाहती है। आम मतदाता सूची 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में किए वादों का एक हिस्सा है। 
 
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Common electoral roll for conducting all elections in the country panchayat to loksabha,  common electoral roll is dream project of Pm narendra modi which is now the next agenda of the government
आधार से जुड़ेगी मतदाता सूची - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

चुनाव सुधार पर चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 मंगलवार को राज्यसभा में पारित होने के बाद अब सरकार के एजेंडे में आम मतदाता सूची बनाना है। देश में होने वाले सभी प्रकार के चुनावों यानी पंचायत, नगरपालिका, राज्य विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के लिए एक समान सूची बनाने के लिए केंद्र सरकार आम मतदाता सूची बनाने पर विचार कर रही है। इसके लिए केंद्र सरकार जल्द ही राज्य चुनाव आयुक्तों के साथ बैठक करने की योजना बना रही है ताकि उन्हें संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक आम मतदाता सूची अपनाने के लिए राजी किया जा सके।  


'एक राष्ट्र एक चुनाव' की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहे कदम
इस प्रयास को ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। 'एक राष्ट्र एक चुनाव' पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट समझा जाता है। माना जा रहा है कि सराकर धीरे-धीरे इसी तरफ कदम बढ़ा रही है।भारतीय जनता पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं से पहले ही कहा है कि वह देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराए जाने की योजना पर देशभर में लोगों के बीच जागरुकता फैलाएं।


2018 में नीति आयोग के साथ बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने प्रबुद्ध वर्ग से जुड़े लोगों से आग्रह किया था कि वे राजनीतिक दलों पर देश में एक चुनाव की योजना को समर्थन देने का दबाव बनाएं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक देश में एक साथ एक चुनाव कराए जाने को लेकर पार्टी  बेहद गंभीर है और इसे व्यवहारिक तौर पर इसे अंजाम देने में जो भी मुश्किलें आएंगी हम उस पर बहस करने को तैयार हैं। 
 

चुनाव जीतने के बाद अभिवादन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह
चुनाव जीतने के बाद अभिवादन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह - फोटो : पीटीआई
पीएम मोदी कई मौके पर कर चुके हैं चर्चा
बताया जा रहा है कि बीते 16 नवंबर को चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और दोनों चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडेय ने प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ जो अनौपचारिक बातचीत की थी उसमें आम मतदाता सूची को लेकर भी चर्चा हुई थी। प्रधानमंत्री कार्यालय ने 13 अगस्त 2020 में भी इसी मुद्दे पर चर्चा करने के लिए चुनाव आयोग और विधि एवं न्याय मंत्रालय के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी।

पीएम नरेंद्र मोदी कई मौकों पर एक आम मतदाता सूची बनाने की बात कह चुके हैं। पीएम ने नवंबर 2020 में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि अलग-अलग मतदाता सूचियां संसाधनों की बर्बादी हैं। लोकसभा विधानसभा और स्थानीय चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची सही है। एक राष्ट्र एक चुनाव सिर्फ बहस का विषय नहीं है, यह भारत की आवश्यकता है।

भाजपा के घोषणपत्र में रहा है शामिल
सरकार ने आम मतदाता सूची बनाने को लेकर प्रयास इसलिए तेज कर दिए हैं कि क्योंकि  यह 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की घोषणपत्र का हिस्सा था। अप्रत्यक्ष तौर पर यह भाजपा के लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की प्रतिबद्धता से जुड़ा है। सरकार चाहती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इस पर एक ठोस कदम उठा लिया जाए।

बंगाल में मतदान करते मतदाता
बंगाल में मतदान करते मतदाता - फोटो : पीटीआई
समिति ने की बैठक
संसद ने जिस दिन चुनाव सुधार को लेकर एक बड़ा कदम उठाया उसी दिन यानी मंगलवार को ही देश में चुनाव कराने के लिए आम मतदाता सूची की स्थिति'  विषय पर कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति की बैठक हुई। इस समिति के अध्यक्ष बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी हैं। मिली जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग के प्रतिनिधियों ने समिति को सामान्य मतदाता सूची की स्थिति पर एक प्रस्तुति दी। बताया यह भी जा रहा है कि सरकार ने समिति को सूचित किया कि वह जल्द ही राज्य चुनाव आयुक्तों के साथ एक बैठक करने की योजना बना रही है ताकि उन्हें एक आम मतदाता सूची अपनाने के लिए मनाने की कोशिश की जा सके।

इसकी जरूरत क्यों? 
देश में अलग-अलग चुनावों के लिए अलग-अलग मतदात सूचियां हैं। कई राज्यों में, पंचायत और नगरपालिका चुनावों के लिए जिस मतदाता सूची का प्रयोग किया जाता है वह संसद और विधानसभा चुनावों के मतदाता सूची से अलग होती है। हर बार अलग-अलग मतदाता सूची बनाने में धन और संसाधन दोनों का खर्च होता है। सरकार आम मतदाता सूची और एक साथ चुनावों को खर्च और संसाधन बचाने के तरीके के तौर पर पेश करती है।

चुनाव आयोग
चुनाव आयोग - फोटो : social media
अलग-अलग मतदाता कई बार भ्रम की स्थिति
इसके पीछे यह भी तर्क दिया जाता है कि दो अलग-अलग संस्थाएं जब अलग-अलग मतदाता सूची बनाती है तो इसमें काफी दोहराव होता है, जिससे इस काम में लगे कर्मचारियों के प्रयास और खर्च भी दोगुने हो जाते हैं, जबकि एक मतदाता सूची के जरिए भी यह काम हो सकता है। अलग-अलग मतदाता सूची होने से मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है, क्योंकि कई बार एक मतदाता सूची में व्यक्ति का नाम मौजूद होता है, जबकि दूसरे में नहीं। 

अलग-अलग जिम्मेदारी
भारत निर्वाचन आयोग लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी उठाता है। संविधान के अनुच्छेद 324(1) में केंद्रीय चुनाव आयोग को संसद और विधानसभाओं के सभी चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने और नियंत्रित करने के अधिकार दिए गए हैं। जबकि संविधान के अनुच्छेद 243के और 243जेडए राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव से संबंधित हैं।

जबकि राज्य निर्वाचन आयोग  नगर निगम, नगरपालिकाओं, जिला परिषदों, जिला पंचायतों, पंचायत समितियों, ग्राम पंचायतों तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव कराती है। संविधान के अनुसार इन चुनावों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के पास यह अधिकार है कि वह अलग मतदाता सूची तैयार कराए और इसके लिए उसे भारत निर्वाचन आयोग के साथ समन्वय करना जरूरी नहीं है।

चुनाव आयोग
चुनाव आयोग - फोटो : ANi
संविधान के अनुच्छेद 243 के में कहा गया है ‘ पंचायतों के सभी चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने और उसके संचालन का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य के चुनाव आयोग में निहित होगा, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे।’ इसलिए लोकसभा या विधानसभा चुनाव में अलग मतदाता सूची होती है और राज्यों के स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए अलग। हालांकि कुछ राज्य अपने निर्वाचन आयोग को भारतीय निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची का इस्तेमाल करने की इजाजत देते हैं।

किन-किन राज्यों में है यह व्यवस्था
मौजूदा समय में  उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश, केरल, ओडिशा, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर को छोड़कर सभी राज्य स्थानीय निकाय चुनावों के लिए चुनाव आयोग के मतदाता सूची को अपनाते हैं।

मतदाता सूची
मतदाता सूची - फोटो : अमर उजाला
विचार नया नहीं 
आम मतदाता सूची का मुद्दा 2002 से ही चर्चा में रहा है। जब न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया ने संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थानों, राज्य विधानसभा और संसद के चुनावों के लिए एक आम मतदाता सूची की सिफारिश की थी।

दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने 2007 में स्थानीय शासन पर अपनी छठी रिपोर्ट में यह कहा था कि स्थानीय सरकार के कानून में यह प्रावधान होना चाहिए कि विधानसभा चुनाव की मतदाता सूची को अपना सकें। विधि आयोग ने 2015 में अपनी 255वीं रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की थी। 
सरकार इसे कैसे लागू करना चाहती है?


यह कैसे लागू होगा
पिछले साल 13 अगस्त को जब प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पर चर्चा की थी तो बैठक में दो विकल्पों पर विचार किया गया। पहला, अनुच्छेद 243के और 243जेडए में एक संवैधानिक संशोधन किया जाए जो राज्य निर्वाच आयोग को स्थानीय निकायों के  चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है। इस संशोधन से देश में सभी चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची होना अनिवार्य हो जाएगा। दूसरा, राज्य सरकारों को अपने संबंधित कानूनों में बदलाव करने के लिए राजी किया जाए ताकि नगरपालिका और पंचायत चुनावों के लिए वे भारत निर्वाचन चुनाव आयोग की मतदाता सूची को अपनाएं। 




 
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