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मिसाल: रिटायरमेंट से पहले CJI चंद्रचूड़ का फैसला, बेटे के लिए माता-पिता ने मांगी इच्छा मृत्यु, ऐसे मिली सहायता
Tue, 12 Nov 2024 07:27 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बशु जैन
Updated Tue, 12 Nov 2024 07:27 PM IST
सार
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु मांग रहे बूढ़े माता पिता को यूपी सरकार से मदद दिलाई। उन्होंने 11 साल से गंभीर बीमारी से जूझ रहे युवक को सरकारी चिकित्सा सहायता देने के सरकार को निर्देश दिए।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ 10 नवंबर को सेवानिवृत्त हो गए, मगर सेवानिवृत्ति से ठीक पहले उन्होंने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने सहानुभूति की मिसाल कायम की। पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु मांग रहे बूढ़े माता पिता को यूपी सरकार से मदद दिलाई। उन्होंने 11 साल से गंभीर बीमारी से जूझ रहे युवक को सरकारी चिकित्सा सहायता देने के सरकार को निर्देश दिए। लंबे समय से बिस्तर पर अपनी जिंदगी से जंग लड़ रहे युवक को अब घर पर ही इलाज मुहैया कराया जाएगा। डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट घर जाकर उसका उपचार करेंगे और सरकार दवाइयों समेत इलाज का पूरा खर्च वहन करेगी। युवक को क्या गंभीर बीमारी थी, उसके माता-पिता ने क्यों इच्छा मृत्यु मांगी और मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने क्या फैसला सुनाया, आइए आपको बताते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
युवक को क्या थी बीमारी
नोएडा का युवक हरीश राणा पंजाब विवि का छात्र था। 2013 में वह अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिर गया था। इसके बाद उसके सिर में गंभीर चोट आई। युवक के परिजनों ने उसके इलाज के लिए हर संभव मदद की। वे उसे कई डॉक्टरों के पास ले गए। सभी डॉक्टरों ने जवाब दिया कि युवक के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। वह 11 साल से बिस्तर पर पड़ा है और 100 फीसदी विकलांग है। उसके शरीर पर गहरे और बड़े घाव हो गए हैं।
घर बिक गया, बूढ़े मां-बाप के पास कुछ न बचा
युवक की बीमारी ने इस कदर परिवार पर कहर बरपाया कि सब कुछ बिक गया। माता निर्मला देव और पिता अशोक राणा अपने बेटे के ठीक होने की आस में सब कुछ भूल गए। घर को बेचना पड़ गया। अब बूढ़े माता-पिता का जीवन यापन करना कठिन हो रहा है। इसे लेकर माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में बेटे के लिए इच्छा मृत्यु याचिका दायर की थी। जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।
नोएडा का युवक हरीश राणा पंजाब विवि का छात्र था। 2013 में वह अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिर गया था। इसके बाद उसके सिर में गंभीर चोट आई। युवक के परिजनों ने उसके इलाज के लिए हर संभव मदद की। वे उसे कई डॉक्टरों के पास ले गए। सभी डॉक्टरों ने जवाब दिया कि युवक के ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। वह 11 साल से बिस्तर पर पड़ा है और 100 फीसदी विकलांग है। उसके शरीर पर गहरे और बड़े घाव हो गए हैं।
घर बिक गया, बूढ़े मां-बाप के पास कुछ न बचा
युवक की बीमारी ने इस कदर परिवार पर कहर बरपाया कि सब कुछ बिक गया। माता निर्मला देव और पिता अशोक राणा अपने बेटे के ठीक होने की आस में सब कुछ भूल गए। घर को बेचना पड़ गया। अब बूढ़े माता-पिता का जीवन यापन करना कठिन हो रहा है। इसे लेकर माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में बेटे के लिए इच्छा मृत्यु याचिका दायर की थी। जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।
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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़
- फोटो : पीटीआई
पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने यह कहा
दिल्ली हाईकोर्ट से इच्छा मृत्यु की याचिका खारिज होने के बाद युवक के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। याचिका पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने आठ नवंबर को सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि युवक को इच्छा मृत्यु नहीं दी जा सकती है, क्योंकि वह अपने जीवन को बनाए रखने के लिए वेंटीलेटर पर नहीं है। बल्कि उसे नली के जरिये भोजन दिया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने मामले को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपने और युवक को नि:शुल्क चिकित्सा सहायता मुहैया कराने के निर्देश दिए।
अब मिलेगी यह मदद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार हरीश राणा को घर पर चिकित्सा सहायता मुहैया कराएगी। उसके घर पर नियमित फिजियोथेरेपिस्ट और आहार विशेषज्ञ जाएंगे। एक कॉल पर डॉक्टर इलाज करने पहुंचेंगे। घर पर नर्सिंग इंतजाम होंगे और सभी दवाइयां नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि युवक की घर पर देखभाल नहीं की जा सकती तो उसे जिला अस्पताल नोएडा में इलाज मुहैया कराया जाए। यदि संभव हो तो इलाज और देखभाल के लिए गैर सरकारी संगठनों की भी मदद ली जा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर युवक के माता-पिता को भविष्य में जरूरत पड़ती है तो वे कोर्ट आ सकते हैं।
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दिल्ली हाईकोर्ट से इच्छा मृत्यु की याचिका खारिज होने के बाद युवक के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। याचिका पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने आठ नवंबर को सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि युवक को इच्छा मृत्यु नहीं दी जा सकती है, क्योंकि वह अपने जीवन को बनाए रखने के लिए वेंटीलेटर पर नहीं है। बल्कि उसे नली के जरिये भोजन दिया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने मामले को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपने और युवक को नि:शुल्क चिकित्सा सहायता मुहैया कराने के निर्देश दिए।
अब मिलेगी यह मदद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार हरीश राणा को घर पर चिकित्सा सहायता मुहैया कराएगी। उसके घर पर नियमित फिजियोथेरेपिस्ट और आहार विशेषज्ञ जाएंगे। एक कॉल पर डॉक्टर इलाज करने पहुंचेंगे। घर पर नर्सिंग इंतजाम होंगे और सभी दवाइयां नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएंगीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि युवक की घर पर देखभाल नहीं की जा सकती तो उसे जिला अस्पताल नोएडा में इलाज मुहैया कराया जाए। यदि संभव हो तो इलाज और देखभाल के लिए गैर सरकारी संगठनों की भी मदद ली जा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर युवक के माता-पिता को भविष्य में जरूरत पड़ती है तो वे कोर्ट आ सकते हैं।
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