कमांडो की रिहाई: ये 'मध्यस्थ' कैसे जीतते हैं आतंकियों या नक्सलियों का भरोसा, पढ़ें कंधार से बीजापुर तक की कहानी
'मीडिएटर', 'नेगोशिएटर' और 'इंटरलॉक्यूटर', भले ही ये तीनों एक जैसा ही काम करते हैं, लेकिन इनकी जिम्मेदारी, ट्रेनिंग व कामकाज का तरीका अलग होता है
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जब किसी व्यक्ति को आतंकी संगठन या माओवादी बंधक बना लेते हैं, तो उसकी सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित कराने के लिए मध्यस्थों की मदद ली जाती है। इन मध्यस्थों पर दोनों पक्षों को भरोसा रहता है। बंधकों को रिहा कराने वाले अधिकांश मध्यस्थ या वार्ताकार सफल हो जाते हैं, लेकिन कई अवसरों पर उनकी जान का जोखिम भी रहता है। सरकार की तरफ से इन मध्यस्थों को किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिलती।
'मीडिएटर', 'नेगोशिएटर' और 'इंटरलॉक्यूटर', भले ही ये तीनों एक जैसा ही काम करते हैं, लेकिन इनकी जिम्मेदारी, ट्रेनिंग व कामकाज का तरीका अलग होता है। इंटेलिजेंस ब्यूरो 'आईबी' में लंबे समय तक काम कर चुके दिल्ली पुलिस के पूर्व स्पेशल सीपी प्रदीप भारद्वाज ने इस विषय पर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ खास बातचीत की है। उन्होंने कंधार से लेकर बीजापुर तक की घटना में 'मध्यस्थ और वार्ताकार' की भूमिका को लेकर कई खुलासे किए हैं।
बता दें कि 24 दिसंबर 1999 को आतंकियों ने इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 का अपहरण कर लिया था। विमान में कुल 180 यात्री और क्रू मेंबर सवार थे। विमान को अमृतसर, लाहौर और दुबई होते हुए कंधार, अफगानिस्तान ले जाया गया। नेगोशिएटर की बातचीत के बाद वाजपेयी सरकार ने तीन आतंकियों की रिहाई का समझौता किया। विदेश मंत्री जसवंत सिंह खुद उन तीन कुख्यात आतंकियों को लेकर कंधार के लिए रवाना हो गए थे। मौजूदा 'एनएसए' अजीत डोभाल उस वक्त मुख्य वार्ताकारों में शामिल थे।
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में जब कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को नक्सलियों ने अगवा कर लिया, तो उनकी रिहाई के लिए वार्ताकार बीडी शर्मा और प्रोफेसर जी हरगोपाल को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इन वार्ताकारों ने माओवादियों से बातचीत कर एलेक्स पॉल को सुरक्षित तरीके से छुड़वा लिया।
पूर्व आईपीएस प्रदीप भारद्वाज बताते हैं, दरअसल, आम आदमी के लिए 'मीडिएटर', 'नेगोशिएटर' और 'इंटरलॉक्यूटर' (वार्ताकार) एक जैसे ही होते हैं। भले ही इन तीनों का मकसद एक जैसा हो, लेकिन इनके कामकाज का तरीका अलग ही रहता है। कंधार जैसे मामलों में टेक्निकल इश्यू बहुत ज्यादा रहता है। वहां पर सरकार द्वारा प्रोफेशनल वार्ताकारों की सेवा ली जाती है। इन्हें सरकार ट्रेनिंग भी देती है।
उसमें सामाजिक अवस्था, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं संबंधों का पारखी होना बहुत जरूरी है। हालांकि कंधार मामले में आपातकालीन स्थिति के दौरान 'मध्यस्थ निगोशिएटर' की मदद ली गई थी। छोटी अवधि के लिए ही सही, लेकिन उन्हें भी सरकार से ट्रेनिंग मिली थी। यहां पर अनुभवी नौकरशाहों को बातचीत में शामिल किया जाता है।
मध्यस्थ 'मीडिएटर', बीजापुर की घटना में मध्यस्थों की मदद से ही नक्सलियों के कब्जे में रहे कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह को रिहा कराया जा सका है। इनके पास लंबी बातचीत का समय नहीं होता। सरकार का एक सीधा संदेश होता है, जो इन्हें नक्सलियों को बता देना है। चूंकि इस तरह के मध्यस्थों में कोई सरकारी प्रतिनिधि नहीं रहता, इसलिए इन्हें तय प्वाइंट पर ही आगे बढ़ने की सलाह दी जाती है।
दिवंगत स्वामी अग्निवेश ने कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। माओवादियों के टॉप लीडर चेरुकुरी राजकुमार उर्फ 'आजाद' के साथ बातचीत के लिए स्वामी अग्निवेश को अधिकृत किया गया था। जुलाई 2010 में वे बातचीत करने की तैयारी कर ही रहे थे कि आंध्रप्रदेश पुलिस ने एक मुठभेड़ में आजाद को मार गिराया। उस मुठभेड़ में स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्रन पांडे भी मारे गए थे।
इस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए पांडे की पत्नी और खुद स्वामी अग्निवेश भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। यहां पर मध्यस्थ को लेकर भरोसा टूटने की बात सामने आई। उस वक्त ममता बनर्जी और तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी इस मामले में सवाल उठाए थे। पद्मश्री धर्मपाल सैनी, गोंडवाना समन्वय समिति अध्यक्ष तेलम बोरैया, पत्रकार गणेश मिश्रा, मुकेश चंद्राकर, राजा राठौर व शंकर आदि मध्यस्थों के सहयोग से कोबरा जवान को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाने में सफलता मिली है।
बतौर प्रदीप भारद्वाज, वार्ताकार 'इंटरलॉक्यूटर' भी वही काम करते हैं, लेकिन यहां तरीका अलग रहता है। उत्तर-पूर्व में नागाओं के साथ 25 साल से बातचीत चल रही थी। एनएसए के सामने बड़े सरेंडर हुए थे। यहां पर 'इंटरलॉक्यूटर' की सेवा ली जाती है। ये लोग अपने काम में प्रोफेशनल होते हैं। इनमें आईएएस, आईपीएस और आईबी के अधिकारियों को भी शामिल किया जाता है। इन्हें बाकायदा ट्रेनिंग भी दी जाती है।
बातचीत के दौरान कई ऐसे पड़ाव आते हैं, जब वार्ता टूटने या माहौल गर्माने की नौबत आ जाती है, उस वक्त ये सरकार से नहीं पूछते कि उन्हें क्या करना है। वे पहले से ही ऐसी सभी बातों का जवाब देने के लिए तैयार रहते हैं। कश्मीर की समस्या हो या पंजाब का मसला, वहां लंबे समय तक वार्ताकार यानी इंटरलॉक्यूटर की मदद ली जाती रही है। ऐसे केसों में इंटरलॉक्यूटर के लिए संबंधित राज्य या समुदाय का इतिहास जानना बहुत जरूरी होता है।
नक्सलियों के पास जो मध्यस्थ जाते हैं, वे नैतिकता, संविधान और सामाजिक मुद्दों पर बात करते हैं। जैसे वे अपनी बातचीत का फोकस इस बात पर रखते हैं कि निहत्थे लोगों को मारने से क्या मिलेगा। मध्यस्थों पर दोनों पक्षों का भरोसा रहता है, इसलिए सरकार उन्हें अपनी तरफ से कोई प्रस्ताव रखने की स्वतंत्रता देती है। जैसे आदिवासियों की विकास से जुड़ी कोई मांग पूरी करना, सड़क, स्कूल या स्वास्थ्य केंद्र आदि बनवाने के लिए हां कर लेना। कोई दूसरा ऐसा विकास कार्य, जिससे वहां का इलाका मुख्य धारा में आ जाए, ऐसा वादा मध्यस्थ कर सकते हैं। मध्यस्थों पर नक्सलियों को भरोसा रहता है कि वे धोखा नहीं करेंगे। उनका अहित नहीं होने देंगे और कभी मुखबिर नहीं बनेंगे, यह विश्वास उन्हें रहता है।
सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी भी कुछ लोगों के साथ जोनागुड़ा पहुंची थीं, लेकिन उनसे बात नहीं बन सकी। सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैदराबाद में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर रहे हरगोपाल को 1993 में कांग्रेस पार्टी के विधायक पी बालाराजू और आईएएस अधिकारी श्रीनिवासुलु सहित चार अन्य लोगों को माओवादियों के कब्जे से छुड़ाने में कामयाबी मिली थी। नक्कीरन के संपादक जी गोपाल ने भी कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुट मिजो नेशनल फ्रंट से समझौता करने में अजीत डोभाल की भूमिका थी। नागाओं के उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आइएम) के साथ समझौते के लिए जो वार्ताकार नियुक्त किए गए, उसके पीछे डोभाल का ही दिमाग रहा था। वार्ताकार आरएन रवि, एनएसए की पसंद थे। कई बार वार्ताकारों को गलत ठहराकर बातचीत नहीं की जाती। जैसे 2010 में केंद्र ने कश्मीर के अलगाववादी गुटों से बातचीत करने के लिए तीन सदस्यीय वार्ताकारों की एक टीम गठित की थी। हुर्रियत नेता मीरवायज उमर फारूक ने इसे मजाक करार दिया था। उन्होंने कहा, पत्रकारों और शिक्षाविदों की कमेटी बनाकर भारत सरकार ने इस मामले की गंभीरता को नजरअंदाज किया है। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग मामले में भी वार्ताकार नियुक्त किए थे।