एक्सप्लेनर: भारत के मुख्य न्यायाधीश ने विपक्ष के नेताओं से मिलने से क्यों किया इनकार, क्या कहता है प्रोटोकॉल?
विपक्ष की ओर से क्या मांग की गई थी? चीफ जस्टिस ने इस मांग पर क्या जवाब दिया? भारत के मुख्य न्यायाधीश के सियासी दलों से मिलने का प्रोटोकॉल क्या है? क्या इस तरह से पहले कभी सीजेआई की सियासी दलों या उनके प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई है? आइये जानते हैं...
विस्तार
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर विपक्ष की ओर से क्या मांग की गई थी? चीफ जस्टिस ने इस मांग पर क्या जवाब दिया? भारत के मुख्य न्यायाधीश के सियासी दलों से मिलने का प्रोटोकॉल क्या है? क्या इस तरह से पहले कभी सीजेआई की सियासी दलों या उनके प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- विपक्ष की ओर से चीफ जस्टिस से क्या मांग की गई थी?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने आज (सोमवार) शाम 4 से 5 बजे के बीच चीफ जस्टिस से मिलने के लिए समय की मांग की थी। दोनों नेताओं का कहना था कि वे सीजेआई से मिलकर विपक्ष की आवाज उठाएंगे और उन्हें एक ज्ञापन (मेमोरैंडम) सौंपेंगे, जिसके जरिए 'वोट चोरी' को खत्म करने की मांग की जाएगी। इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के शुद्धिकरण के लिए कराए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को रोकने की भी मांग उठेगी। राहुल-खरगे ने ज्ञापन में पेपर बैलट से चुनाव कराने की मांग उठाने की बात भी कही थी।चीफ जस्टिस ने इस मांग पर क्या जवाब दिया?
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से मिलने की मांग को चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार सुबह ही ठुकरा दिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस से जुड़े कार्यक्रम के बाद उन्होंने पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा कि जिस तरह के मुद्दों पर विपक्षी प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलना चाहता है, वह न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और कई मामले सुप्रीम कोर्ट में ही विचाराधीन हैं।उन्होंने आगे कहा, "मुझे कल एक पत्र मिला था, जिसमें मेरे साथ बैठक की मांग की गई थी। मैंने कल रात (रविवार को) ही इसका जवाब दे दिया और बताया कि मैं क्यों मिलने में असमर्थ रहूंगा।"
क्या चीफ जस्टिस विपक्ष के नेताओं से मिलने से कर सकते हैं इनकार?
लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के दो सबसे बड़े नेताओं से मिलने से इनकार करने के चीफ जस्टिस के फैसले पर कई हलकों में सवाल पूछे जा रहे हैं। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश के लिए यह घटनाक्रम कोई पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी न्यायपालिका के प्रमुख ने इस तरह के प्रस्तावों और मांगों को नकारा है। प्रोटोकॉल के तहत सीजेआई न सिर्फ विपक्ष, बल्कि सरकार के नुमाइंदों से भी अनाधिकारिक तौर पर मिलने से इनकार कर सकते हैं। इसके लिए बकायदा सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रोटोकॉल तय हैं।इन्हीं प्रोटोकॉल के बारे में अमर उजाला ने सुप्रीम कोर्ट के वकील और कानूनी विशेषज्ञ विराग गुप्ता से बात की। उन्होंने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के शक्तियों के विभाजन का उदाहरण देते हुए इस पूरे मुद्दे पर प्रकाश डाला।
क्यों सियासी दलों के नुमाइंदों से मिलने से इनकार कर सकते हैं सीजेआई, क्या कहता है प्रोटोकॉल?
संविधान के अनुच्छेद 50 में शक्तियों के पृथ्थकरण (विभाजन) यानी सेपरेशन ऑफ पॉवर का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की बेंच ने केशवानंद भारती के 1973 के फैसले में इसे मान्यता दी थी। यूपीए सरकार में कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने 'द ज्यूडिशियल स्टैंडर्ड्स एंड अकाउंटेबिलटी बिल 2010 में पेश किया था, लेकिन संसद में वह पारित नहीं हो सका। उस विधेयक में सुप्रीम कोर्ट के फुल कोर्ट के 1997 के संकल्पों का जिक्र था, जिसके अनुसार जजों को हर संभव तरीके से सियासत से दूर रहना चाहिए।विराग गुप्ता कहते हैं कि यही प्रोटोकॉल एक चीफ जस्टिस और अन्य जजों को सियासी शख्सियतों से गैर-आधिकारिक मुलाकात करने से रोकता है। यानी चीफ जस्टिस सिर्फ और सिर्फ न्यायपालिका से जुड़े मामलों या जहां संविधान के तहत उनकी भूमिका तय हो, सिर्फ उन्हीं जगहों और कार्यक्रमों में सियासी दलों के नेताओं से मिल सकते हैं। यह नियम सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से लागू हैं।
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विपक्ष के नेता न्यायिक सुनवाई के बजाय प्रशासनिक मीटिंग पर जोर क्यों दे रहे हैं?
संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी नागरिक बराबर हैं और नेताओं को विशिष्ट अधिकार नहीं हैं। अगर किसी भी नेता के मौलिक अधिकार का हनन होता है तो वह सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर सकते हैं। लेकिन न्यायिक व्यवस्था या चुनाव आयोग की व्यवस्था में सुधार के लिए उन्हें चीफ जस्टिस से मिलने की बजाय संसद में बहस करके कानून में बदलाव करने की जरुरत है।
चुनाव आयोग से जुड़े मामलों में क्यों विपक्ष का ज्ञापन नहीं ले सकते सीजेआई?
सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा समय में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की वैधता पर एक केस लंबित है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि कुछ समय पहले ही केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले तीन सदस्यीय पैनल से मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया था। पहले इस पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस होते थे। हालांकि, 2023 के कानून के जरिए केंद्र ने सीजेआई को हटाकर उनकी जगह कानून मंत्री को तीन सदस्यीय पैनल में शामिल कर लिया था।
इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जज या चीफ जस्टिस को शामिल करने के लिए संसद से पारित हुए 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के विभाजित फैसले पर पहले ही काफी विवाद है। अब यह मामला पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा गया है, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस सूर्यकांत की तरफ से ही किया जाना है।
ऐसी मुलाकात क्यों बन सकती है संविधान के मूल ढांचे पर आघात?
विराग गुप्ता के मुताबिक, जजों के बच्चों को सरकारी पैनल होने पर विवाद हो रहे हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष या विपक्ष के किसी भी नेता से जजों का मिलना न्यायिक व्यवस्था में अनुचित हस्तक्षेप माना जा सकता है। केशवानंद भारती के फैसले के अनुसार, यह संविधान के मूलभूत ढांचे में दखल और आघात भी माना जा सकता है।ये भी पढ़ें: इंडिया ब्लॉक के नेताओं से क्यों नहीं मिले सीजेआई?: मुलाकात से इनकार की अब बताई वजह, जानें पूरा मामला
क्या पहले कभी सीजेआई की सियासी दलों या उनके प्रतिनिधियों से मुलाकात हुई है?
वकील विराग गुप्ता ने बताया कि कुछ दिनों पहले एक देश एक चुनाव समिति की सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ मीटिंग पर विवाद हुआ था। उस समिति के अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं। इस विषय पर विवाद की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई होगी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फुल कोर्ट में जजों ने समिति के सदस्यों से मिलने से इनकार कर दिया।
इससे पहले सितंबर 2024 में भी एक विवाद को हवा मिली थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक गणपति पूजन के दौरान भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के घर पहुंच गए थे। इस घटना के वीडियो फुटेज काफी वायरल हुए थे और तब खुद कांग्रेस से लेकर कई विपक्षी दलों और वरिष्ठ न्यायविदों ने मुलाकात पर सवाल उठाए थे। उन्होंने इसे न्यायपालिका-विधायिका-कार्यपालिका के बीच शक्तियों के विभाजन से जोड़ते हुए अदालत की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वाला दृश्य तक करार दे दिया था। हालांकि, खुद चंद्रचूड़ और सरकार ने इसे पीएम मोदी की सामाजिक और सांस्कृतिक मुलाकात कहा था।
सवाल-जवाब में पूरा मामला
सवाल-1: मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने विपक्ष के नेताओं से मिलने से क्यों इनकार किया?
उत्तर: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि विपक्ष जिन मुद्दों (जैसे चुनाव आयोग और अन्य विषय) पर ज्ञापन देना चाहता था, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। विचाराधीन मामलों पर बंद कमरे में बैठक करना 'शक्तियों के विभाजन' के सिद्धांत और न्यायिक शुचिता के खिलाफ है।
सवाल-2: क्या सीजेआई किसी राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों से निजी तौर पर मिल सकते हैं?
उत्तर: नहीं। न्यायिक प्रोटोकॉल और सुप्रीम कोर्ट के 1997 के आचार संहिता नियमों के तहत न्यायाधीशों को राजनीतिक गतिविधियों और नेताओं से गैर-आधिकारिक मुलाकातों से दूर रहना होता है। सीजेआई केवल वहीं मिल सकते हैं जहां संविधान या कानून के तहत उनकी वैधानिक भूमिका तय हो (जैसे चयन समितियां)।
सवाल-3: अगर राजनीतिक दलों को कोई शिकायत है, तो उनके पास क्या कानूनी विकल्प है?
उत्तर: संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिक समान हैं और राजनेताओं को कोई अलग विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। यदि किसी अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वे अनुच्छेद 32 के तहत खुली अदालत में औपचारिक याचिका दायर कर सकते हैं, न कि प्रशासनिक मुलाकातों के जरिए ज्ञापन सौंप सकते हैं।
सवाल-4: संविधान का कौन सा अनुच्छेद कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग रखता है?
उत्तर: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50 राज्य को न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का निर्देश देता है। 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में इसे संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग माना गया है।
सवाल-5: क्या मुख्य न्यायाधीश कभी प्रधानमंत्री या विपक्ष के नेता से एक साथ मिल सकते हैं?
उत्तर: हां, लेकिन केवल आधिकारिक और वैधानिक समितियों की बैठकों में। उदाहरण के लिए, लोकपाल या सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए कानून द्वारा गठित चयन समितियों में सीजेआई, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष आधिकारिक तौर पर एक साथ बैठते हैं।