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FAIFA: निवेश बढ़ाने से दूर होंगी जलवायु-कृषि बाधाएं, अखिल भारतीय किसान संघों के महासंघ ने जारी किया श्वेत पत्र
Fri, 06 Jun 2025 08:15 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 06 Jun 2025 08:15 AM IST
सार
एफएआईएफए ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में जलवायु-लचीली खेती को बढ़ावा देने की मांग की। जारी श्वेत पत्र में अनियमित बारिश, तापमान में बढ़ोतरी और कीट प्रकोप जैसे जलवायु संकटों से निपटने के लिए टिकाऊ कृषि प्रथाओं और तकनीकी निवेश की तत्काल जरूरत बताई गई।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : FreePik
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विस्तार
अखिल भारतीय किसान संघों के महासंघ (एफएआईएफए) ने बृहस्पतिवार को जलवायु-समर्थ खेती को बढ़ावा देने और कृषि क्षेत्र में तकनीकी के इस्तेमाल के लिए निवेश बढ़ाने और कार्यान्वयन में मौजूद बाधाओं को दूर करने की अपील की। संगठन की नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान भविष्य का पोषण: जलवायु-लचीली कृषि पर एक रिपोर्ट शीर्षक से एक श्वेत पत्र जारी किया।
इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मुकाबला करने के लिए टिकाऊ कृषि प्रथाओं की तत्काल जरूरत के बारे मे बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, खेती में शुरुआती लागत अधिक ढांचागत कमजोरी और किसानों में जागरूकता की कमी मुख्य समस्याएं हैं। रिपोर्ट में अनियमित बारिश, अकाल, तापमान में अचानक बढ़ोतरी और कीट प्रकोप को प्रमुख खतरा बताया गया है। ये खतरे उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में फसलों के चक्र को प्रभावित कर रहे हैं।
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किसानों के आय पर हो रहा असर
एफएआईएफए के महासचिव मुरली बाबू ने कहा कि मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, बढ़ती लागत और गिरते जलस्तर से खेती की उपज और किसानों की आय पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि अब किसानों को अधिक उगाओ की जगह बेहतर उगाओ की सोच अपनानी चाहिए। एजेंसी
जलवायु रोधी बीजों पर अनुसंधान की सलाह
एफएआईएफए ने सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और सूक्ष्म सिंचाई योजनाओं की सराहना की, लेकिन यह भी कहा इन्हें लागू करने में ज्यादा शुरुआती खर्च, बिखरा हुआ ढांचा और किसानों की कम भागीदारी जैसी खामियां हैं। संगठन ने संस्था ने जलवायु-रोधी बीजों पर अनुसंधान, किसानों को प्रशिक्षण देने, और सटीक कृषि उपकरणों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की सिफारिश की।
ये भी पढ़ें:- Tamil Nadu: 'समलैंगिक जोड़े भी बना सकते हैं परिवार', मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; महिला को मिली अनुमति
मिलकर काम करने का किया आह्वान
एफएआईएफए ने रिपोर्ट में जोर दिया कि जलवायु-समर्थ खेती को देशभर में बढ़ावा देने के लिए नीति निर्माताओं, शोध संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच मिलकर काम करना जरूरी है, क्योंकि भारत को अब बार-बार चरम मौसम की घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
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इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मुकाबला करने के लिए टिकाऊ कृषि प्रथाओं की तत्काल जरूरत के बारे मे बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, खेती में शुरुआती लागत अधिक ढांचागत कमजोरी और किसानों में जागरूकता की कमी मुख्य समस्याएं हैं। रिपोर्ट में अनियमित बारिश, अकाल, तापमान में अचानक बढ़ोतरी और कीट प्रकोप को प्रमुख खतरा बताया गया है। ये खतरे उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में फसलों के चक्र को प्रभावित कर रहे हैं।
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किसानों के आय पर हो रहा असर
एफएआईएफए के महासचिव मुरली बाबू ने कहा कि मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, बढ़ती लागत और गिरते जलस्तर से खेती की उपज और किसानों की आय पर असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि अब किसानों को अधिक उगाओ की जगह बेहतर उगाओ की सोच अपनानी चाहिए। एजेंसी
जलवायु रोधी बीजों पर अनुसंधान की सलाह
एफएआईएफए ने सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और सूक्ष्म सिंचाई योजनाओं की सराहना की, लेकिन यह भी कहा इन्हें लागू करने में ज्यादा शुरुआती खर्च, बिखरा हुआ ढांचा और किसानों की कम भागीदारी जैसी खामियां हैं। संगठन ने संस्था ने जलवायु-रोधी बीजों पर अनुसंधान, किसानों को प्रशिक्षण देने, और सटीक कृषि उपकरणों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की सिफारिश की।
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मिलकर काम करने का किया आह्वान
एफएआईएफए ने रिपोर्ट में जोर दिया कि जलवायु-समर्थ खेती को देशभर में बढ़ावा देने के लिए नीति निर्माताओं, शोध संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच मिलकर काम करना जरूरी है, क्योंकि भारत को अब बार-बार चरम मौसम की घटनाओं का सामना करना पड़ रहा है।