सीजेआई ने कहा: धर्म को अंधविश्वास और कट्टरता से ऊपर होना चाहिए
सीजेआई ने कहा कि 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के संबोधन के शब्दों पर मौजूदा भारत को बेहद ध्यान देने की जरूरत है।
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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमण ने रविवार को स्वामी विवेकानंद के 128 साल पहले शिकागो में दिए एतिहासिक भाषण को याद किया। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति की वकालत की थी। अपने संबोधन में उन्होंने समाज में निरर्थक सांप्रदायिक मतभेदों से देश व सभ्यता को होने वाले खतरे का विश्लेषण किया था।
Long before the painful churning that took place in the subcontinent during freedom struggle resulting in framing of an egalitarian Constitution of India, he (Swami Vivekananda) advocated secularism as if he foresaw the events to unfold: Chief Justice of India NV Ramana (12.09) pic.twitter.com/FagdqgmUmi
— ANI (@ANI) September 12, 2021विज्ञापन
सीजेआई रमण यहां विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन एक्सीलेंस के 22वें स्थापना दिवस समारोह को वर्चुअल तरीके से संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस दौरान स्वामी विवेकानंद के शिकागो में दिए ऐतिहासिक भाषण को याद किया।
उन्होंने कहा, भारत के समतावादी संविधान के निर्माण का कारण बने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए सांप्रदायिक संघर्ष से बहुत पहले स्वामी विवेकानंद ने धर्मनिरपेक्षता की ऐसे वकालत की थी।
मानो उन्हें आने वाले समय का आभास था। उनका दृढ़ विश्वास था कि धर्म का असली सार भलाई और सहिष्णुता में है। धर्म को अंधविश्वास और कट्टरता से ऊपर होना चाहिए। सामान्य भलाई और सहिष्णुता के सिद्धांतों के माध्यम से दोबारा उठ खड़े होने वाले भारत के निर्माण का सपना पूरा करना है तो हमें आज के युवाओं के अंदर स्वामी जी के आदर्शों को स्थापित करने का काम करना चाहिए।
संपूर्ण विश्व को किया था वेद दर्शन की तरफ आकर्षित
सीजेआई ने कहा, स्वामी विवेकानंद के संबोधन ने पूरे विश्व का ध्यान पुरातन भारत के वेदों के दर्शन की तरफ आकर्षित किया था। उन्होंने व्यावहारिक वेदांत को लोकप्रिय बनाया, क्योंकि यह सभी के लिए प्रेम, करुणा और समान सम्मान का उपदेश देता है। सीजेआई ने कहा, स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएं और सिद्धांत आने वाले सभी काल के लिए बेहद प्रासंगिक हैं।