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CJI: 'आम लोगों के लिए भी सुलभ हो न्यायपालिका', लंदन के कार्यक्रम में बोले सीजेआई सूर्यकांत
Sun, 07 Jun 2026 04:37 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sun, 07 Jun 2026 04:37 AM IST
सार
सीजेआई ने कहा कि जनता का विश्वास किसी संस्था को स्वतः नहीं मिलता, बल्कि पारदर्शिता, निरंतरता और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता से अर्जित किया जाता है।
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सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि अदालतें केवल उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करें जो मुकदमा लड़ने का खर्च उठा सकते हैं, तो वे अपने सांविधानिक दायित्व का पूरी तरह निर्वहन नहीं कर रही होतीं।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को केवल अधिकारों का संरक्षक ही नहीं होना चाहिए, बल्कि आम लोगों के लिए इतनी सुलभ भी होना चाहिए कि यह संरक्षण वास्तव में प्रभावी बन सके।
जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम में यह बात कही। इस दौरान न्यायपालिका, न्याय तक पहुंच, तकनीक और कानूनी पेशे के भविष्य जैसे विषयों पर छात्रों ने उनसे सवाल किए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जनता का विश्वास किसी संस्था को स्वतः नहीं मिलता, बल्कि पारदर्शिता, निरंतरता और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता से अर्जित किया जाता है। न्यायपालिका की ताकत इस बात में नहीं है कि वह खुद को कभी गलत न माने, बल्कि संस्थाएं तब मजबूत होती हैं जब वे सीखने और सुधार के लिए तैयार रहती हैं।
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सांविधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की अंतिम कड़ी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सांविधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की अंतिम कड़ी होती है, लेकिन उसे भी संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। इसी कारण उन्होंने देशभर में एक समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि न्यायिक फैसलों में एकरूपता और स्पष्टता बनी रहे। न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के सवाल पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों का प्रमुख कर्तव्य संविधान में दिए गए अधिकारों को व्यवहार में लागू करना है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी खासकर समाज के कमजोर और आवाजहीन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है।
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उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को केवल अधिकारों का संरक्षक ही नहीं होना चाहिए, बल्कि आम लोगों के लिए इतनी सुलभ भी होना चाहिए कि यह संरक्षण वास्तव में प्रभावी बन सके।
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जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम में यह बात कही। इस दौरान न्यायपालिका, न्याय तक पहुंच, तकनीक और कानूनी पेशे के भविष्य जैसे विषयों पर छात्रों ने उनसे सवाल किए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जनता का विश्वास किसी संस्था को स्वतः नहीं मिलता, बल्कि पारदर्शिता, निरंतरता और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता से अर्जित किया जाता है। न्यायपालिका की ताकत इस बात में नहीं है कि वह खुद को कभी गलत न माने, बल्कि संस्थाएं तब मजबूत होती हैं जब वे सीखने और सुधार के लिए तैयार रहती हैं।
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सांविधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की अंतिम कड़ी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सांविधानिक लोकतंत्र में न्यायपालिका जवाबदेही की अंतिम कड़ी होती है, लेकिन उसे भी संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। इसी कारण उन्होंने देशभर में एक समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि न्यायिक फैसलों में एकरूपता और स्पष्टता बनी रहे। न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के सवाल पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों का प्रमुख कर्तव्य संविधान में दिए गए अधिकारों को व्यवहार में लागू करना है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी खासकर समाज के कमजोर और आवाजहीन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है।