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जानें कौन हैं ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिनकी मूर्ति तोड़े जाने पर बंगाल में गरमाई सियासत

Wed, 15 May 2019 11:31 AM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता Published by: Sneha Baluni Updated Wed, 15 May 2019 11:31 AM IST
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clashes erupt in bengal after vandalising statue of Ishwar Chandra Vidyasagar, know who was he
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति को बंगाल में तोड़ दिया गया है - फोटो : Social Media
कोलकाता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान भड़की हिंसा के दौरान कॉलेज परिसर में स्थित महान दार्शनिक, समाजसुधारक और लेखक ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी गई। इसके लिए तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर आरोप लगाया है। हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने अपने ट्विटर एकाउंट पर ईश्वरचंद विद्यासागर की तस्वीर को प्रोफाइल फोटो बना लिया है।
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कौन हैं ईश्वरचंद्र विद्यासागर

ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को कोलकाता में हुआ था। वह एक प्रसिद्ध समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे। उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह के खिलाफ आवाज उठाई थी।
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उन्होंने 'मेट्रोपोलिटन विद्यालय' सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना की और साल 1848 में वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का भी प्रकाशन किया था। नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद विद्यासागर का मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता है।
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जन्म और पढ़ाई

विद्यासागर का जन्म पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के गरीब लेकिन धार्मिक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बन्धोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता। गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद वह अपने पिता के साथ कोलकाता आ गए थे। वह चीजों को जल्दी सीख लिया करते थे। पढ़ाई में अच्छे होने की वजह से उन्हें कई संस्थानों से छात्रवृत्तियां मिली थीं। वह काफी विद्वान थे जिसके कारण उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई थी।

व्यावसायिक जीवन

साल 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी की। 21 साल की उम्र में साल 1841 में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया था। यहां पांच साल तक अपनी सेवा देने के बाद उन्होंने इसे छोड़ दिया और संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के तौर पर नियुक्त हुए। पहले साल से ही उन्होंने शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए प्रशासन को अपनी सिफारिशें सौंपी। जिसके कारण उनके और तत्कालीन कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता के बीच तकरार पैदा हो गया। इस वजह से उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। 1849 में एक बार फिर वह साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुडे़।

समाज सुधारक

समाज सुधार योगदान के तहत ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना की। इन स्कूलों को चलाने का पूरा खर्चा उन्होंने अपने कंधों पर लिया। इसके लिए वह बंगाली में लिखी गई किताबों जिन्हें कि विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए लिखा जाता था, उसकी बिक्री से फंड जुटाते थे। 


जब उन्हें संस्कृत कालेज का प्रधानाचार्य बनाया गया तो उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिए। उनके लगातार प्रचार का नतीजा था कि विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ। उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी करवाई थी। उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी।

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