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CJI: 'सैनिकों को दो लड़ाइयां लड़ने को मजबूर न किया जाए', चीफ जस्टिस ने जवानों के लिए न्यायिक पहुंच पर दिया जोर

Mon, 30 Mar 2026 10:21 PM IST
Nirmal Kant न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Nirmal Kant Updated Mon, 30 Mar 2026 10:21 PM IST
सार

CJI: सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सैनिकों को सीमा के साथ-साथ अपने अधिकारों के लिए घर पर दूसरी लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए और उनके लिए न्याय तक आसान पहुंच जरूरी है। उन्होंने बताया कि अदालत और सैनिक अलग-अलग भूमिका निभाते हुए भी एक ही उद्देश्य के लिए काम करते हैं। पढ़िए रिपोर्ट-

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CJI urges better judicial access for soldiers, says don't make them fight two battles
जस्टिस सूर्य कांत, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सोमवार को सशस्त्र बलों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश को सैनिकों को एक साथ दो लड़ाइयां लड़ने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। सीजेआई ने कहा, एक लड़ाई सीमा पर और दूसरी अपने कानूनी अधिकारों के लिए घर पर नहीं  होनी चाहिए। इसलिए सैनिकों के लिए न्याय तक बेहतर पहुंच जरूरी है। 
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न्यायमूर्ति सूर्य कांत'माननीय मुख्य न्यायाधीश के संबोधन के मुख्य बिंदु' विषय पर बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका और सशस्त्र बलों के आपसी संबंध पर जोर दिया। उन्होंने कहा, जहां अदालतें सांविधानिक मूल्यों की रक्षा करती हैं। वहीं, सैनिक उन परिस्थितियोंको बनाए रखते हैं, जिनसे ये आदर्श कायम रह सकें।  
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हिमालय के शांत लेकिन कठिन वातावरण के बीच अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए सीजेआई ने सैनिकों की बहादुरी को नमन किया और 1962 के रेजांग ला युद्ध का खास तौर से जिक्र किया। उन्होंने मेजर शैतान सिंह भाटी और 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के 114 जवानों के बलिदान को याद किया।
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'अदालत और सैनिक का काम अलग-अलग होते हुए भी एक'
उन्होंने कहा, संविधान अधिकार, गरिमा, समानता और न्याय की बात करता है। लेकिन इन वादों को बनाए रखने की परिस्थितियां आप ही (सैनिक) सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने कहा, कोई भी देश स्वतंत्रता या न्याय की बात नहीं कर सकता, अगर वह अपनी संप्रभुता, स्थिरता और शांति को सुरक्षित नहीं रख सकता। इस दृष्टि से अदालत और सैनिक का काम अलग-अलग होते हुए भी एक ही उद्देश्य से जुड़ा है और एक-दूसरे के पूरक हैं। 

सैनिकों की समस्याओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वर्दी में सेवा करने से जीवन की सामान्य परेशानियां खत्म नहीं हो जातीं और एक सैनिक को जमीन विवाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा, एक पूर्व सैनिक को सेवा या कल्याण से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। जबकि परिवार को पेंशन में देरी, आवास की समस्या, वैवाहिक विवाद या प्रशासनिक उदासीनता जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

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'एक साथ दो लड़ाइयां न लड़ें सैनिक'
उन्होंने कहा, देश को कभी भी अपने सैनिकों को ऐसी स्थिति में नहीं रखना चाहिए कि वे एक साथ दो लड़ाइयां लड़ें- एक सीमा पर और दूसरी अपने हक के लिए घर पर। कानून को सैनिक तक पहुंचना चाहिए, क्योंकि हर बार सैनिक कानून तक नहीं पहुंच सकता। उन्होंने कहा, यह केवल सहानुभूति का नहीं, बल्कि सांविधानिक जिम्मेदारी का मामला है। अगर राज्य की संस्थाएं देश की रक्षा करने वालों को समय पर कानूनी मदद नहीं दे पातीं, तो वे अपनी नैतिक और सांविधानिक जिम्मेदारी निभाने में पीछे रह जाती हैं।


सीजेआई ने वीर सहायता योजना का किया जिक्र
सीजेआई ने 'वीर परिवार सहायता योजना' का भी जिक्र किया, जिसे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के तहत शुरू किया गया था। इस योजना के जरिये सैनिकों, पूर्व सैनिकों, उनके परिवारों और अर्धसैनिक बलों के जवानों को मुफ्त कानूनी सहायता दी जाती है। उन्होंने कहा कि इस योजना को लागू करना उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा है। अब तक देशभर में 14,929 लोगों को मदद दी जा चुकी है और 438 कानूनी सेवा केंद्र शुरू किए गए हैं, जिनमें 34 राज्य सैनिक बोर्ड और 404 जिला सैनिक बोर्ड शामिल हैं।

उन्होंने बताया, 1123 लोगों की टीम इस योजना को लागू कर रही है ताकि भरोसे और संवेदनशीलता का माहौल बने। इस टीम में 378 रक्षा पृष्ठभूमि के सदस्य शामिल हैं। इस योजना के तहत संपत्ति विवाद, पेंशन में देरी, वैवाहिक विवाद और स्कूल में दाखिले जैसे मामलों का समाधान किया जा रहा है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा, आप देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। देश की संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे आपके सभी हितों की पूरी मजबूती से रक्षा करें।
 
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