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अध्ययन: भारत में जलवायु संकट अब रोजमर्रा की हकीकत, करोड़ों लोग झेल रहे भीषण गर्मी; सूखा और प्रदूषण की मार

Sat, 03 Jan 2026 06:34 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: शुभम कुमार Updated Sat, 03 Jan 2026 06:34 AM IST
सार

येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज के ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ कि भारत में 96% लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। तेज तूफान, चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाओं ने रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित किया, दिखा रहा है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक चेतावनी नहीं, बल्कि आम लोगों की सच्चाई बन चुका है।

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Climate crisis is now an everyday reality in India millions people facing extreme heat drought and pollution
जलवायु परिवर्तन - फोटो : Freepic

विस्तार

भारत में जलवायु संकट अब किसी दूर की वैज्ञानिक चेतावनी नहीं, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की सच्चाई बन चुका है। येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज कम्युनिकेशन के ताजा अध्ययन से सामने आया है कि देश के अलग-अलग राज्यों में करोड़ों लोग भीषण गर्मी, चक्रवात, सूखा, जल और वायु प्रदूषण जैसी चरम मौसमी घटनाओं को सीधे झेल रहे हैं। अध्ययन बताता है कि भारत के 96 फीसदी लोग सीधे तौर पर मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और 82 फीसदी वयस्कों का मानना है कि बढ़ता तापमान उनके और उनके परिवार के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है।

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अध्ययन के अनुसार भारत में जलवायु परिवर्तन अब केवल नीति दस्तावेजों या शोध पत्रों तक सीमित नहीं है। सर्वे में शामिल लोगों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि पिछले 12 महीनों में उन्होंने किसी न किसी गंभीर पर्यावरणीय समस्या का सामना किया है। देश भर में 71 फीसदी लोगों ने भीषण गर्मी का अनुभव किया, जबकि 59 फीसदी लोगों ने फसलों में कीट और बीमारियों का असर झेला। उतने ही लोगों को बिजली कटौती की समस्या से जूझना पड़ा, जो चरम मौसम और ऊर्जा दबाव के सीधे संकेत माने जा रहे हैं।
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क्या कहता है अध्ययन?
अध्ययन बताता है कि 53 फीसदी लोगों ने जल प्रदूषण को महसूस किया, 52 फीसदी ने सूखा और पानी की कमी झेली, जबकि 51 फीसदी लोगों ने गंभीर वायु प्रदूषण का अनुभव किया।  इसके अलावा, एक तिहाई से अधिक आबादी ने तेज तूफान, खाद्य संकट, चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना किया, जो जलवायु जोखिमों की व्यापकता को दर्शाता है।

उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों  में चक्रवात व सूखे का असर
राज्यवार आंकड़े बताते हैं कि उत्तर भारत में गर्मी का असर सबसे अधिक महसूस किया गया। राजस्थान में 80 फीसदी, हरियाणा में 80, उत्तर प्रदेश में 78 और दिल्ली में 76 फीसदी लोगों ने भीषण गर्मी झेली। इसके मुकाबले केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा करीब आधा रहा। चक्रवात के मामले में राष्ट्रीय औसत भले ही 35 फीसदी रहा हो, लेकिन ओडिशा में 64 फीसदी लोग इससे प्रभावित हुए।

झारखंड में 66 फीसदी लोगों ने सूखे या पानी की कमी का सामना किया, जबकि केरल, तमिलनाडु, चंडीगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों में 40 फीसदी या उससे कम लोगों ने इस समस्या को महसूस किया। कृषि पर असर को लेकर ओडिशा के 87 फीसदी लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग फसलों में कीट और बीमारियों को बढ़ा रही है।


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जलवायु को लेकर बढ़ती समझ
अध्ययन यह भी दर्शाता है कि भारत में लोग जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं के बीच संबंध को अच्छी तरह समझते हैं। 81 फीसदी लोगों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग से पौधों और जानवरों की प्रजातियां खत्म हो रही हैं। 78 फीसदी इसे भीषण गर्मी और कृषि कीटों से जोड़ते हैं, 77 फीसदी सूखा और जल संकट से, 73 फीसदी चक्रवात से और 70 फीसदी बाढ़ व तूफानों से जोड़ते हैं।

ऐसे में 65 फीसदी लोगों का कहना है कि बिजली संकट भी जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। येल यूनिवर्सिटी के इस अध्ययन के अनुसार अमेरिका के विपरीत भारत में जलवायु परिवर्तन को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण नहीं दिखता। अध्ययन के दौरान सामने आया कि बड़ी संख्या में नागरिक बढ़ते वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को लेकर राजनीतिक दलों की भूमिका से असंतुष्ट हैं।

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